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नई दिल्ली। मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद भाजपा ने पलटवार किया है। भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने राहुल गांधी की राजनीतिक समझ पर सवाल उठाते हुए उनके आरोपों को खारिज किया। उन्होंने कांग्रेस के अलग-अलग राज्यों में चुनावी प्रदर्शन का हवाला देते हुए कहा कि पार्टी को अपनी हार के कारणों पर भी विचार करना चाहिए।
राहुल गांधी ने गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुनाव आयोग और SIR प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए थे। उनकी प्रतिक्रिया हाल में सामने आई एक जांच रिपोर्ट के बाद आई, जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में चुनाव आयोग के कुछ कदमों पर रिकॉर्ड में 14 बार आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट में मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने सहित कई मुद्दों का उल्लेख किया गया है।
राहुल गांधी ने इस रिपोर्ट के आधार पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल उठाए। उनके आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि कांग्रेस नेता चुनावी नतीजों और सत्ता विरोधी रुझान की अपनी व्याख्या कर रहे हैं, लेकिन उन्हें कांग्रेस के लंबे चुनावी रिकॉर्ड को भी देखना चाहिए।
त्रिवेदी ने दावा किया कि कांग्रेस कई राज्यों में लंबे समय से अपने दम पर सत्ता में वापसी नहीं कर पाई है। उन्होंने पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए कहा कि कांग्रेस 1977 के बाद वहां सत्ता में नहीं लौटी। उन्होंने तमिलनाडु का भी जिक्र किया, जहां कांग्रेस 1967 के बाद सरकार नहीं बना सकी। इसी तरह उन्होंने उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस के लंबे समय से सत्ता से बाहर रहने का मुद्दा उठाया।
भाजपा प्रवक्ता ने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के संसदीय चुनावों का भी उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस को कई सीटों पर सहयोगी दलों के समर्थन की जरूरत पड़ी। वायनाड का उदाहरण देते हुए त्रिवेदी ने प्रियंका गांधी की जीत में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग सहित सहयोगी दलों के समर्थन का जिक्र किया। यह भाजपा की ओर से कांग्रेस के चुनावी प्रदर्शन को लेकर पेश किया गया राजनीतिक तर्क था।
राहुल गांधी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में सत्ता विरोधी लहर का मुद्दा भी उठाया था। इसके जवाब में त्रिवेदी ने तर्क दिया कि सत्ता विरोधी रुझान को केवल भाजपा के सत्ता में आने के बाद की घटना के रूप में नहीं देखा जा सकता। उन्होंने कांग्रेस के अलग-अलग राज्यों में सत्ता से बाहर होने और लंबे समय तक वापसी नहीं कर पाने के उदाहरण दिए।
SIR को लेकर भाजपा ने चुनाव आयोग की कानूनी शक्तियों का भी बचाव किया। त्रिवेदी ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) का उल्लेख करते हुए कहा कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण कराने का अधिकार है। उन्होंने SIR प्रक्रिया को कानूनी बताते हुए कांग्रेस के आरोपों को खारिज किया।
राजनीतिक विवाद का एक प्रमुख हिस्सा ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की जांच रिपोर्ट भी है। त्रिवेदी ने सवाल किया कि रिपोर्ट में चुनाव आयुक्तों का प्रत्यक्ष बयान क्यों नहीं था। उन्होंने पूछा कि यदि रिपोर्ट में किसी चुनाव आयुक्त का ऑन रिकॉर्ड या ऑफ रिकॉर्ड बयान नहीं है तो उनके कथित मतभेदों को किस आधार पर प्रस्तुत किया गया।
अखबार ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उसने रिपोर्ट प्रकाशित करने से पहले चुनाव आयोग को सवाल भेजे थे। 21 सितंबर को चुनाव आयोग को प्रश्नावली भेजी गई थी और दोनों चुनाव आयुक्तों को भी ईमेल के जरिए सवाल भेजे गए थे। इसके बाद फोन से भी संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।
त्रिवेदी ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग तीन सदस्यीय संस्था है और निर्णय बहुमत के आधार पर होते हैं। उनका तर्क था कि यदि किसी मामले में दो चुनाव आयुक्त किसी प्रस्ताव से असहमत होते हैं तो बहुमत के कारण वह फैसला उसी स्वरूप में आगे नहीं बढ़ सकता। उन्होंने सार्वजनिक रूप से हुई चुनाव आयोग की प्रेस कॉन्फ्रेंस में तीनों आयुक्तों की मौजूदगी का भी उल्लेख किया।
दूसरी ओर ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की जांच में दावा किया गया कि SIR से जुड़े कुछ मामलों में चुनाव आयुक्तों ने प्रक्रिया, मतदाताओं के नाम जोड़ने और हटाने तथा उन्हें पर्याप्त जानकारी नहीं दिए जाने जैसे विषयों पर आपत्तियां दर्ज की थीं। ये रिपोर्ट में किए गए दावे हैं और इन्हीं को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हुआ है।
राहुल गांधी और कांग्रेस ने रिपोर्ट को चुनाव आयोग के कामकाज पर अपने पहले से लगाए जा रहे आरोपों से जोड़ा है। कांग्रेस लंबे समय से मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों और SIR प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठा रही है। राहुल गांधी ने हाल के महीनों में अलग-अलग राज्यों की मतदाता सूचियों में हुए बदलावों को लेकर भी आयोग और भाजपा पर आरोप लगाए हैं। चुनाव आयोग और भाजपा इन आरोपों को खारिज करते रहे हैं।
भाजपा ने राहुल गांधी के चुनावी धांधली संबंधी आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी बताते हुए कहा कि चुनावी हार को चुनाव आयोग से जोड़ना उचित नहीं है। वहीं कांग्रेस का कहना है कि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए। दोनों दलों के बीच इसी मुद्दे को लेकर आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं।
सुधांशु त्रिवेदी ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि केंद्रीय स्तर पर चुनाव आयुक्तों की चयन प्रक्रिया में लोकसभा में विपक्ष के नेता की भूमिका है और इस संदर्भ में राज्य स्तर की व्यवस्थाओं से तुलना की जानी चाहिए। उनका यह बयान राहुल गांधी द्वारा चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर उठाए गए सवालों के जवाब में आया।
फिलहाल SIR और चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों को लेकर राजनीतिक विवाद जारी है। कांग्रेस जांच रिपोर्ट को आधार बनाकर आयोग से जवाब मांग रही है, जबकि भाजपा रिपोर्ट की पद्धति और राहुल गांधी के निष्कर्षों पर सवाल उठा रही है। ऐसे में मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया और चुनाव आयोग के फैसलों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव और तेज हो गया है।





