- Home
- /
- दिल्ली-एनसीआर
- /
- SIR और ‘वोट चोरी’ के...
SIR और ‘वोट चोरी’ के आरोपों पर BJP का पलटवार, चुनाव आयोग के बचाव में उतरी पार्टी

नई दिल्ली। चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया को लेकर विपक्ष के लगातार हमलों के बीच भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अब पलटवार तेज कर दिया है। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की ओर से लगाए जा रहे ‘वोट चोरी’ और चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोपों पर भाजपा ने चुनाव आयोग का बचाव करते हुए विपक्ष के दावों पर सवाल उठाए हैं। पार्टी का कहना है कि SIR मतदाता सूची को दुरुस्त करने की कानूनी प्रक्रिया है और आयोग के भीतर अलग-अलग राय सामने आना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है।
यह विवाद ऐसे समय बढ़ा है, जब पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण को लेकर राजनीतिक दल आमने-सामने हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि SIR के नाम पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं और इससे पात्र मतदाताओं के मतदान के अधिकार पर असर पड़ सकता है। कांग्रेस ने SIR को लेकर चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं, जबकि TMC ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।
BJP ने आंकड़ों से दिया जवाब
भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने पश्चिम बंगाल के आंकड़ों का हवाला देते हुए विपक्ष के ‘वोट चोरी’ के आरोप पर सवाल उठाया। पार्टी का तर्क है कि अगर मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया का सीधा फायदा भाजपा को मिला होता, तो सबसे ज्यादा नाम हटने वाली सीटों पर भाजपा को ही जीत मिलनी चाहिए थी। भाजपा ने दावा किया कि पश्चिम बंगाल की 20 ऐसी विधानसभा सीटों में, जहां सबसे ज्यादा मतदाताओं के नाम हटाए गए, TMC ने 13 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा छह सीटों पर जीत दर्ज कर सकी। यह भाजपा द्वारा पेश किया गया राजनीतिक तर्क है, न कि चुनाव आयोग का निष्कर्ष।
पार्टी ने इस आंकड़े को विपक्ष के उस आरोप के जवाब में इस्तेमाल किया कि SIR के जरिए मतदाता सूची में बदलाव करके भाजपा को चुनावी लाभ पहुंचाया गया। भाजपा नेताओं का कहना है कि चुनावी नतीजों और हटाए गए नामों के आंकड़ों को एक साथ देखने पर विपक्ष के आरोपों पर सवाल उठते हैं। वहीं विपक्ष इन आंकड़ों से अलग तरीके से SIR के प्रभाव की व्याख्या कर रहा है।
चुनाव आयुक्तों के मतभेद पर भी BJP की सफाई
SIR को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद सामने आने के बाद भी भाजपा ने आयोग का बचाव किया है। रिपोर्टों के मुताबिक चुनाव आयुक्तों के बीच कुछ फैसलों और प्रशासनिक निर्देशों को लेकर अलग-अलग राय सामने आई थी। इस पर भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि किसी संवैधानिक संस्था के सदस्यों के बीच विचारों का अलग होना असामान्य नहीं है। उनके अनुसार अगर तीनों चुनाव आयुक्त हर मुद्दे पर एक ही राय रखते तो विपक्ष इसे अलग तरह से देख सकता था।
भाजपा का कहना है कि चुनाव आयोग के भीतर चर्चा, सुझाव और असहमति को संस्था की कार्यप्रणाली का हिस्सा माना जाना चाहिए। पार्टी ने यह भी कहा कि अंतिम निर्णय आयोग की प्रक्रिया और बहुमत के आधार पर लिया जाता है। भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने SIR प्रक्रिया को कानूनी रूप से उचित बताया और कहा कि आयोग के निर्णय बहुमत की सहमति पर आधारित होते हैं।
विपक्ष के आरोप लगातार तेज
दूसरी तरफ विपक्ष चुनाव आयोग के खिलाफ अपने आरोपों को लगातार उठा रहा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है और चुनावी प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस का आरोप है कि SIR के जरिए बड़ी संख्या में मतदाताओं को मतदाता सूची से बाहर किया जा सकता है। पार्टी ने इस प्रक्रिया में पारदर्शिता और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा की मांग की है।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और TMC प्रमुख ममता बनर्जी ने भी SIR को लेकर चुनाव आयोग पर तीखे सवाल उठाए हैं। उन्होंने पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची में बदलावों को लेकर आपत्ति जताई है। विपक्ष की ओर से आयोग की भूमिका की जांच और कुछ मामलों में आगे की न्यायिक निगरानी की मांग भी की गई है।
पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा विवाद
SIR को लेकर पश्चिम बंगाल में विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां मतदाता सूची में बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने का मामला सामने आया है। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि SIR के दौरान 27.16 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए। इनमें से 22.21 लाख से अधिक लोगों ने नाम दोबारा शामिल कराने के लिए अपील की है। आयोग के अनुसार नाम हटाने के पीछे अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और डुप्लीकेट मतदाताओं जैसी श्रेणियां शामिल थीं।
आयोग के अनुसार इन मामलों की सुनवाई के लिए अपीलीय व्यवस्था भी बनाई गई थी। हालांकि केवल 1,607 मतदाताओं के नाम 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले दोबारा शामिल किए जा सके। इस आंकड़े को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए हैं और कहा है कि जिन पात्र मतदाताओं के नाम समय पर बहाल नहीं हुए, उनके मतदान अधिकार पर असर पड़ा। चुनाव आयोग ने दूसरी ओर प्रक्रिया को नियमों के अनुरूप बताया है।
दिल्ली में भी SIR को लेकर चर्चा
SIR का असर केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है। दिल्ली में भी 31.63 लाख मतदाताओं को नोटिस जारी किए गए हैं। इनमें चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू, CBI निदेशक प्रवीण सूद और कई वर्तमान तथा पूर्व वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हैं। चुनाव आयोग के अनुसार ये नोटिस मतदाता सूची में दर्ज विभिन्न विसंगतियों और पिछले रिकॉर्ड से संबंधित सत्यापन के लिए जारी किए गए हैं।
दिल्ली भाजपा ने अपने कार्यकर्ताओं और बूथ स्तर के एजेंटों से ऐसे मतदाताओं की मदद करने को कहा है जिन्हें SIR के तहत नोटिस मिले हैं। पार्टी ने उन्हें आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने और जरूरत पड़ने पर नाम दोबारा शामिल कराने के लिए फॉर्म-6 भरने में सहायता करने की बात कही है।
राजनीतिक टकराव के बीच बढ़ी बहस
SIR अब सिर्फ मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है, बल्कि यह राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बन चुका है। विपक्ष इसे मताधिकार और चुनावी पारदर्शिता से जोड़कर देख रहा है, जबकि भाजपा इसे मतदाता सूची को व्यवस्थित करने की प्रक्रिया बताते हुए विपक्ष के आरोपों का जवाब दे रही है।
फिलहाल विवाद के दो प्रमुख पक्ष हैं। विपक्ष चुनाव आयोग की प्रक्रिया, मतदाता नाम हटाने और आयोग के भीतर कथित मतभेदों पर सवाल उठा रहा है। दूसरी ओर भाजपा आयोग की कार्यप्रणाली का बचाव करते हुए विपक्ष से उसके आरोपों के समर्थन में ठोस तथ्य सामने रखने को कह रही है। इस बीच SIR से जुड़े मामले अदालतों और चुनावी संस्थाओं के स्तर पर भी विचाराधीन हैं, इसलिए आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक और कानूनी बहस जारी रहने की संभावना है।





