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संजय राउत के बयान पर भड़की BJP अल्बानिया हिंसा को लेकर छिड़ी बहस

Ratna Netam
20 Oct 2026 9:05 PM IST
संजय राउत के बयान पर भड़की BJP अल्बानिया हिंसा को लेकर छिड़ी बहस
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नई दिल्ली। यूरोपीय देश अल्बानिया में सरकार विरोधी हिंसक प्रदर्शनों की आग अब भारत की राजनीति तक पहुंच गई है। अल्बानिया की राजधानी तिराना में प्रदर्शनकारियों द्वारा सुप्रीम कोर्ट के कार्यालयों और अन्य सरकारी संस्थानों को निशाना बनाए जाने के बाद भारत में राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत की सोशल मीडिया पोस्ट ने इस विवाद को और बढ़ा दिया है। राउत ने अल्बानिया की घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत सहित अन्य देशों को इनसे सबक लेना चाहिए। उनके बयान पर भारतीय जनता पार्टी ने कड़ी आपत्ति जताई है, जबकि कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं ने शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन को लोकतांत्रिक अधिकार बताया है।
अल्बानिया में हिंसक प्रदर्शनों से बढ़ा तनाव
अल्बानिया की राजधानी तिराना में सरकार के खिलाफ चल रहे विरोध-प्रदर्शनों ने हिंसक रूप ले लिया है। भ्रष्टाचार, शिक्षा व्यवस्था और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को लेकर शुरू हुए प्रदर्शनों के दौरान कई सरकारी इमारतों को निशाना बनाया गया।18 अक्टूबर को प्रदर्शनकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के कार्यालयों में आग लगा दी। इसके अलावा अन्य सरकारी प्रतिष्ठानों के आसपास भी हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं।प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़पें हुईं। पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया।
संजय राउत की पोस्ट से शुरू हुआ विवाद
शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अल्बानिया की हिंसक घटनाओं का उल्लेख किया।उन्होंने दावा किया कि वहां लोगों ने भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे प्रधानमंत्री को न्यायपालिका का समर्थन मिलने के विरोध में सुप्रीम कोर्ट में आग लगा दी।राउत ने कहा कि प्रदर्शनकारियों ने संसद, सरकारी कार्यालयों और अन्य संस्थानों को भी निशाना बनाया। उन्होंने टिप्पणी की कि दुनिया के देशों, विशेष रूप से भारत को इन घटनाओं से सबक लेना चाहिए।उनकी इस पोस्ट के बाद राजनीतिक विवाद शुरू हो गया।
BJP ने राउत के बयान पर उठाए गंभीर सवाल
भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने संजय राउत की टिप्पणी की आलोचना करते हुए इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति खतरनाक संदेश बताया।भाजपा नेता किरीट सोमैया ने आरोप लगाया कि राउत हिंसक विरोध-प्रदर्शनों का समर्थन कर रहे हैं और देश में अराजकता को बढ़ावा देने वाली सोच प्रस्तुत कर रहे हैं।भाजपा नेताओं ने कहा कि लोकतंत्र में असहमति व्यक्त करने का अधिकार है, लेकिन हिंसा और सरकारी संस्थानों पर हमलों को उचित नहीं ठहराया जा सकता।इस विवाद में केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू के उन बयानों का भी उल्लेख हुआ, जिनमें उन्होंने विपक्ष पर राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने के प्रयासों का आरोप लगाया था।
प्रियंका चतुर्वेदी ने अपनी ही पार्टी के नेता से जताई असहमति
संजय राउत के बयान पर शिवसेना (यूबीटी) के भीतर भी मतभेद सामने आए।पार्टी नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने अल्बानिया की हिंसक घटनाओं से भारत की तुलना किए जाने पर आपत्ति जताई।उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता परिवर्तन चुनाव और संवैधानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से होना चाहिए। किसी भी देश में हिंसक प्रदर्शनों के दौरान न्यायपालिका या अन्य लोकतांत्रिक संस्थाओं को निशाना बनाना उचित नहीं है।चतुर्वेदी ने स्पष्ट किया कि भारत में शांतिपूर्ण विरोध और लोकतांत्रिक माध्यमों से अपनी बात रखने की परंपरा है।
शशि थरूर ने खारिज किए सत्ता परिवर्तन के आरोप
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने विपक्षी प्रदर्शनों की तुलना विदेशों में हुई हिंसा से किए जाने पर आपत्ति जताई।उन्होंने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था अलग है और विपक्ष का उद्देश्य संवैधानिक संस्थाओं को अस्थिर करना नहीं, बल्कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना है।थरूर ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विपक्ष की चिंताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि राजनीतिक दलों को लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज कराने का अधिकार है।उन्होंने स्पष्ट किया कि विपक्ष शांतिपूर्ण प्रदर्शनों का समर्थन करता है, न कि हिंसक तरीकों से सरकार बदलने का।
विपक्ष ने विदेशी ताकतों के आरोपों को नकारा
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा और तृणमूल कांग्रेस सांसद सौगत रॉय सहित विपक्ष के अन्य नेताओं ने भी राजनीतिक विरोध को विदेशी अशांति से जोड़ने पर आपत्ति जताई।विपक्षी नेताओं का कहना है कि सरकार की नीतियों के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है।वहीं, भाजपा नेताओं ने विदेशी घटनाओं का उदाहरण देते हुए राजनीतिक अस्थिरता और हिंसक आंदोलनों के खतरों को लेकर चेतावनी दी है।हालांकि, भारतीय विपक्ष के शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को विदेशी ताकतों का समर्थन मिलने संबंधी आरोपों के पक्ष में कोई पुष्ट प्रमाण इन बयानों के साथ सामने नहीं आया है।
लोकतांत्रिक विरोध और हिंसा को लेकर छिड़ी बहस
अल्बानिया की घटनाओं ने भारत में शांतिपूर्ण विरोध, राजनीतिक असहमति और लोकतांत्रिक संस्थाओं की सुरक्षा को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।भारतीय संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण और बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार देता है। हालांकि, हिंसा, आगजनी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना इस अधिकार के अंतर्गत नहीं आता।फिलहाल संजय राउत की टिप्पणी, भाजपा की आलोचना और विपक्षी नेताओं की प्रतिक्रियाओं ने राजनीतिक विवाद को बढ़ा दिया है। इस घटनाक्रम ने लोकतांत्रिक विरोध और हिंसक आंदोलनों के बीच अंतर को लेकर महत्वपूर्ण सवाल सामने रखे हैं।
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