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रेड बुल को बड़ी राहत FSSAI का आदेश दिल्ली हाई कोर्ट ने किया रद्द

Ratna Netam
29 Sept 2026 2:02 PM IST
रेड बुल को बड़ी राहत FSSAI का आदेश दिल्ली हाई कोर्ट ने किया रद्द
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नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार को रेड बुल को बड़ी राहत देते हुए फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें कंपनी को अपने उत्पादों के लिए “एनर्जी ड्रिंक” शब्द का इस्तेमाल बंद करने का निर्देश दिया गया था। हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि संबंधित आदेश जारी करने से पहले कंपनी को अपना पक्ष रखने और अपनी स्थिति स्पष्ट करने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। कोर्ट ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना।
जस्टिस अमित महाजन की अदालत ने रेड बुल की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कंपनी के पक्ष में फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि फूड रेगुलेटर की ओर से 30 जून 2026 को जारी किया गया आदेश कंपनी को जानकारी दिए बिना और उसका पक्ष सुने बिना पारित किया गया था। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने एफएसएसएआई के आदेश को रद्द करने का निर्णय लिया।
मामला रेड बुल के उत्पादों के लिए “एनर्जी ड्रिंक” शब्द के इस्तेमाल से जुड़ा हुआ है। एफएसएसएआई ने 30 जून 2026 को आदेश जारी करते हुए कंपनी को निर्देश दिया था कि वह अपने उत्पादों के लिए “एनर्जी ड्रिंक” शब्द का उपयोग न करे। इस आदेश से प्रभावित होकर रेड बुल ने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया और फूड रेगुलेटर के निर्देश को चुनौती दी।
कंपनी की याचिका पर सुनवाई के दौरान मुख्य मुद्दा यह रहा कि क्या इस तरह का निर्देश जारी करने से पहले संबंधित कंपनी को अपनी बात रखने का मौका दिया गया था। अदालत ने रिकॉर्ड और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए पाया कि आदेश पारित करने से पहले रेड बुल को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अवसर नहीं मिला था। अदालत ने इसी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी प्रभावित पक्ष के खिलाफ निर्णय लेने से पहले उसे अपना पक्ष प्रस्तुत करने का मौका दिया जाना जरूरी है।
हाई कोर्ट ने कहा कि 30 जून का आदेश रेड बुल को पहले से जानकारी दिए बिना पारित किया गया था। कंपनी को यह बताने या समझाने का मौका नहीं मिला कि वह अपने उत्पादों के लिए “एनर्जी ड्रिंक” शब्द का इस्तेमाल क्यों कर रही है और इस संबंध में उसका पक्ष क्या है। कोर्ट ने माना कि इस प्रक्रिया में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया।
जस्टिस अमित महाजन ने इसी आधार पर रेड बुल की याचिका स्वीकार कर ली। अदालत के आदेश के बाद एफएसएसएआई का वह निर्देश फिलहाल प्रभावी नहीं रहेगा, जिसमें कंपनी को “एनर्जी ड्रिंक” शब्द का इस्तेमाल बंद करने के लिए कहा गया था। हाई कोर्ट के फैसले का मुख्य आधार आदेश जारी करने की प्रक्रिया रही। अदालत ने इस स्तर पर इस बात पर जोर दिया कि नियामक कार्रवाई करते समय प्रभावित पक्ष को सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए।
रेड बुल की ओर से चुनौती दिए गए आदेश का सीधा संबंध उसके उत्पादों की पहचान और उनके लिए इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों से था। एफएसएसएआई ने कंपनी को अपने उत्पादों के संदर्भ में “एनर्जी ड्रिंक” शब्द हटाने का निर्देश दिया था। कंपनी ने इस कार्रवाई के खिलाफ अदालत में यह मुद्दा उठाया कि आदेश जारी करने से पहले उसे अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया।
दिल्ली हाई कोर्ट ने इसी दलील को महत्वपूर्ण माना। अदालत के मुताबिक, यदि किसी प्रशासनिक या नियामक आदेश से किसी कंपनी या पक्ष के अधिकार और व्यावसायिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं, तो फैसला लेने से पहले उसे अपनी स्थिति रखने का उचित अवसर मिलना चाहिए। रेड बुल के मामले में अदालत ने पाया कि यह प्रक्रिया पूरी नहीं की गई थी।
हाई कोर्ट का फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि नियामक संस्थाओं द्वारा लिए जाने वाले निर्णयों में प्रक्रिया का पालन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। किसी आदेश की विषयवस्तु के साथ-साथ यह भी जरूरी है कि निर्णय लेने से पहले प्रभावित पक्ष को जानकारी दी जाए और उसे अपनी बात रखने का अवसर मिले। अदालत ने रेड बुल की याचिका को मंजूर करते हुए इसी प्रक्रिया की कमी को अपने फैसले का आधार बनाया।
फिलहाल दिल्ली हाई कोर्ट के इस फैसले से रेड बुल को राहत मिली है। कंपनी के खिलाफ जारी 30 जून 2026 का आदेश रद्द कर दिया गया है। इस आदेश में उसे अपने उत्पादों के लिए “एनर्जी ड्रिंक” शब्द का इस्तेमाल बंद करने को कहा गया था। कोर्ट ने साफ किया कि आदेश जारी करने से पहले कंपनी को अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं दिया गया, इसलिए यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था।
इस तरह दिल्ली हाई कोर्ट ने रेड बुल की याचिका स्वीकार करते हुए एफएसएसएआई के आदेश को निरस्त कर दिया। मामले में अदालत का केंद्र बिंदु यह रहा कि कंपनी को सुनवाई का मौका दिए बिना उसके खिलाफ निर्देश जारी कर दिया गया था। कोर्ट ने इसी प्रक्रियात्मक कमी को महत्वपूर्ण मानते हुए कंपनी के पक्ष में फैसला सुनाया।
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