दिल्ली-एनसीआर

दिल्ली में भारतीय नौसेना का बड़ा सम्मेलन, समुद्री सुरक्षा पर 18 देशों के विशेषज्ञ जुटे

Ratna Netam
3 Nov 2026 7:47 PM IST
दिल्ली में भारतीय नौसेना का बड़ा सम्मेलन, समुद्री सुरक्षा पर 18 देशों के विशेषज्ञ जुटे
x
नई दिल्ली : 3 नवंबर 2026। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत बनाने की दिशा में भारत ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। भारतीय नौसेना का प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 'इंडो-पैसिफिक रीजनल डायलॉग 2026' (IPRD-2026) मंगलवार को नई दिल्ली में शुरू हो गया। तीन दिवसीय सम्मेलन का आयोजन 3 से 5 नवंबर तक मानेकशॉ सेंटर में किया जा रहा है। इसमें हिंद-प्रशांत क्षेत्र के 18 देशों के विशेषज्ञ, समुद्री मामलों के जानकार, वैज्ञानिक, शिक्षाविद, नीति निर्माता और रणनीतिक मामलों से जुड़े प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं।इस वर्ष सम्मेलन की थीम 'हिंद-प्रशांत क्षेत्र में विज्ञान, प्रौद्योगिकी और शैक्षणिक सहयोग' निर्धारित की गई है। इसका मुख्य उद्देश्य समुद्री क्षेत्र में वैज्ञानिक उपलब्धियों, आधुनिक तकनीक और संस्थागत साझेदारी को व्यावहारिक सहयोग में बदलना है। भारतीय नौसेना के सहयोगी संस्थान नेशनल मैरीटाइम फाउंडेशन (NMF) के साथ मिलकर इस सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है।रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इंडो-पैसिफिक रीजनल डायलॉग भारतीय नौसेना का वार्षिक उच्चस्तरीय अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक संवाद है। इसके माध्यम से क्षेत्रीय चुनौतियों, समुद्री सुरक्षा, तकनीकी विकास और सहयोग की नई संभावनाओं पर चर्चा की जाती है।सम्मेलन के पहले दिन यह महत्वपूर्ण सवाल उठाया गया कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में वैज्ञानिक ज्ञान और तकनीकी नवाचार का उपयोग स्थायी संस्थागत सहयोग, बेहतर समुद्री क्षमताओं और साझा क्षेत्रीय चुनौतियों से निपटने के लिए किस तरह किया जा सकता है।
कार्यक्रम की शुरुआत नेशनल मैरीटाइम फाउंडेशन के अध्यक्ष और पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी (सेवानिवृत्त) के उद्घाटन संबोधन से हुई। इस दौरान समुद्री क्षेत्र में बदलती परिस्थितियों और देशों के बीच व्यापक सहयोग की आवश्यकता को रेखांकित किया गया।हिंद-प्रशांत क्षेत्र विश्व व्यापार और सामरिक गतिविधियों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। हिंद महासागर से लेकर प्रशांत महासागर तक फैले इस क्षेत्र में कई प्रमुख समुद्री व्यापार मार्ग स्थित हैं। इन मार्गों से ऊर्जा संसाधनों, औद्योगिक उत्पादों और आवश्यक वस्तुओं का अंतरराष्ट्रीय परिवहन होता है।ऐसे में समुद्री मार्गों की सुरक्षा केवल सैन्य दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता और वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था के लिए भी आवश्यक है। इसी कारण सम्मेलन में समुद्री सुरक्षा के साथ विज्ञान, तकनीक और आर्थिक गतिविधियों के बीच संबंधों पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है।रक्षा मंत्रालय ने बताया कि इस वर्ष की चर्चा में विज्ञान को केवल भौतिक विज्ञान और इंजीनियरिंग तक सीमित नहीं रखा गया है। जीवन विज्ञान और सामाजिक विज्ञान से जुड़े विषयों को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।इसका उद्देश्य समुद्र से जुड़ी चुनौतियों को व्यापक दृष्टिकोण से समझना है। इनमें जलवायु परिवर्तन, समुद्री व्यापार, आपूर्ति शृंखलाओं की सुरक्षा, समुद्री संसाधनों पर बढ़ता दबाव और महत्वपूर्ण समुद्री बुनियादी ढांचे के सामने उभरते खतरे शामिल हैं।
सम्मेलन में वैज्ञानिक जानकारी के आदान-प्रदान और संयुक्त अनुसंधान परियोजनाओं को प्रोत्साहित करने की संभावनाओं पर भी विचार किया जाएगा। विशेषज्ञ इस बात पर चर्चा करेंगे कि विभिन्न देशों के विश्वविद्यालय, अनुसंधान संस्थान और समुद्री संगठन किस प्रकार मिलकर नई तकनीक विकसित कर सकते हैं।तीन दिवसीय कार्यक्रम में पांच प्रमुख विषयगत सत्र निर्धारित किए गए हैं। इनमें शैक्षणिक नेटवर्क और मानव संसाधन विकास, समुद्री गतिविधियों की निगरानी और महत्वपूर्ण ढांचे की सुरक्षा, समुद्र विज्ञान तथा जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता प्रमुख हैं।इसके अतिरिक्त महासागर प्रशासन, समुद्री चुनौतियों का सामूहिक समाधान और आधुनिक तकनीक के नागरिक तथा सैन्य उपयोग पर भी विचार-विमर्श किया जाएगासमुद्री गतिविधियों की निगरानी का विषय विशेष महत्व रखता है। विभिन्न देशों के लिए अपने समुद्री क्षेत्रों में जहाजों की आवाजाही, अवैध गतिविधियों और सुरक्षा संबंधी खतरों की जानकारी प्राप्त करना आवश्यक होता है।नई तकनीक के माध्यम से समुद्री निगरानी की क्षमता बढ़ाई जा सकती है। उपग्रह, सेंसर, सूचना विश्लेषण और अन्य आधुनिक प्रणालियां इस क्षेत्र में उपयोगी भूमिका निभा सकती हैं। हालांकि, इन तकनीकों का प्रभावी उपयोग करने के लिए देशों के बीच भरोसे और सूचना साझा करने की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है।जलवायु परिवर्तन से जुड़ी समुद्री चुनौतियां भी सम्मेलन का प्रमुख विषय हैं। समुद्र के बढ़ते तापमान, समुद्र स्तर में वृद्धि और अत्यधिक मौसमी घटनाओं का प्रभाव विशेष रूप से तटीय तथा द्वीपीय देशों पर पड़ सकता है।
इन परिस्थितियों में समुद्री अनुसंधान और पर्यावरण संबंधी आंकड़ों का आदान-प्रदान देशों को बेहतर तैयारी करने में मदद कर सकता है। सम्मेलन में ऐसे उपायों पर चर्चा की जा रही है, जिनसे समुद्री समुदायों और बुनियादी ढांचे की सुरक्षा मजबूत हो सकेIPRD-2026 में दो विशेष सत्र भी आयोजित किए जाने हैं। पहले सत्र का नाम 'पर्सपेक्टिव्स फ्रॉम द फ्लैग ब्रिज' रखा गया है। इसमें भारत और श्रीलंका के पूर्व नौसेना प्रमुखों के विचार शामिल होंगे।इस सत्र में हिंद महासागर नौसेना संगोष्ठी (IONS) जैसे बहुपक्षीय मंचों की क्षमता का उपयोग करते हुए समुद्री विज्ञान, तकनीक और शैक्षणिक सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं पर चर्चा होगी।दूसरा विशेष सत्र 'सहयोग का संवाद' नाम से आयोजित किया जाएगा। इसमें राजनयिक स्तर पर विचारों का आदान-प्रदान किया जाएगा। इसका उद्देश्य विभिन्न देशों के बीच सहयोग की संभावनाओं को बेहतर ढंग से समझना और उन्हें आगे बढ़ाना है।सम्मेलन के दूसरे दिन, 4 नवंबर को, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का विशेष संबोधन निर्धारित है। इसके अतिरिक्त केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह भी कार्यक्रम को संबोधित करेंगे।इन सत्रों में रक्षा और विज्ञान के बीच सहयोग को मजबूत बनाने के संभावित उपायों पर चर्चा होने की उम्मीद है।यह सम्मेलन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वर्ष 2019 में प्रस्तुत हिंद-प्रशांत महासागर पहल (IPOI) से भी जुड़ा हुआ है। इस पहल का उद्देश्य समुद्री सहयोग के विभिन्न क्षेत्रों में देशों की साझेदारी को बढ़ावा देना है।
भारत की 'महासागर' दृष्टि भी क्षेत्रीय सुरक्षा, विकास और व्यापक सहयोग पर जोर देती है। IPRD-2026 के माध्यम से इन उद्देश्यों को ठोस प्रस्तावों और व्यावहारिक गतिविधियों में बदलने का प्रयास किया जा रहा है।विशेषज्ञों के अनुसार, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री चुनौतियां किसी एक देश तक सीमित नहीं हैं। प्राकृतिक आपदाएं, समुद्री प्रदूषण, व्यापारिक मार्गों में व्यवधान और सुरक्षा संबंधी खतरे कई देशों को एक साथ प्रभावित कर सकते हैं।इसलिए इन समस्याओं से निपटने के लिए वैज्ञानिक सहयोग, साझा अनुसंधान और बेहतर संवाद आवश्यक है। तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता में देशों के बीच अंतर होने के कारण संस्थागत साझेदारी का महत्व और बढ़ जाता है।भारतीय नौसेना का यह आयोजन इसी दिशा में महत्वपूर्ण मंच प्रदान कर रहा है। सम्मेलन का उद्देश्य केवल विचारों का आदान-प्रदान करना नहीं, बल्कि ऐसे प्रस्ताव तैयार करना भी है जिन्हें भविष्य में द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सहयोग के माध्यम से आगे बढ़ाया जा सके।तीन दिवसीय इंडो-पैसिफिक रीजनल डायलॉग 2026 का समापन 5 नवंबर को होगा। सम्मेलन से निकलने वाले सुझाव समुद्री विज्ञान, क्षेत्रीय सुरक्षा, तकनीकी विकास और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी के क्षेत्र में भविष्य की पहलों को दिशा दे सकते हैं।
Next Story