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ज्ञानेश कुमार से पहले टीएन शेषन के दौर में भी चर्चा में था चुनाव आयोग, SC तक पहुंचा था विवाद

Kavita2
25 Sept 2026 10:24 AM IST
ज्ञानेश कुमार से पहले टीएन शेषन के दौर में भी चर्चा में था चुनाव आयोग, SC तक पहुंचा था विवाद
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नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में चुनाव आयोग एक बार फिर राजनीतिक और न्यायिक बहस के केंद्र में है। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR समेत आयोग के कुछ फैसलों पर विपक्ष सवाल उठा रहा है। हाल में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में SIR के दौरान मतदाताओं को जारी किए गए ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ नोटिस को लेकर भी चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा है। इसी बीच आयोग के भीतर फैसलों को लेकर मतभेद की खबरों ने नई राजनीतिक बहस खड़ी कर दी है।

हालांकि चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर विवाद का यह पहला दौर नहीं है। भारतीय चुनावी इतिहास में टीएन शेषन का कार्यकाल इसका सबसे चर्चित उदाहरण रहा है। शेषन 1990 से 1996 तक देश के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे। चुनाव सुधारों और चुनाव आचार संहिता को सख्ती से लागू कराने के कारण उनका कार्यकाल व्यापक रूप से चर्चा में रहा, लेकिन इसी दौरान चुनाव आयोग की आंतरिक संरचना और मुख्य चुनाव आयुक्त की शक्तियों को लेकर ऐसा संवैधानिक विवाद पैदा हुआ जो सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया।

विवाद की शुरुआत 1993 में तब हुई, जब केंद्र ने चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय बनाने की दिशा में कदम उठाया। राष्ट्रपति ने दो अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की। इसके साथ ही एक अध्यादेश के जरिए मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की सेवा शर्तों से जुड़े कानून में बदलाव किया गया और आयोग के कामकाज में निर्णय लेने की प्रक्रिया निर्धारित की गई। टीएन शेषन ने इस व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

शेषन की याचिका का एक प्रमुख सवाल यह था कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच शक्तियों का संबंध क्या है। उनका पक्ष था कि मुख्य चुनाव आयुक्त की संवैधानिक स्थिति अन्य चुनाव आयुक्तों से अलग और महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर केंद्र और अन्य पक्षों ने बहुसदस्यीय आयोग की व्यवस्था को संविधान के अनुरूप बताया।

मामले की सुनवाई पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने की। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एएम अहमदी की अध्यक्षता वाली पीठ ने 14 जुलाई 1995 को फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने टीएन शेषन की चुनौती स्वीकार नहीं की और बहुसदस्यीय चुनाव आयोग की व्यवस्था को संवैधानिक ठहराया। अदालत ने साफ किया कि संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को एक संस्था के रूप में देखता है और यह संस्था एक सदस्यीय या बहुसदस्यीय दोनों हो सकती है।

फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच अधिकारों की व्याख्या थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बहुसदस्यीय चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त अध्यक्ष की भूमिका निभाते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि अन्य चुनाव आयुक्त केवल अधीनस्थ या औपचारिक सदस्य हैं। उन्हें भी आयोग के फैसलों में हिस्सा लेने का अधिकार है।

अदालत ने संस्थागत निर्णय प्रक्रिया को व्यक्तिगत अधिकार से ऊपर रखा। फैसले में इस बात पर जोर दिया गया कि चुनाव आयोग को किसी एक व्यक्ति से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। बहुसदस्यीय आयोग में जहां संभव हो, निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाएं और मतभेद होने की स्थिति में बहुमत के आधार पर फैसला हो सकता है। इस फैसले ने चुनाव आयोग के भीतर सामूहिक निर्णय की संवैधानिक स्थिति को स्पष्ट किया।

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए आवश्यक माना। अदालत ने कहा था कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत हैं और चुनाव कराने वाली संस्था को राजनीतिक या कार्यपालिका के बाहरी दबाव से मुक्त होकर काम करने में सक्षम होना चाहिए। यही सिद्धांत बाद के वर्षों में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में भी महत्वपूर्ण संदर्भ बना।

तीन दशक से अधिक समय बाद चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया फिर चर्चा में है। सितंबर 2026 में प्रकाशित रिपोर्टों में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब दस महीने की अवधि में मतदाता सूची और SIR से संबंधित विभिन्न मामलों में कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं। चुनाव आयोग ने इस रिपोर्ट के कुछ निष्कर्षों और उनकी व्याख्या पर आपत्ति जताई है। इसलिए इसे स्थापित तथ्य के बजाय रिपोर्टों और आयोग के जवाब के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

दिल्ली में चल रही SIR प्रक्रिया भी न्यायिक जांच के दायरे में आई है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल में चुनाव आयोग से पूछा कि मतदाताओं को ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर नोटिस जारी करने के पीछे मानदंड क्या हैं। अदालत ने कुछ नोटिसों के लगभग यांत्रिक तरीके से जारी होने पर चिंता जताते हुए मतदाताओं के लिए जवाब देने की प्रक्रिया को अधिक सुविधाजनक बनाने पर भी विचार करने को कहा।

वर्तमान विवाद और टीएन शेषन के दौर का मामला परिस्थितियों और कानूनी प्रश्नों के लिहाज से एक जैसा नहीं है। शेषन का विवाद मुख्य रूप से आयोग की बहुसदस्यीय संरचना और CEC तथा अन्य चुनाव आयुक्तों की संवैधानिक शक्तियों से जुड़ा था। मौजूदा बहस में SIR की प्रक्रिया, आयोग के भीतर कथित मतभेद और विभिन्न राजनीतिक दलों की निष्पक्षता संबंधी आपत्तियां प्रमुख हैं।

फिर भी 1995 का फैसला आज भी एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संदर्भ देता है। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि चुनाव आयोग एक संस्था है और बहुसदस्यीय स्थिति में उसके फैसले सामूहिक प्रक्रिया के तहत होने चाहिए। मुख्य चुनाव आयुक्त आयोग के अध्यक्ष होते हैं, लेकिन अन्य चुनाव आयुक्त भी निर्णय प्रक्रिया के पूर्ण सदस्य हैं।

ज्ञानेश कुमार को लेकर मौजूदा राजनीतिक विवादों के बीच टीएन शेषन का मामला इसलिए फिर प्रासंगिक हो गया है क्योंकि उसने करीब तीन दशक पहले ही चुनाव आयोग में व्यक्तिगत और संस्थागत अधिकारों की सीमा पर महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत तय कर दिए थे। आज के विवादों का कानूनी और तथ्यात्मक निपटारा अपने अलग तथ्यों के आधार पर होगा, लेकिन 1995 का फैसला यह स्थापित करता है कि भारत में चुनाव संचालन की संवैधानिक जिम्मेदारी चुनाव आयोग नामक संस्था की है और बहुसदस्यीय आयोग में निर्णय सामूहिक प्रक्रिया से लिए जाने हैं।

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