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नई दिल्ली। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने देश में सांप्रदायिकता, नफरत और सामाजिक तनाव को लेकर कड़ी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि समाज में धर्म के नाम पर नफरत फैलाने और लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने वाली सोच देश की एकता के लिए गंभीर खतरा है। मदनी ने ऐसे सांप्रदायिक तत्वों को 'असल आतंकवादी' बताते हुए कहा कि नफरत की राजनीति से देश और समाज दोनों कमजोर होते हैं।
मदनी की टिप्पणी ऐसे समय सामने आई है जब धार्मिक पहचान, सांप्रदायिक बयानबाजी और सामाजिक सौहार्द को लेकर लगातार राजनीतिक बहस हो रही है। उन्होंने लोगों से धर्म और समुदाय के आधार पर टकराव के बजाय आपसी भाईचारा बनाए रखने की अपील की।
सांप्रदायिकता को बताया देश के लिए खतरा
मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि आतंकवाद को किसी धर्म या समुदाय के साथ जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक निर्दोष लोगों के खिलाफ हिंसा करने या समाज में नफरत फैलाने वाले व्यक्ति को उसके धर्म से नहीं, बल्कि उसके काम से पहचाना जाना चाहिए।
उन्होंने सांप्रदायिक सोच पर निशाना साधते हुए कहा कि जो लोग देश के नागरिकों के बीच नफरत पैदा करते हैं, वे सामाजिक एकता को नुकसान पहुंचाते हैं। मदनी ने इसी संदर्भ में सांप्रदायिक लोगों को 'असल आतंकवादी' कहा।
यह मदनी का राजनीतिक-सामाजिक आकलन है और इसे आतंकवाद की किसी कानूनी परिभाषा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
आतंकवाद का कोई धर्म नहीं
मदनी ने इस बात पर जोर दिया कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। उनका कहना है कि अगर कोई मुस्लिम हिंसा या आतंकवादी गतिविधि में शामिल है तो उसके अपराध के आधार पर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन उसके आधार पर पूरे समुदाय को कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं है।
इसी तरह उन्होंने कहा कि किसी दूसरे धर्म से जुड़ा व्यक्ति अपराध करता है तो उसके अपराध की जिम्मेदारी पूरे समुदाय पर नहीं डाली जा सकती।
मदनी लंबे समय से आतंकवाद और सांप्रदायिकता को धर्म से अलग करके देखने की बात करते रहे हैं। उनका तर्क रहा है कि अपराध करने वाले व्यक्ति के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए और किसी पूरे धार्मिक समुदाय को उसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए।
देश में भाईचारा बनाए रखने की अपील
अपने बयान में मदनी ने भारत की विविधता का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में अलग-अलग धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों के लोग लंबे समय से साथ रहते आए हैं। उन्होंने कहा कि भारत की ताकत इसी विविधता और आपसी भाईचारे में है।
उनके मुताबिक किसी भी प्रकार की सांप्रदायिक राजनीति या धार्मिक ध्रुवीकरण से सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचता है। ऐसे में सरकार, राजनीतिक दलों और धार्मिक संगठनों की जिम्मेदारी है कि वे लोगों के बीच भरोसा मजबूत करें।
उन्होंने आम लोगों से भी सोशल मीडिया या दूसरे माध्यमों पर फैलने वाली भड़काऊ और अपुष्ट सामग्री से सावधान रहने की अपील की।
जमीयत का सांप्रदायिकता पर पुराना रुख
Jamiat Ulema-e-Hind लंबे समय से सांप्रदायिक हिंसा और धार्मिक ध्रुवीकरण से जुड़े मुद्दों पर अपनी राय रखता आया है। संगठन ने कई मौकों पर आतंकवाद की निंदा करते हुए कहा है कि निर्दोष लोगों की हत्या या हिंसा को किसी भी धर्म के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता।
मदनी भी पहले कई बार सार्वजनिक मंचों से आतंकवाद और हिंसा की निंदा कर चुके हैं। इसके साथ ही वह मुस्लिम समुदाय के खिलाफ कथित भेदभाव और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण जैसे मुद्दों को भी उठाते रहे हैं।
बयान पर राजनीतिक बहस संभव
मदनी की ओर से 'असल आतंकवादी' जैसे शब्द का इस्तेमाल राजनीतिक बहस को जन्म दे सकता है। आतंकवाद एक गंभीर कानूनी और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा विषय है, इसलिए इस शब्द का राजनीतिक या सामाजिक संदर्भ में इस्तेमाल अक्सर विवाद का कारण बनता है।
भारत में आतंकवादी गतिविधियों से निपटने के लिए अलग कानूनी प्रावधान मौजूद हैं और किसी व्यक्ति या संगठन पर आतंकवाद से संबंधित आरोप कानूनी प्रक्रिया और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर तय होते हैं।
इस लिहाज से मदनी का बयान सांप्रदायिकता के खिलाफ उनकी तीखी राजनीतिक-सामाजिक टिप्पणी के तौर पर देखा जाना चाहिए।
नफरत से नहीं मजबूत होगा देश
मदनी ने कहा कि भारत को मजबूत बनाने के लिए सभी समुदायों के बीच विश्वास और सहयोग जरूरी है। धार्मिक पहचान के आधार पर लोगों को बांटने से देश की प्रगति प्रभावित होती है और समाज में तनाव पैदा होता है।
उन्होंने युवाओं से विशेष रूप से शिक्षा, रोजगार और देश के विकास से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देने की अपील की। उनका कहना है कि नई पीढ़ी को नफरत और सांप्रदायिक विवादों में उलझाने के बजाय बेहतर भविष्य तैयार करने के अवसर दिए जाने चाहिए।
मदनी के बयान का मुख्य संदेश सांप्रदायिक नफरत के खिलाफ सामाजिक एकता बनाए रखने का रहा। हालांकि सांप्रदायिक लोगों के लिए 'आतंकवादी' शब्द के इस्तेमाल को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं। अब यह देखना होगा कि उनके इस बयान पर विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की क्या प्रतिक्रिया आती है।
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