दिल्ली-एनसीआर

एआईएमपीएलबी ने असम सीएम के बयान की निंदा की, सुप्रीम कोर्ट से मामले के संज्ञान की अपील

SHIDDHANT
30 Jan 2026 9:14 PM IST
एआईएमपीएलबी ने असम सीएम के बयान की निंदा की, सुप्रीम कोर्ट से मामले के संज्ञान की अपील
x
Delhi दिल्ली। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के हालिया बयानों की कड़ी निंदा की है, जिन्हें बोर्ड ने मुस्लिम विरोधी, भड़काऊ और समाज को बांटने वाला बताया है। बोर्ड ने भारत के सुप्रीम कोर्ट से इस गंभीर मामले में स्वतः संज्ञान लेने की अपील की है, ताकि संवैधानिक मूल्यों और कानून के राज की रक्षा हो सके।
बोर्ड के प्रवक्ता डॉ. एस. क्यू. आर. इलियास ने जारी बयान में कहा कि सत्ताधारी दल की राजनीति में मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने वाली भाषा अब आम हो गई है। पहले यह कुछ सीमित लोगों तक रहती थी, लेकिन अब उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और असम जैसे राज्यों के मुख्यमंत्रियों द्वारा भी ऐसी बातें दोहराई जा रही हैं। विशेष रूप से असम के मुख्यमंत्री ने तिनसुकिया जिले के दिगबोई में 27 जनवरी को एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान 'मियां' (बंगाली भाषी मुसलमानों के लिए प्रयुक्त अपमानजनक शब्द) समुदाय को निशाना बनाते हुए कहा कि वे और भाजपा 'मियां' के खिलाफ हैं। उन्होंने दावा किया कि 'मियां' समुदाय को परेशान करना उनकी जिम्मेदारी है, ताकि वे असम छोड़कर चले जाएं।
मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि रिक्शा चलाने वाले 'मियां' को किराया 5 रुपए की जगह 4 रुपए दें, आर्थिक बॉयकॉट करें और पुलिस उनकी रक्षा करेगी। साथ ही, उन्होंने भाजपा कार्यकर्ताओं से मतदाता सूची में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान फॉर्म 7 भरकर 4-5 लाख 'मियां' वोटरों को हटाने का आह्वान किया। डॉ. इलियास ने इसे चौंकाने वाला और अस्वीकार्य बताया, क्योंकि एक मुख्यमंत्री, जिसने संविधान की रक्षा की शपथ ली है, वह खुलेआम एक समुदाय के साथ भेदभाव, उत्पीड़न और मताधिकार छीनने की वकालत कर रहा है।
बोर्ड का कहना है कि ऐसे बयान संविधान के मूल सिद्धांतों, समानता, कानून के सामने बराबरी और धर्मनिरपेक्षता पर हमला हैं। यदि चुनाव आयोग जैसी संस्था ऐसे गैर-कानूनी दबाव का विरोध नहीं करती, तो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की विश्वसनीयता खतरे में पड़ जाएगी। एआईएमपीएलबी ने राष्ट्रपति से भी अपील की है कि वे असम मुख्यमंत्री के खिलाफ संवैधानिक कार्रवाई करें। मुख्य न्यायाधीश से तुरंत दखल देने की मांग की गई है, क्योंकि देरी से नफरत फैलाने वाली भाषा को और बल मिलेगा, जिससे समाज में अशांति और अराजकता बढ़ सकती है।
बोर्ड ने सभी सेक्युलर राजनीतिक दलों, सिविल सोसाइटी और न्यायप्रिय नागरिकों से अपील की है कि वे इस भेदभावपूर्ण आह्वान पर गंभीरता से ध्यान दें और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए एकजुट हों। असम के मुसलमानों से शांति बनाए रखने और उकसावे का जवाब केवल संवैधानिक व कानूनी तरीकों से देने की सलाह दी गई है।
Next Story