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AIIMS और Google ने बनाए दो नए AI टूल, त्वचा रोगों का पता लगाना होगा आसान
Rajeshwari Nishad
21 Oct 2026 12:04 AM IST

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नई दिल्ली। त्वचा पर दाने, खुजली, लालिमा या असामान्य निशान दिखाई देने पर कई बार बीमारी की सही पहचान करना चिकित्सकों के लिए भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। त्वचा से जुड़ी अलग-अलग बीमारियों के लक्षण एक जैसे दिखाई दे सकते हैं, जिससे सही निदान के लिए अतिरिक्त जांच और विशेषज्ञ की सलाह की जरूरत पड़ती है। इस चुनौती से निपटने के लिए एम्स और गूगल की संयुक्त पहल के तहत ‘इंडसडर्मा’ नाम का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) टूल विकसित किया गया है। यह टूल मरीज की त्वचा की तस्वीरों और लक्षणों से जुड़ी जानकारी का विश्लेषण करके चिकित्सकों को त्वचा रोगों की पहचान करने में सहायता करेगा।
स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। मेडिकल इमेज का विश्लेषण करने से लेकर बीमारियों के संभावित संकेतों को समझने तक, इस तकनीक का उपयोग चिकित्सा सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाने के लिए किया जा रहा है। इंडसडर्मा इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसका उद्देश्य त्वचा रोगों के निदान में डॉक्टरों की मदद करना और मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की संभावनाओं को बढ़ाना है।
क्या है इंडसडर्मा AI टूल?
इंडसडर्मा एक एआई आधारित टूल है, जिसे त्वचा से जुड़ी समस्याओं की पहचान में चिकित्सकों की सहायता करने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। यह मरीज की त्वचा की तस्वीर और उसके लक्षणों से संबंधित जानकारी का विश्लेषण कर सकता है। इसके आधार पर यह डॉक्टर को संभावित त्वचा रोगों के बारे में जानकारी देने में मदद करेगा।
त्वचा पर दिखाई देने वाले निशान हमेशा एक ही बीमारी का संकेत नहीं होते। उदाहरण के लिए, लालिमा और खुजली कई अलग-अलग त्वचा संबंधी स्थितियों में हो सकती है। इसी तरह, दाने, सूजन और त्वचा के रंग में बदलाव के पीछे भी अलग-अलग कारण हो सकते हैं। ऐसे में मरीज के लक्षणों और त्वचा की तस्वीर को एक साथ समझना निदान की प्रक्रिया में उपयोगी हो सकता है।
इंडसडर्मा जैसे एआई टूल का उद्देश्य उपलब्ध जानकारी का व्यवस्थित विश्लेषण करके चिकित्सक को संभावित कारणों पर विचार करने में मदद देना है। इससे डॉक्टर को मरीज की स्थिति का आकलन करने और आगे की जांच या उपचार के बारे में निर्णय लेने में सहायता मिल सकती है।
एम्स और गूगल की संयुक्त पहल
इस टूल को विकसित करने में एम्स और गूगल की भागीदारी स्वास्थ्य सेवाओं में चिकित्सा विशेषज्ञता और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल की संभावनाओं को दर्शाती है। एम्स जैसे प्रमुख चिकित्सा संस्थानों का अनुभव और एआई तकनीक की विश्लेषण क्षमता मिलकर स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के समाधान के नए रास्ते खोल सकती है।
भारत में त्वचा रोगों से संबंधित मामलों में मरीजों को कई बार सही विशेषज्ञ तक पहुंचने में परेशानी होती है। विशेष रूप से दूरदराज के क्षेत्रों में त्वचा रोग विशेषज्ञों की उपलब्धता सीमित हो सकती है। ऐसी परिस्थितियों में चिकित्सकों को अतिरिक्त सहायता देने वाले डिजिटल टूल उपयोगी साबित हो सकते हैं।
हालांकि, किसी भी एआई आधारित चिकित्सा टूल की वास्तविक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करती है कि उसका परीक्षण कितनी व्यापकता से किया गया है, अलग-अलग प्रकार की त्वचा पर उसकी सटीकता कैसी है और वास्तविक चिकित्सा परिस्थितियों में उसके परिणाम कितने भरोसेमंद हैं।
त्वचा रोगों की पहचान में कैसे मिलेगी मदद?
इंडसडर्मा मरीज की त्वचा की तस्वीरों और लक्षणों से जुड़ी जानकारी के आधार पर संभावित त्वचा संबंधी समस्याओं का आकलन करने में डॉक्टर की सहायता करेगा। इस तरह की तकनीक चिकित्सा विशेषज्ञों को उपलब्ध संकेतों को बेहतर ढंग से समझने और संभावित बीमारियों के बीच अंतर करने में मदद कर सकती है।
इस प्रक्रिया में मरीज की त्वचा पर दिखाई देने वाले बदलावों के साथ खुजली, लालिमा, दाने या अन्य लक्षणों की जानकारी महत्वपूर्ण हो सकती है। इन संकेतों का संयुक्त विश्लेषण डॉक्टर को यह तय करने में सहायता दे सकता है कि किन संभावित बीमारियों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है।
हालांकि, केवल तस्वीर के आधार पर हर त्वचा रोग की सही पहचान करना संभव नहीं होता। कुछ बीमारियों के लिए मरीज की मेडिकल हिस्ट्री, शारीरिक परीक्षण, प्रयोगशाला जांच या त्वचा के नमूने की जांच की आवश्यकता पड़ सकती है। इसलिए एआई से मिलने वाले निष्कर्षों को चिकित्सकीय मूल्यांकन के साथ ही देखा जाना चाहिए।
ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में हो सकता है फायदा
भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच को बेहतर बनाना एक बड़ी चुनौती है। महानगरों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता अपेक्षाकृत अधिक हो सकती है, लेकिन छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में मरीजों को त्वचा रोग विशेषज्ञ तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ सकती है।
यदि इंडसडर्मा जैसे टूल का प्रभावी और सुरक्षित इस्तेमाल संभव होता है, तो यह सामान्य चिकित्सकों को त्वचा संबंधी समस्याओं का प्रारंभिक आकलन करने में सहायता दे सकता है। इससे उन मरीजों की पहचान करने में मदद मिल सकती है जिन्हें विशेषज्ञ से परामर्श या आगे की जांच की जरूरत है।
डिजिटल स्वास्थ्य तकनीक का एक अन्य संभावित लाभ यह है कि डॉक्टर कम समय में उपलब्ध जानकारी को व्यवस्थित ढंग से देख सकते हैं। हालांकि, इससे मरीजों को मिलने वाले वास्तविक लाभ का आकलन करने के लिए टूल की उपलब्धता, उपयोग की प्रक्रिया और चिकित्सकीय परीक्षणों के परिणामों की जानकारी जरूरी होगी।
क्या AI डॉक्टर की जगह ले सकता है?
इंडसडर्मा जैसे टूल को डॉक्टर का विकल्प नहीं, बल्कि उनकी सहायता करने वाली तकनीक के रूप में समझना चाहिए। एआई तस्वीरों और लक्षणों में मौजूद पैटर्न का विश्लेषण कर सकता है, लेकिन मरीज की पूरी स्वास्थ्य स्थिति, पुरानी बीमारियों, दवाओं के प्रभाव और अन्य चिकित्सकीय पहलुओं का मूल्यांकन विशेषज्ञ डॉक्टर को ही करना होता है।
त्वचा पर लंबे समय तक बने रहने वाले निशान, तेजी से फैलते दाने, गंभीर सूजन या संक्रमण के संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में समय पर चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है। मरीजों को केवल एआई टूल के परिणाम के आधार पर खुद से दवा शुरू करने या पहले से चल रहे उपचार को बंद करने से बचना चाहिए।
डेटा की सुरक्षा और सटीकता भी महत्वपूर्ण
चूंकि इस तरह के टूल में मरीज की त्वचा की तस्वीरों और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी का इस्तेमाल हो सकता है, इसलिए डेटा की गोपनीयता और सुरक्षा भी महत्वपूर्ण विषय हैं। मरीजों की जानकारी का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जाएगा, उसे कैसे सुरक्षित रखा जाएगा और उसकी पहुंच किन लोगों तक होगी, इन पहलुओं पर स्पष्ट व्यवस्था जरूरी है।
इसके अलावा, एआई टूल की सटीकता अलग-अलग परिस्थितियों और त्वचा के प्रकारों में जांची जानी चाहिए। किसी तकनीक को व्यापक चिकित्सा उपयोग में लाने से पहले यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि वह विभिन्न मरीजों के लिए सुरक्षित और भरोसेमंद तरीके से काम करे।
कुल मिलाकर, एम्स और गूगल की पहल के तहत विकसित इंडसडर्मा त्वचा रोगों की पहचान में एआई के इस्तेमाल की दिशा में एक अहम कदम है। यह चिकित्सकों को मरीजों की तस्वीरों और लक्षणों का विश्लेषण करने में सहायता दे सकता है। हालांकि, इसकी सटीकता, उपलब्धता और वास्तविक उपयोग से जुड़े लाभों का आकलन संबंधित परीक्षणों और आधिकारिक जानकारी के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
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