- Home
- /
- दिल्ली-एनसीआर
- /
- किशाऊ बांध परियोजना पर...
किशाऊ बांध परियोजना पर छह राज्यों का समझौता, 2035 तक पूरा करने का लक्ष्य

नई दिल्ली। यमुना बेसिन की लंबे समय से लंबित किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर बड़ा कदम उठाया गया है। मंगलवार, 15 सितंबर को उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली ने परियोजना समझौते पर हस्ताक्षर किए। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में छह राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके साथ परियोजना को आगे बढ़ाने को लेकर राज्यों के बीच चला आ रहा गतिरोध समाप्त होने का रास्ता साफ हो गया है।
समझौते पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू, राजस्थान के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने हस्ताक्षर किए। इस दौरान केंद्रीय गृह सचिव, जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण विभाग की सचिव और संबंधित राज्यों के मुख्य सचिव भी मौजूद रहे।
किशाऊ परियोजना उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा से बहने वाली टोंस नदी पर प्रस्तावित है। टोंस यमुना की प्रमुख सहायक नदियों में शामिल है। परियोजना के तहत करीब 232.6 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी बांध बनाया जाएगा। सरकार के अनुसार इसकी जल भंडारण क्षमता 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर होगी। परियोजना से सिंचाई के साथ जल आपूर्ति और स्वच्छ जलविद्युत उत्पादन में भी मदद मिलने की उम्मीद है।
केंद्र सरकार ने किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया है। इसके कारण परियोजना के वित्तपोषण में केंद्र की बड़ी हिस्सेदारी रहेगी। सरकारी जानकारी के मुताबिक परियोजना के वित्तीय भार का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा भारत सरकार और शेष करीब 10 प्रतिशत भागीदार राज्य वहन करेंगे। इससे राज्यों पर परियोजना की लागत का अपेक्षाकृत कम भार पड़ेगा।
इस समझौते की नींव जून 2026 में ही पड़ गई थी। 16 जून को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई बैठक में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के बीच किशाऊ परियोजना को आगे बढ़ाने पर सहमति बनी थी। उस समय परियोजना के जल घटक की लागत का 90 प्रतिशत केंद्र और शेष 10 प्रतिशत छह राज्यों द्वारा वहन किए जाने पर सहमति बनी थी। हिमाचल प्रदेश के हिस्से के पानी को दिल्ली और राजस्थान को देने तथा इसके बदले विद्युत घटक की लागत साझा करने पर भी सहमति बनी थी।
परियोजना पूरी होने के बाद इसका सीधा असर उत्तर भारत के कई क्षेत्रों की जल जरूरतों पर पड़ने की उम्मीद है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक किशाऊ परियोजना से लगभग 97 हजार हेक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा मिल सकेगी। इसके अलावा करीब 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ जलविद्युत उत्पादन का अनुमान है। परियोजना से यमुना में अतिरिक्त स्वच्छ पानी के प्रवाह में भी मदद मिलने की बात कही गई है।
दिल्ली के लिए परियोजना को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि राजधानी लंबे समय से पेयजल जरूरतों के लिए यमुना और उससे जुड़ी जल प्रणालियों पर निर्भर है। जल भंडारण की नई क्षमता विकसित होने से नदी के प्रवाह को नियंत्रित करने और जरूरत के समय पानी उपलब्ध कराने में मदद मिलने की उम्मीद है। केंद्र सरकार ने भी कहा है कि परियोजना दिल्ली और यमुना दोनों के लिए लाभकारी होगी तथा पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा दे सकती है।
राजस्थान को भी परियोजना से अतिरिक्त जल उपलब्ध होने की उम्मीद है। समझौते के बाद उपलब्ध जानकारी के अनुसार राजस्थान को लगभग 124 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी मिलने का प्रावधान है, जिसका इस्तेमाल विशेष रूप से शेखावाटी क्षेत्र की जल जरूरतों को पूरा करने में किया जा सकेगा।
परियोजना को लेकर राज्यों के बीच लागत और पानी के बंटवारे जैसे मुद्दों पर लंबे समय से सहमति नहीं बन पा रही थी। अलग-अलग स्रोत इसके गतिरोध की अवधि को अलग तरह से गिनते हैं—कुछ इसे आठ वर्ष का हालिया गतिरोध बताते हैं, जबकि परियोजना का इतिहास इससे कई दशक पुराना है। इसलिए इसे सीधे “86 साल पुराना गतिरोध” कहना आधिकारिक पुष्टि के बिना उचित नहीं होगा। मंगलवार के समझौते ने हालांकि परियोजना के क्रियान्वयन की दिशा में महत्वपूर्ण बाधा जरूर दूर कर दी है।
अब परियोजना के निर्माण और उससे जुड़े विभिन्न चरणों को आगे बढ़ाया जाएगा। परियोजना को 2035 तक पूरा करने का लक्ष्य बताया गया है। इतने बड़े बांध के निर्माण में तकनीकी कार्यों के साथ भूमि, पुनर्वास, पर्यावरणीय स्वीकृतियों और अंतरराज्यीय समन्वय जैसे कई पहलू महत्वपूर्ण होंगे।
किशाऊ परियोजना के पूरा होने पर छह राज्यों को अलग-अलग रूप में पानी, सिंचाई और बिजली से जुड़े लाभ मिलने की उम्मीद है। मंगलवार का समझौता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे वर्षों से अटकी परियोजना के क्रियान्वयन के लिए राज्यों के बीच औपचारिक सहमति का रास्ता खुला है।





