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Passport फीस में 67% बढ़ोतरी बरकरार दिल्ली हाईकोर्ट ने राहत देने से किया इनकार

Ratna Netam
28 Oct 2026 3:31 PM IST
Passport  फीस में 67% बढ़ोतरी बरकरार दिल्ली हाईकोर्ट ने राहत देने से किया इनकार
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नई दिल्ली : 28 अक्टूबर 2026। दिल्ली हाईकोर्ट ने पासपोर्ट शुल्क में बढ़ोतरी के खिलाफ दायर जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि 14 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद पासपोर्ट फीस में 67 प्रतिशत की वृद्धि को अनुचित या अत्यधिक नहीं कहा जा सकता। यह मामला विदेशों में रहने वाले भारतीय नागरिकों, विशेषकर खाड़ी देशों में काम करने वाले प्रवासी श्रमिकों से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि पासपोर्ट बनवाने और नवीनीकरण कराने की फीस बढ़ने से आर्थिक रूप से कमजोर भारतीय कामगारों पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पासपोर्ट शुल्क निर्धारित करना सरकार के नीतिगत अधिकार क्षेत्र का विषय है और ऐसी वित्तीय नीतियों में अदालत का हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए।
14 साल बाद 67 प्रतिशत बढ़ोतरी को कोर्ट ने बताया उचित
दिल्ली हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नितिन वासुदेव सांब्रे और न्यायमूर्ति संजय शर्मा की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की।सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि पासपोर्ट शुल्क में पिछली वृद्धि वर्ष 2012 में की गई थी। इसके बाद केंद्र सरकार ने 2026 में शुल्क में संशोधन किया है।अदालत ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि 14 वर्षों के बाद की गई वृद्धि को अनुचित नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।खंडपीठ ने कहा कि पासपोर्ट जारी करने, आवेदन की प्रक्रिया पूरी करने और उसके नवीनीकरण के लिए शुल्क निर्धारित करना सरकार की जिम्मेदारी है। इसके लिए आर्थिक और प्रशासनिक परिस्थितियों का आकलन करना भी सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है।
प्रवासी भारतीयों की परेशानी को लेकर दायर हुई थी याचिका
यह जनहित याचिका प्रवासी लीगल सेल नामक संगठन की ओर से दाखिल की गई थी। संगठन ने विदेशों में रहने वाले भारतीय नागरिकों, खासकर खाड़ी देशों में काम करने वाले कम आय वाले श्रमिकों की समस्याओं को अदालत के सामने रखा।याचिकाकर्ता का कहना था कि बड़ी संख्या में भारतीय कामगार रोजगार के लिए सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत और अन्य खाड़ी देशों में रहते हैं।इनमें निर्माण कार्य से जुड़े मजदूर, प्लंबर, मैकेनिक और अन्य तकनीकी कर्मचारी शामिल हैं। कई श्रमिक सीमित आय में अपने परिवारों का पालन-पोषण करते हैं।संगठन ने तर्क दिया कि पासपोर्ट फीस बढ़ने से इन कामगारों की आर्थिक मुश्किलें बढ़ सकती हैं। विशेष रूप से ऐसे लोगों को अधिक परेशानी हो सकती है, जिन्हें अपने साथ परिवार के सदस्यों के पासपोर्ट भी बनवाने या नवीनीकृत कराने पड़ते हैं।
विदेशों में पासपोर्ट फीस करीब 11,900 रुपये होने का दावा
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि विदेशों में रहने वाले भारतीयों को पासपोर्ट संबंधी सेवाओं के लिए लगभग 11,900 रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं।संगठन के अनुसार, पहले यह शुल्क लगभग 7,000 रुपये था, जिसे बढ़ाकर करीब 11,900 रुपये कर दिया गया।याचिका में भारत में सामान्य पासपोर्ट के लिए 2,500 रुपये शुल्क का भी उल्लेख किया गया। संगठन ने सवाल उठाया कि विदेशों में काम करने वाले भारतीय नागरिकों से इतनी अधिक राशि क्यों ली जा रही है।हालांकि, ये आंकड़े याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में प्रस्तुत किए गए थे। विभिन्न देशों में स्थानीय मुद्रा, संबंधित शुल्क और अतिरिक्त सेवा शुल्क के कारण वास्तविक भुगतान अलग हो सकता है।
आर्थिक रूप से कमजोर श्रमिकों के लिए रियायत की मांग
याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की थी कि आर्थिक रूप से कमजोर प्रवासी भारतीय श्रमिकों के लिए पासपोर्ट शुल्क में रियायत की व्यवस्था की जाए।संगठन ने कहा कि विदेशों में काम करने वाले सभी भारतीयों की आर्थिक स्थिति एक जैसी नहीं होती। बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी हैं, जिनकी कमाई का बड़ा हिस्सा भारत में रहने वाले परिवारों को भेज दिया जाता है।ऐसे में पासपोर्ट नवीनीकरण की बढ़ी हुई फीस उनके लिए आर्थिक समस्या बन सकती है।हालांकि, अदालत ने इस मांग पर व्यावहारिक सवाल उठाए। खंडपीठ ने पूछा कि विदेशों में रहने वाले भारतीय श्रमिकों की आर्थिक स्थिति का निर्धारण किस आधार पर किया जाएगा।कोर्ट ने यह भी सवाल किया कि अगर किसी दूसरे देश की संस्था आर्थिक स्थिति का प्रमाणपत्र जारी करती है, तो क्या भारत सरकार उसे स्वीकार करने के लिए बाध्य होगी।अदालत ने कहा कि इस प्रकार की रियायती व्यवस्था बनाने का निर्णय सरकार के नीतिगत अधिकार क्षेत्र में आता है।
अदालत ने पूछा- किस कानूनी अधिकार का हुआ उल्लंघन?
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता से पूछा कि शुल्क बढ़ोतरी के कारण किस कानूनी या संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है।याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 14 और समानता के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए आर्थिक रूप से कमजोर प्रवासी भारतीयों के लिए राहत की मांग की।हालांकि, अदालत ने कहा कि केवल समानता के आधार पर शुल्क में विशेष रियायत देने का निर्देश जारी करने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार होना आवश्यक है।खंडपीठ ने माना कि सरकार के वित्तीय और प्रशासनिक निर्णयों में न्यायिक हस्तक्षेप करते समय संयम बरतना चाहिए।
केंद्र सरकार ने बताई फीस बढ़ाने की वजह
केंद्र सरकार ने इससे पहले संसद में पासपोर्ट शुल्क बढ़ाने के पीछे कई कारण बताए थे।विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने 31 जुलाई 2026 को लोकसभा में जानकारी दी थी कि पासपोर्ट संबंधी सेवाओं की लागत में पिछले 14 वर्षों के दौरान बढ़ोतरी हुई है।सरकार के अनुसार, पासपोर्ट पुस्तिका की छपाई, पुलिस सत्यापन, तकनीकी सुविधाओं, सेवा प्रदाताओं और ई-पासपोर्ट परियोजना पर खर्च बढ़ा है।नई तकनीक और सुरक्षा मानकों को लागू करने के कारण भी पासपोर्ट जारी करने की लागत में वृद्धि हुई है।केंद्र सरकार ने बताया कि शुल्क में संशोधन सेवाओं की लागत और संचालन संबंधी जरूरतों की समीक्षा के आधार पर किया गया है।
1 जुलाई से लागू हुई नई पासपोर्ट फीस
केंद्र सरकार ने पासपोर्ट संशोधन नियम, 2026 के तहत नई शुल्क व्यवस्था लागू की थी।यह व्यवस्था 1 जुलाई 2026 से प्रभावी हुई। इसके अंतर्गत भारत में सामान्य श्रेणी के 36 पन्नों वाले नए पासपोर्ट का शुल्क 1,500 रुपये से बढ़ाकर 2,500 रुपये कर दिया गया।इस प्रकार सामान्य पासपोर्ट की फीस में करीब 67 प्रतिशत की वृद्धि हुई।सरकार ने कहा कि वर्ष 2012 के बाद पहली बार इतने लंबे अंतराल में शुल्क की समीक्षा की गई है। इससे पहले भी अलग-अलग वर्षों में पासपोर्ट फीस में संशोधन किए गए थे।
पहले भी हाईकोर्ट पहुंचा था मामला
पासपोर्ट शुल्क बढ़ोतरी को लेकर यह विवाद पहले भी दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच चुका था।22 जुलाई 2026 को अदालत ने केंद्र सरकार को शुल्क बढ़ोतरी के खिलाफ दिए गए अभ्यावेदन पर विचार करने का निर्देश दिया था।हाईकोर्ट ने विदेश मंत्रालय से कहा था कि याचिकाकर्ता की आपत्तियों पर यथाशीघ्र, संभव हो तो तीन महीने के भीतर निर्णय लिया जाए।इसके बाद मामला दोबारा अदालत के सामने आया। इस बार खंडपीठ ने शुल्क बढ़ोतरी में हस्तक्षेप करने का पर्याप्त कानूनी आधार नहीं पाते हुए जनहित याचिका खारिज कर दी।
पासपोर्ट बनवाने वालों पर क्या होगा असर?
दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद 1 जुलाई 2026 से लागू संशोधित पासपोर्ट शुल्क व्यवस्था पर फिलहाल कोई न्यायिक रोक नहीं लगी है।इसका मतलब है कि नए पासपोर्ट और नवीनीकरण के लिए आवेदन करने वाले लोगों को लागू श्रेणी के अनुसार निर्धारित शुल्क देना होगा।हालांकि, अदालत ने सरकार को भविष्य में किसी विशेष श्रेणी के आवेदकों के लिए शुल्क रियायत देने से नहीं रोका है। ऐसी व्यवस्था बनाना सरकार के निर्णय पर निर्भर करेगा।फिलहाल हाईकोर्ट के फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि केवल 14 वर्षों के अंतराल में 67 प्रतिशत फीस बढ़ने के आधार पर शुल्क संशोधन को अनुचित घोषित नहीं किया जा सकता।
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