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सेना के 6 वीरों ने रचा इतिहास, जनरल सेठ ने किया सम्मानित

Kavita2
6 Nov 2026 11:55 AM IST
सेना के 6 वीरों ने रचा इतिहास, जनरल सेठ ने किया सम्मानित
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नई दिल्ली। देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए गंभीर रूप से घायल होने वाले भारतीय सेना के छह बहादुर जवानों ने अपनी अदम्य इच्छाशक्ति, साहस और मेहनत से अंतरराष्ट्रीय खेल जगत में नया इतिहास रच दिया है। युद्ध जैसी परिस्थितियों और सैन्य अभियानों के दौरान शारीरिक रूप से दिव्यांग हुए इन सैनिकों ने हार मानने के बजाय खेलों को अपने जीवन का नया लक्ष्य बनाया। जापान में आयोजित एशियाई पैरा खेल 2026 में शानदार प्रदर्शन करते हुए इन जवानों ने कुल छह पदक जीतकर देश का गौरव बढ़ाया। उनकी इसी उपलब्धि को सम्मानित करने के लिए भारतीय सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ ने गुरुवार, 5 नवंबर को नई दिल्ली में विशेष सम्मान समारोह आयोजित किया।

जापान के आइची-नागोया में 18 से 24 अक्टूबर तक आयोजित पांचवें एशियाई पैरा खेलों में भारतीय सेना के नौ पैरा खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया था। इनमें से छह खिलाड़ियों ने एक स्वर्ण, दो रजत और तीन कांस्य पदक अपने नाम किए। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इन खिलाड़ियों में कई ऐसे सैनिक शामिल हैं, जिन्होंने सैन्य सेवा के दौरान बारूदी सुरंगों के विस्फोट और कठिन परिस्थितियों में अपने अंग गंवा दिए थे। इसके बावजूद उन्होंने जीवन की चुनौतियों को पीछे छोड़ते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा साबित की।

सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ ने सभी पदक विजेता सैनिकों से मुलाकात कर उनके साहस और खेल उपलब्धियों की सराहना की। उन्होंने खिलाड़ियों के समर्पण और अनुशासन को भारतीय सेना की मजबूत इच्छाशक्ति का उदाहरण बताया। इस अवसर पर सेना की ओर से कहा गया कि ये पदक घायल सैनिकों के पुनर्वास और खेल उत्कृष्टता के लिए लगातार किए जा रहे प्रयासों का प्रमाण हैं।

इन खिलाड़ियों में सबसे शानदार प्रदर्शन सूबेदार सोलैराज डी. का रहा, जिन्होंने लंबी कूद में स्वर्ण पदक हासिल किया। तमिलनाडु के तूतीकोरिन निवासी सोलैराज भारतीय सेना की 21 मद्रास रेजिमेंट से जुड़े हैं। वर्ष 2018 में बटालिक क्षेत्र की अत्यधिक ठंड के कारण उनके बाएं पैर में रक्त संचार प्रभावित हो गया था। इसके बाद घुटने के नीचे से उनका पैर काटना पड़ा।

इतनी बड़ी शारीरिक चुनौती के बावजूद सोलैराज ने खेलों में अपना भविष्य बनाया। उन्होंने एशियाई पैरा खेलों में 7.15 मीटर की छलांग लगाकर स्वर्ण पदक जीता और एशियाई रिकॉर्ड भी कायम किया। उन्होंने अपने खिताब का सफलतापूर्वक बचाव करते हुए यह साबित कर दिया कि दृढ़ संकल्प के सामने शारीरिक बाधाएं भी छोटी पड़ सकती हैं।

सूबेदार एच. होकाटो सेमा की कहानी भी साहस और संघर्ष से भरी हुई है। नागालैंड के इस सैनिक ने वर्ष 2002 में नियंत्रण रेखा के पास चौकीबल क्षेत्र में बारूदी सुरंग विस्फोट के दौरान अपना बायां पैर गंवा दिया था। उस समय उन्हें सेना में सेवा देते हुए लगभग 16 महीने ही हुए थे।

इस हादसे के बाद उन्होंने जीवन को नई दिशा दी और पैरा खेलों में अपनी पहचान बनाई। जापान में आयोजित प्रतियोगिता में उन्होंने गोला फेंक स्पर्धा में कांस्य पदक जीता। इससे पहले भी वह अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीत चुके हैं। पेरिस पैरालंपिक में पदक हासिल कर उन्होंने नागालैंड का नाम रोशन किया था।

सूबेदार अजय कुमार ने भी अपने संघर्ष को उपलब्धि में बदला। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले से आने वाले अजय कुमार भारतीय सेना की 12 डोगरा रेजिमेंट से जुड़े हैं। वर्ष 2017 में उरी क्षेत्र में बारूदी सुरंग की चपेट में आने से उन्हें अपना बायां पैर गंवाना पड़ा था।

इसके बाद उन्होंने पैरा एथलेटिक्स में अपनी प्रतिभा निखारी और एशियाई पैरा खेलों में 400 मीटर दौड़ में कांस्य पदक जीतकर देश को गौरवान्वित किया। इससे पहले हांगझू एशियाई पैरा खेलों में भी वह पदक हासिल कर चुके हैं।

डिस्कस थ्रो यानी चक्का फेंक स्पर्धा में भारतीय सेना के दो जवानों ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। हवलदार राकेश कुंडू ने रजत पदक जीता, जबकि हवलदार प्रदीप कुमार ने कांस्य पदक हासिल किया।

राकेश कुंडू वर्ष 2018 में हैदराबाद स्थित आर्टिलरी सेंटर में चोट लगने के कारण पैर से संबंधित शारीरिक समस्या का सामना करने लगे थे। उन्होंने वर्ष 2023 में सेना के पैरालंपिक प्रशिक्षण केंद्र से जुड़कर खेलों में नई शुरुआत की। लगातार मेहनत और प्रशिक्षण के बल पर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में रजत पदक जीत लिया।

वहीं, हवलदार प्रदीप कुमार को वर्ष 2019 में सुंदरबनी क्षेत्र में बारूदी सुरंग विस्फोट के कारण अपने बाएं पैर का एक हिस्सा गंवाना पड़ा था। उन्होंने चक्का फेंक में शानदार प्रदर्शन करते हुए कांस्य पदक जीता। प्रतियोगिता में उनका सर्वश्रेष्ठ थ्रो 51.15 मीटर रहा।

भारतीय सेना के हवलदार कपिल कुमार ने तैराकी में देश को रजत पदक दिलाया। वर्ष 2020 में पुंछ क्षेत्र में घायल हुए कपिल कुमार ने 400 मीटर फ्रीस्टाइल एस-10 स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन किया। उन्होंने बेहद करीबी मुकाबले में ईरान के खिलाड़ी शाहीन इजादयार को पीछे छोड़कर दूसरा स्थान हासिल किया। दोनों खिलाड़ियों के समय में केवल 0.21 सेकंड का अंतर रहा।

सम्मान समारोह में सेना प्रमुख ने नायक गजेंद्र सिंह की पत्नी सिमरन शर्मा को भी सम्मानित किया। सिमरन ने एशियाई पैरा खेलों में 100 मीटर और 200 मीटर टी-12 स्पर्धाओं में दो स्वर्ण पदक जीते। उनके पति नायक गजेंद्र सिंह भारतीय सेना की आर्मी सर्विस कोर में कार्यरत हैं।

इस अवसर पर खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने वाले प्रशिक्षकों और सहयोगी कर्मचारियों के योगदान को भी सराहा गया। इनमें सूबेदार बिबिन देव, सूबेदार मुर्तजा, हवलदार अविनाश ए. और आर्मी पैरालंपिक नोड के प्रभारी लेफ्टिनेंट कर्नल दलजीत सिंह शामिल रहे।

भारतीय सेना घायल और दिव्यांग सैनिकों के पुनर्वास के लिए लंबे समय से विशेष प्रयास कर रही है। इसी उद्देश्य से वर्ष 2017 में पुणे के खड़की क्षेत्र में आर्मी पैरालंपिक नोड की स्थापना की गई थी। यहां सैनिकों को विशेष चिकित्सा सहायता, कृत्रिम अंगों से संबंधित सुविधाएं, पुनर्वास और आधुनिक खेल प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाता है।

इस केंद्र का उद्देश्य शारीरिक रूप से घायल सैनिकों को आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ उनकी खेल प्रतिभा को विकसित करना भी है। यहां प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले कई खिलाड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर चुके हैं।

एशियाई पैरा खेल 2026 में भारत ने कुल 114 पदक जीतकर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दर्ज किया। इनमें 30 स्वर्ण, 35 रजत और 49 कांस्य पदक शामिल रहे। भारत ने वर्ष 2023 के हांगझू एशियाई पैरा खेलों में हासिल 108 पदकों का पिछला रिकॉर्ड भी तोड़ दिया।

इन उपलब्धियों ने भारतीय पैरा खेलों के बढ़ते स्तर को भी दर्शाया है। विशेष रूप से सेना के दिव्यांग जवानों की सफलता यह संदेश देती है कि कठिन परिस्थितियां किसी व्यक्ति के सपनों और क्षमताओं को समाप्त नहीं कर सकतीं।

सेना प्रमुख द्वारा किया गया यह सम्मान केवल छह पदक विजेताओं की उपलब्धि का उत्सव नहीं, बल्कि उन तमाम सैनिकों के संघर्ष और साहस को भी सलाम है, जिन्होंने देश की रक्षा के दौरान गंभीर चोटें झेलीं। इन जवानों ने साबित किया है कि वे सीमा पर भी देश का गौरव बढ़ाते हैं और खेल के मैदान में भी तिरंगा ऊंचा रखने का जज्बा रखते हैं।

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