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मध्य प्रदेश में अब तक 35.6 इंच बारिश, आधे जिलों में अधूरा रह सकता है मानसून का कोटा

भोपाल। मध्य प्रदेश में मानसून सीजन अब अपने अंतिम चरण में पहुंच गया है। प्रदेश में इस सीजन में अब तक औसतन करीब 35.6 इंच बारिश दर्ज की गई है, जो सीजन की औसत बारिश का करीब 95.4 प्रतिशत है। मानसून सीजन समाप्त होने में अब केवल चार दिन बचे हैं। ऐसे में प्रदेश के कई जिलों में इस बार सामान्य बारिश का आंकड़ा पूरा नहीं हो पाने की संभावना है।
मानसून सीजन की अवधि 30 सितंबर तक मानी जाती है। ऐसे में बारिश का निर्धारित आंकड़ा पूरा करने के लिए प्रदेश के पास अब बहुत कम समय बचा है। मौसम की मौजूदा स्थिति को देखते हुए अगले कुछ दिनों में बड़े स्तर पर भारी बारिश की संभावना भी कम मानी जा रही है। इसका असर उन जिलों पर पड़ सकता है, जहां अभी सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है।
सामान्य बारिश का दायरा सीजन की औसत बारिश के 96 प्रतिशत से 104 प्रतिशत के बीच माना जाता है। मध्य प्रदेश फिलहाल 95.4 प्रतिशत पर है। यानी प्रदेश स्तर पर सामान्य बारिश की न्यूनतम सीमा तक पहुंचने के लिए भी कुछ और बारिश की जरूरत है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश के 25 जिलों में सीजन की 100 प्रतिशत या इससे अधिक बारिश हो चुकी है। इन जिलों में मानसून का निर्धारित कोटा पूरा हो गया है। वहीं अधिकांश अन्य जिलों में अभी भी बारिश का आंकड़ा निर्धारित स्तर तक नहीं पहुंच पाया है।
राज्य के अलग-अलग हिस्सों में इस बार मानसून की तस्वीर एक जैसी नहीं रही। कुछ जिलों में लगातार बारिश और मजबूत मानसूनी सिस्टम के कारण अच्छी वर्षा दर्ज की गई, जबकि कई क्षेत्रों में बारिश का वितरण कमजोर रहा। यही वजह है कि प्रदेश का औसत आंकड़ा सामान्य स्तर के करीब होने के बावजूद कई जिलों में बारिश की कमी बनी हुई है।
बारिश की कमी के मामले में इंदौर संभाग सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल है। यहां कई इलाकों में मानसून के दौरान अपेक्षा के मुताबिक बारिश नहीं हुई। अब सीजन समाप्त होने में कुछ ही दिन शेष रहने के कारण कमी पूरी होने की संभावना भी कम होती जा रही है।
प्रदेश में इस मानसून सीजन में अब तक करीब 35.6 इंच बारिश दर्ज हुई है। प्रतिशत के लिहाज से यह औसत का 95.4 प्रतिशत है। सामान्य बारिश की न्यूनतम सीमा 96 प्रतिशत होने के कारण प्रदेश का कुल आंकड़ा उससे थोड़ा नीचे है।
हालांकि राज्य स्तर का औसत आंकड़ा सामान्य के बेहद करीब है, लेकिन जिलेवार स्थिति में बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। जिन 25 जिलों में 100 प्रतिशत या उससे अधिक बारिश दर्ज हो चुकी है, वहां स्थिति बेहतर है। इसके विपरीत बाकी जिलों में कई जगह अभी मानसून का कोटा पूरा होना बाकी है।
मौसम के जानकारों के लिए अब मानसून के आखिरी चार दिन महत्वपूर्ण हैं। यदि इन दिनों प्रदेश के कम बारिश वाले इलाकों में अच्छी वर्षा होती है तो कुछ जिलों की स्थिति में सुधार हो सकता है। लेकिन बड़े पैमाने पर भारी बारिश की संभावना कम होने के कारण सभी जिलों का निर्धारित कोटा पूरा होना मुश्किल माना जा रहा है।
बारिश का जिलेवार वितरण कृषि के लिहाज से भी महत्वपूर्ण होता है। प्रदेश की खेती का बड़ा हिस्सा मानसून की बारिश पर निर्भर है। बारिश समय पर और पर्याप्त मात्रा में होने से खरीफ फसलों को फायदा मिलता है, जबकि लंबे अंतराल या सामान्य से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में किसानों को अतिरिक्त सिंचाई की जरूरत पड़ सकती है।
मध्य प्रदेश में मानसून के दौरान कई बार अलग-अलग मौसम प्रणालियों के प्रभाव से भारी बारिश भी दर्ज की गई। कुछ जिलों में थोड़े समय में ही अच्छी वर्षा होने के कारण उनका सीजन का कोटा पूरा हो गया। दूसरी तरफ ऐसे जिले भी रहे जहां मानसून सक्रिय होने के बावजूद अपेक्षित मात्रा में पानी नहीं बरसा।
अब मानसून सीजन समाप्त होने के करीब पहुंचने के साथ ही पूरे सीजन के बारिश के आंकड़ों की तस्वीर भी लगभग स्पष्ट होने लगी है। 30 सितंबर तक होने वाली बारिश अंतिम आंकड़े को प्रभावित करेगी। यदि अगले चार दिनों में अच्छी वर्षा नहीं होती है तो राज्य के करीब आधे जिले इस वर्ष अपना मौसमी बारिश का कोटा पूरा किए बिना ही मानसून सीजन समाप्त कर सकते हैं।
प्रदेश के लिए कुल बारिश का आंकड़ा सामान्य के बेहद करीब होने के बावजूद जिलेवार कमी महत्वपूर्ण है। औसत आंकड़े में अधिक बारिश वाले जिलों का योगदान भी शामिल होता है। इसलिए राज्य का कुल प्रतिशत देखकर प्रत्येक जिले की स्थिति का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
इंदौर संभाग में कम बारिश की स्थिति इस अंतर को स्पष्ट करती है। यहां बारिश की कमी ने मानसून के अंतिम दिनों में चिंता बढ़ाई है। अब मौसम प्रणाली कमजोर रहने पर बारिश के आंकड़े में बहुत बड़े बदलाव की उम्मीद कम है।
मानसून सीजन खत्म होने के बाद भी अक्टूबर में बारिश हो सकती है, लेकिन वह 1 जून से 30 सितंबर तक के आधिकारिक मानसून सीजन के आंकड़ों में शामिल नहीं होगी। इसलिए 30 सितंबर तक दर्ज होने वाली बारिश ही इस साल के मानसून प्रदर्शन की अंतिम तस्वीर तय करेगी।
प्रदेश के जिन 25 जिलों में 100 प्रतिशत या उससे अधिक बारिश हो चुकी है, वहां मानसून का प्रदर्शन बेहतर रहा है। शेष जिलों में अगले कुछ दिनों की बारिश यह तय करेगी कि वे सामान्य बारिश की श्रेणी तक पहुंचते हैं या कमी के साथ सीजन समाप्त करते हैं।
बारिश में जिलेवार अंतर का असर जलाशयों, स्थानीय जल स्रोतों और भूजल की स्थिति पर भी पड़ सकता है। अच्छी बारिश वाले क्षेत्रों में जल स्रोतों को पर्याप्त पानी मिला है, जबकि कम वर्षा वाले इलाकों में आने वाले महीनों के दौरान जल उपलब्धता पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।
फिलहाल प्रदेश में 35.6 इंच बारिश के साथ मानसून का आंकड़ा औसत के 95.4 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। सामान्य श्रेणी की न्यूनतम सीमा 96 प्रतिशत होने के कारण पूरे प्रदेश का आंकड़ा इसके बेहद करीब है। इसके बावजूद कई जिलों का अपना बारिश का कोटा अभी अधूरा है।
अब मानसून के अंतिम चार दिनों पर नजर रहेगी। इस दौरान होने वाली बारिश कुछ जिलों के आंकड़े सुधार सकती है, लेकिन मौजूदा स्थिति में प्रदेश के लगभग आधे जिलों में इस साल सीजन की निर्धारित बारिश पूरी नहीं होने की संभावना बनी हुई है।





