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डॉक्टर के पास आने वाले 30 प्रतिशत बच्चे पाचन या यकृत विकारों से पीड़ित
SHIDDHANT
14 April 2026 7:26 PM IST

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Delhi दिल्ली। मेडिकल साइंस की बाल रोग पाठ्यक्रमों से जुड़ी एक महत्वपूर्ण पुस्तक मंगलवार को जारी की गई। यह पोस्ट ग्रेजुएट पाठ्यक्रमों के लिए ‘बाल गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी, हेपेटोलॉजी और पोषण’ पाठ्यपुस्तक का द्वितीय संस्करण है। यह प्रोफेसर अनुपम सिबल और डॉ. सरथ गोपालन के संपादन में तैयार की गईं व जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन की प्रोफेसर कैथलीन बी. श्वार्ट्ज की ओर से लिखित प्रस्तावना वाली पुस्तक है।
बाल चिकित्सा गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी, हेपेटोलॉजी और पोषण की इस पाठ्यपुस्तक के दूसरे संस्करण में इस क्षेत्र में हुई नवीनतम प्रगति को शामिल किया गया है। 45 अध्यायों में इसका विस्तार किया गया है जिसमें कई नए विषय भी हैं। यह पुस्तक सूजन आंत्र रोग, न्यूरो-गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी, सीलिएक रोग और गाय के दूध के प्रोटीन से एलर्जी जैसे प्रमुख क्षेत्रों के साथ-साथ गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल और यकृत संबंधी रोगों में आनुवंशिकी की भूमिका, एंडोस्कोपी और यकृत प्रत्यारोपण जैसे उभरते क्षेत्रों के बारे में विस्तृत विवरण प्रदान करती है।
केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने इस पाठ्यपुस्तक के द्वितीय संस्करण का विमोचन किया। पुस्तक के अनुसार यह पाया गया है कि बाल रोग विशेषज्ञों के पास आने वाले लगभग 30 प्रतिशत बच्चे पाचन और यकृत संबंधी विकारों से पीड़ित होते हैं जो इस क्षेत्र में अद्यतन ज्ञान और विशेष प्रशिक्षण के महत्व पर बल देता है।
यह पाठ्यपुस्तक बाल रोग, बाल चिकित्सा गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी के प्रशिक्षुओं और कार्यरत बाल रोग विशेषज्ञों के लिए व्यापक संसाधन के रूप में तैयार की गई है। इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री ने कहा कि एक बार ठोस नैदानिक आधार स्थापित हो जाने पर एआई मूल्यवान सहायक, सहयोगी और सुविधा प्रदाता के रूप में कार्य कर सकती है। डॉ. जितेंद्र सिंह ने चिकित्सा संबंधी ज्ञान के तीव्र विस्तार का उल्लेख करते हुए कहा कि शोध और प्रकाशन की गति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसके कारण चिकित्सा शिक्षा के लिए वैचारिक स्पष्टता और मूलभूत नैदानिक प्रशिक्षण पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक हो गया है।
उन्होंने कहा कि यद्यपि नई तकनीकों ने सूचना तक पहुंच को आसान बना दिया है, फिर भी सीखने की प्रक्रिया मूलभूत समझ और व्यावहारिक नैदानिक अनुभव पर आधारित होनी चाहिए। उन्होंने प्रौद्योगिकी के एकीकरण और बीमारियों की बढ़ती जटिलता सहित उभरती चुनौतियों के अनुरूप चिकित्सा शिक्षा प्रणालियों को लगातार अपडेट करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
उन्होंने इस बात पर बल दिया कि चिकित्सा जगत के युवा पेशेवरों को मजबूत बुनियादी ज्ञान विकसित करने और धीरे-धीरे चुने हुए क्षेत्रों में विशेषज्ञता हासिल करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के मुताबिक इस पाठ्यक्रम का संपादन अपोलो हॉस्पिटल्स समूह के ग्रुप मेडिकल डायरेक्टर और वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ एवं यकृत रोग विशेषज्ञ प्रोफेसर अनुपम सिबल और दिल्ली के मधुकर रेनबो चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल के सलाहकार बाल रोग विशेषज्ञ एवं यकृत रोग विशेषज्ञ डॉ. सरथ गोपालन ने किया है।
श्रीनगर के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर और बाल रोग विशेषज्ञ एवं यकृत रोग विशेषज्ञ डॉ. मोहम्मद इशाक मलिक इसके सह-संपादक हैं। इस पुस्तक की प्रस्तावना जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन की प्रोफेसर कैथलीन बी. श्वार्ट्ज ने लिखी है। मंत्रालय के मुताबिक पाठ्यपुस्तक का पहला संस्करण 2016 में प्रकाशित हुआ था और तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने इसको जारी किया था। वर्तमान संस्करण को उसी के आधार पर तैयार किया गया है और उसमें इस क्षेत्र में नवीनतम वैज्ञानिक विकास और नैदानिक पद्धतियों को शामिल किया गया है।
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