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New Delhi नई दिल्ली: गांधीनगर से नई दिल्ली तक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सत्ता में 25 साल का कार्यकाल न केवल लगातार बने रहने के कारण, बल्कि उनके खास लीडरशिप स्टाइल के कारण भी अनोखा है। एक लीडर के तौर पर उन्हें जो चीज़ सबसे अलग बनाती है, वह है - फ़ैसले लेने में केंद्रीकृत तरीका, काम पूरा करने पर ज़ोर देने वाली गवर्नेंस और हर तरह के वोटर्स के साथ सीधा जुड़ाव बनाए रखने की क्षमता, जिससे उनकी राजनीतिक मज़बूती बढ़ती है।
जैसा कि बताया गया है, यह सफ़र बहुत साधारण हालात में शुरू हुआ था, जहाँ बचपन में पढ़ाई के साथ-साथ वे अपने परिवार की चाय की दुकान पर मदद करते थे। 17 साल की उम्र में उन्होंने घर छोड़ दिया और लगभग दो साल तक पूरे भारत की यात्रा की। बाद में वे अहमदाबाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े और अपना जीवन संगठन को समर्पित करने का फ़ैसला किया।
अगले कुछ सालों में, वे RSS में आगे बढ़ते गए और गुजरात में उन्हें ज़्यादा ज़िम्मेदारियाँ मिलीं। इन सालों ने उनकी संगठनात्मक क्षमता, अनुशासन और राजनीति के प्रति ज़मीनी नज़रिए को आकार दिया। उनके शुरुआती राजनीतिक जीवन का एक हिस्सा तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाई गई इमरजेंसी के दौरान गुज़रा। भारतीय जनता पार्टी (BJP) गुजरात के अनुसार, उस समय वे अंडरग्राउंड रहकर काम करते थे, विरोध को संगठित करते थे और सरकारी कार्रवाई से बचते थे।
1987 से, राज्य BJP में संगठनात्मक सफलता ने उन्हें पार्टी के मुख्य रणनीतिकारों में से एक के रूप में तेज़ी से उभारा और पार्टी के भीतर राष्ट्रीय स्तर पर उनका ध्यान खींचा गया। 1995 में, गुजरात में BJP की जीत के बाद, नरेंद्र मोदी को पार्टी के राष्ट्रीय सचिव के तौर पर नई दिल्ली भेजा गया, जहाँ उन्हें कई उत्तरी राज्यों की ज़िम्मेदारी दी गई। 1998 में, उन्हें राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) के पद पर पदोन्नत किया गया, जो BJP के सबसे महत्वपूर्ण पदों में से एक है। अक्टूबर 2001 में, पार्टी नेतृत्व ने उन्हें गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में केशुभाई पटेल की जगह लेने के लिए चुना।
यह फ़ैसला राज्य के लिए एक मुश्किल समय में लिया गया था, क्योंकि राज्य विनाशकारी भुज भूकंप से उबर रहा था और राजनीतिक व प्रशासनिक चुनौतियों का सामना कर रहा था। उन्होंने 2001 से 2014 तक मुख्यमंत्री और मई 2014 से प्रधानमंत्री के तौर पर काम किया है। भारत जैसे विविध और प्रतिस्पर्धी लोकतंत्र में इतने लंबे समय तक लोकप्रियता और जनता का समर्थन बनाए रखना एक दुर्लभ बात है। उनकी एक और खास बात यह रही है कि उन्होंने गवर्नेंस को ऐसी चीज़ माना है जिसके नतीजे मापे जा सकें; साथ ही, पीएम मोदी के राजनीतिक संदेशों में हमेशा सिर्फ़ पॉलिसी की घोषणा करने के बजाय उसे लागू करने पर ज़ोर दिया गया है।
इस दौरान देश में बड़े आर्थिक और सामाजिक बदलाव हुए। वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, 2011-12 में जो अत्यधिक गरीबी 16.2 प्रतिशत थी, वह 2022-23 में घटकर 2.3 प्रतिशत रह गई। साथ ही, इंफ्रास्ट्रक्चर और बुनियादी सेवाओं तक पहुँच के मामले में भी काफी तरक्की हुई। टेक्नोलॉजी को मोदी-मॉडल का एक और अहम स्तंभ माना जा सकता है। उनके आलोचक भी मानते हैं कि उनके नेतृत्व में डिजिटल गवर्नेंस पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन का मुख्य हिस्सा बन गया है।
डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर सिस्टम और डिजिटल पहचान प्रणालियों के विस्तार ने भारत के पेमेंट इकोसिस्टम को बदल दिया है। इससे लीकेज कम हुआ है, पारदर्शिता बढ़ी है और पब्लिक सर्विस डिलीवरी में कुशलता आई है। एक और अहम बात यह है कि वे कल्याणकारी राजनीति और आर्थिक विकास की बातों को एक साथ लेकर चलने में माहिर हैं। गुजरात में उनके कार्यकाल के दौरान इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार, औद्योगिक निवेश, सिंचाई परियोजनाएँ और प्रशासनिक सुधार हुए, जिससे वह बना जिसे उनके समर्थक "गुजरात मॉडल" कहते हैं।
नई दिल्ली आने के बाद, उन्होंने इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च, मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी पहल और GST (गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स) व IBC (इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड) जैसे सुधारों के ज़रिए उस नज़रिए को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की कोशिश की। भारत का आर्थिक प्रदर्शन मज़बूत हुआ। इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड ने अनुमान लगाया है कि भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहेगा, जो अनिश्चित वैश्विक माहौल के बावजूद देश की मज़बूती और घरेलू मांग को दिखाता है। इसके अलावा, उनकी बातचीत करने की कला भी अहम है। वे जन-सभाओं, सोशल मीडिया पर लोगों से जुड़ने, "मन की बात" जैसे रेडियो कार्यक्रमों और बहुत ही व्यक्तिगत राजनीतिक अभियानों के ज़रिए सीधे आम लोगों से उनकी भाषा में बात करते हैं, और अक्सर पारंपरिक राजनीतिक बिचौलियों को दरकिनार कर देते हैं।
विदेश नीति के मामले में, पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान मज़बूत की है, कूटनीतिक संबंध बढ़ाए हैं और दुनिया की बड़ी ताकतों के साथ रिश्ते मज़बूत करते हुए खुद को 'ग्लोबल साउथ' की एक अहम आवाज़ के तौर पर स्थापित किया है। जानकार अक्सर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस ज़्यादा मज़बूत रुख़ को मोदी युग की एक अहम पहचान बताते हैं। जहाँ आलोचकों ने इस पर सवाल उठाए हैं, वहीं उनके समर्थकों का कहना है कि लंबे समय से अटके सुधारों और बड़े पैमाने पर विकास की योजनाओं को लागू करने के लिए मज़बूत नेतृत्व और निर्णायक फ़ैसले लेना ज़रूरी था। इस तरह, एक और अहम पड़ाव पार करते हुए, प्रधानमंत्री ने भारत के राजनीतिक और प्रशासनिक माहौल को उस तरह से बदला है, जैसा आज़ादी के बाद बहुत कम नेताओं ने किया है।
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