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ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ पीस' में 25 देश हुए शामिल, इन देशों ने ठुकराया राष्ट्रपति का न्योता
SHIDDHANT
22 Jan 2026 10:08 PM IST

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Delhi दिल्ली। वैश्विक राजनीतिक गलियारे में वर्तमान समय में कई मुद्दों ने हलचल मचा रखी है। वेनेजुएला, ग्रीनलैंड, रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर गाजा सीजफायर तक, विश्व पटल पर सियासी मुद्दा बना हुआ है। विश्व में शांति स्थापित करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बोर्ड ऑफ पीस की शुरुआत की है। इसमें शामिल होने के लिए ट्रंप ने दुनिया के लगभग 60 देशों को न्योता भेजा। आइए जानते हैं कि किन देशों ने ट्रंप के इस न्योते को स्वीकार किया और किन देशों ने ठुकरा दिया।
इजरायली मीडिया के अनुसार, 60 में से दुनिया के 25 देशों ने ट्रंप के न्योते को स्वीकार कर लिया है। बता दें कि बोर्ड ऑफ पीस में अब तक इजरायल, बहरीन, मोरक्को, अर्जेंटीना, आर्मेनिया, अजरबैजान, बुल्गारिया, हंगरी, इंडोनेशिया, जॉर्डन, कजाकिस्तान, कोसोवो, पाकिस्तान, पराग्वे, कतर, सऊदी अरब, तुर्किए, संयुक्त अरब अमीरात, उज्बेकिस्तान, बेलारूस, मिस्र, वियतनाम और मंगोलिया शामिल हुए। हालांकि, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने बुधवार को कहा कि रूस काउंसिल को फंड देने के लिए पश्चिम में लगी अपनी संपत्ति से 1 बिलियन डॉलर देने को तैयार है, बशर्ते वह फिलिस्तीनी लोगों की तुरंत समस्याओं को हल करने और गाजा में गंभीर मानवीय समस्याओं को हल करने के लिए काम करे।
आठ इस्लामिक देशों ने बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का न्योता स्वीकार किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी गाजा में इजरायल-हमास सीजफायर समझौते के दूसरे फेज के तहत घोषित बोर्ड में शामिल होने के लिए बुलाया था। हालांकि, भारत की तरफ से फिलहाल इसपर कोई फैसला सामने नहीं आया है। विदेश मंत्रालय ने कहा था कि फिलहाल इसपर विचार किया जा रहा है।
इसके अलावा, फ्रांस, ब्रिटेन, चीन, जर्मनी, स्वीडन, नार्वे और कई दूसरे बड़े देशों ने इस साइनिंग सेरेमनी में हिस्सा नहीं लिया। इसके साथ ही जर्मनी, इटली, पैराग्वे, रूस, स्लोवेनिया, तुर्किए और यूक्रेन जैसे कई देशों ने इस न्योते पर कोई वादा नहीं किया है। हालांकि, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमीर जेलेंस्की दावोस में अमेरिकी प्रेसिडेंट ट्रंप से मुलाकात करने वाले हैं। जेलेंस्की ट्रंप से मुलाकात करने के लिए दावोस पहुंच चुके हैं। बोर्ड में शामिल सदस्य देशों का कार्यकाल तीन साल तक सीमित होगा, और स्थायी सदस्यता हासिल करने के लिए कथित तौर पर 1 बिलियन डॉलर का भुगतान करना होगा।
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