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चार साल में 111 जनप्रतिनिधियों ने बदली पार्टी ADR ने जारी किए आंकड़े

Ratna Netam
25 Sept 2026 9:26 PM IST
चार साल में 111 जनप्रतिनिधियों ने बदली पार्टी ADR ने जारी किए आंकड़े
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नई दिल्ली। देश की राजनीति में दलबदल को लेकर एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की नई रिपोर्ट सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक 2022 से 2026 के बीच लोकसभा, राज्यसभा और विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं का चुनाव जीतने के बाद कुल 111 मौजूदा सांसदों और विधायकों ने अपना राजनीतिक दल बदला। सबसे ज्यादा मामले नगालैंड में दर्ज किए गए, जबकि पश्चिम बंगाल इस सूची में दूसरे स्थान पर रहा।ADR ने नेशनल इलेक्शन वॉच के साथ मिलकर चुनाव जीतने के बाद राजनीतिक दल बदलने वाले मौजूदा जनप्रतिनिधियों के चुनावी शपथपत्रों और उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण किया। रिपोर्ट के अनुसार पार्टी बदलने वाले 111 जनप्रतिनिधियों में 26 लोकसभा सांसद, सात राज्यसभा सांसद और 78 विधायक शामिल हैं। यानी इस अवधि में दल बदलने वाले जनप्रतिनिधियों में सबसे बड़ी संख्या विधायकों की रही।राज्यवार आंकड़ों में नगालैंड सबसे आगे है। यहां 32 विधायकों के पार्टी बदलने के मामले रिपोर्ट में शामिल किए गए हैं। नगालैंड का आंकड़ा मुख्य रूप से अक्टूबर 2025 में नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी यानी NDPP के नागा पीपुल्स फ्रंट यानी NPF में विलय से जुड़ा है। इसके बाद पश्चिम बंगाल में 20 मामले सामने आए।
तेलंगाना में नौ और गोवा में आठ विधायकों के पार्टी बदलने का उल्लेख है। पंजाब से कुल आठ जनप्रतिनिधि इस सूची में शामिल हैं, जिनमें दो विधायक और छह सांसद बताए गए हैं। महाराष्ट्र से छह लोकसभा सांसद, मेघालय से छह विधायक और मणिपुर से पांच विधायक पार्टी बदलने वालों की सूची में शामिल हैं।गुजरात में चार विधायकों के पार्टी बदलने का मामला दर्ज किया गया। हिमाचल प्रदेश और राजस्थान में दो-दो, जबकि कर्नाटक, मध्य प्रदेश, सिक्किम और उत्तर प्रदेश में एक-एक विधायक ने चुनाव जीतने के बाद दल बदला। दिल्ली से एक राज्यसभा सांसद भी इस विश्लेषण में शामिल है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि किन राजनीतिक दलों से सबसे अधिक निर्वाचित प्रतिनिधि बाहर गए। NDPP से 25 जनप्रतिनिधियों ने पार्टी बदली। इसके बाद तृणमूल कांग्रेस के 20 और कांग्रेस के 19 जनप्रतिनिधि दूसरे दलों में गए। इन तीनों दलों से बाहर जाने वाले प्रतिनिधियों की कुल संख्या 64 है, जो रिपोर्ट में शामिल 111 जनप्रतिनिधियों का करीब 58 प्रतिशत है।इसके अलावा भारत राष्ट्र समिति यानी BRS के नौ, आम आदमी पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सात-सात, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के छह, जनता दल यूनाइटेड के पांच और नेशनल पीपुल्स पार्टी के चार जनप्रतिनिधियों के दल बदलने का उल्लेख रिपोर्ट में किया गया है।
दूसरी ओर यह भी सामने आया कि पार्टी बदलने वाले जनप्रतिनिधि किन दलों में सबसे ज्यादा शामिल हुए। रिपोर्ट के अनुसार NPF में सबसे अधिक 32 प्रतिनिधि पहुंचे। भारतीय जनता पार्टी में 29 जनप्रतिनिधि शामिल हुए। रिपोर्ट में नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया यानी NCPI में 20 जनप्रतिनिधियों के शामिल होने का आंकड़ा दिया गया है। इन तीन दलों में कुल 81 जनप्रतिनिधि पहुंचे, जो सभी 111 मामलों का करीब 73 प्रतिशत है।कांग्रेस में नौ और शिवसेना में आठ प्रतिनिधि शामिल हुए, जबकि NPP में छह और पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल यानी PPA में चार जनप्रतिनिधियों के शामिल होने का उल्लेख है। इन आंकड़ों से पता चलता है कि 2022 से 2026 के दौरान कुछ राज्यों में दलबदल व्यक्तिगत नेताओं तक सीमित रहा, जबकि कुछ जगह बड़ी संख्या में निर्वाचित प्रतिनिधियों ने एक साथ राजनीतिक दल बदला।
ADR की रिपोर्ट दलबदल के राजनीतिक प्रभाव की ओर भी ध्यान दिलाती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल के वर्षों में कुछ राज्य विधानसभाओं में विधायकों के दल बदलने से सत्ता के समीकरण प्रभावित हुए और कुछ मामलों में सरकारों के बने रहने पर भी असर पड़ा। यह ADR का विश्लेषण है; प्रत्येक राज्य में राजनीतिक परिवर्तन की परिस्थितियां अलग रही हैं और उन्हें संबंधित घटनाक्रम के संदर्भ में देखना जरूरी है।भारत में दलबदल को नियंत्रित करने के लिए संविधान की दसवीं अनुसूची में दलबदल विरोधी प्रावधान मौजूद हैं। इसके तहत कुछ परिस्थितियों में किसी निर्वाचित सदस्य की सदस्यता समाप्त हो सकती है। हालांकि विलय जैसी स्थितियों के लिए कानून में अलग प्रावधान हैं। किसी विशेष मामले में अयोग्यता होगी या नहीं, यह उस मामले के तथ्यों और संवैधानिक प्रक्रिया पर निर्भर करता है।
ADR की रिपोर्ट में शामिल आंकड़े सभी ऐतिहासिक दलबदल मामलों की सूची नहीं हैं, बल्कि 2022 से 2026 की निर्धारित अवधि में चुनाव जीतने के बाद पार्टी बदलने वाले मौजूदा सांसदों और विधायकों के विश्लेषण पर आधारित हैं। इसलिए इन आंकड़ों को इसी समय-सीमा और रिपोर्ट की पद्धति के संदर्भ में समझना जरूरी है।रिपोर्ट में नगालैंड और पश्चिम बंगाल के आंकड़े विशेष रूप से ध्यान खींचते हैं। नगालैंड में 32 मामलों के साथ सबसे बड़ा बदलाव दर्ज किया गया, जबकि पश्चिम बंगाल में 20 मामले दर्ज किए गए। इसके बाद तेलंगाना, गोवा और पंजाब जैसे राज्यों के आंकड़े सामने आते हैं।
लोकसभा के 26 और राज्यसभा के सात सदस्यों का पार्टी बदलना यह भी दिखाता है कि दलबदल केवल राज्य विधानसभाओं तक सीमित नहीं रहा। हालांकि कुल संख्या में 78 विधायकों के साथ राज्य विधानसभाओं की हिस्सेदारी सबसे अधिक है।ADR की यह रिपोर्ट एक बार फिर चुनाव जीतने के बाद जनप्रतिनिधियों के राजनीतिक दल बदलने और उससे मतदाताओं के जनादेश पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चल रही बहस के लिए नए आंकड़े उपलब्ध कराती है। 2022 से 2026 के चार वर्षों में 111 मौजूदा सांसदों और विधायकों का दल बदलना, खासकर नगालैंड और पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आना, देश में दलबदल की राजनीति के पैमाने को दर्शाता है।
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