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जर्मन अधिकारियों ने उन सरकारी कर्मचारियों और सांसदों को, जिन्हें इस हफ्ते एप्पल की ओर से खतरे की चेतावनी (थ्रेट नोटिफिकेशन) मिली है, यह मान लेने को कहा है कि उनके आईफोन अब सुरक्षित नहीं हैं। इस मामले में एक ऐसे जासूसी सॉफ्टवेयर (स्पाइवेयर) अभियान की जांच शुरू हो गई है, जिसके पीछे किसी देश का हाथ होने का संदेह है। माना जा रहा है कि यह हमला 'जीरो-क्लिक' खामी का फायदा उठाकर किया गया है; इसका मतलब है कि फोन के मालिक को कुछ भी करने की जरूरत नहीं पड़ती और फोन संक्रमित हो जाता है। सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि हैकर्स को केवल टारगेट किए गए व्यक्ति के फोन नंबर की जरूरत थी। अधिकारियों ने अभी यह नहीं बताया है कि इसके पीछे कौन है, या क्या चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ भी उन लोगों में शामिल हैं जो इससे प्रभावित हुए हैं।
बर्लिन का क्या कहना है
'फाइनेंशियल टाइम्स' (FT) की रिपोर्ट के अनुसार, जर्मनी के 'फेडरल ऑफिस फॉर इंफॉर्मेशन सिक्योरिटी' (BSI) ने सप्ताहांत पर सरकारी हस्तियों के लिए एक जरूरी सूचना जारी की। एजेंसी ने कहा कि जिन लोगों को हाल के दिनों में एप्पल की ओर से ऐसी चेतावनी मिली है, उन्हें मान लेना चाहिए कि उनका डिवाइस सुरक्षित नहीं है। सरकार ने बताया कि ये अलर्ट गुरुवार से मिलने शुरू हुए थे। सोमवार को चांसलर मर्ज़ के प्रवक्ता स्टीफन कॉर्नेलियस ने कहा कि बर्लिन इस घटना को बहुत गंभीरता से ले रहा है और यह मानकर चलना चाहिए कि डिवाइस सुरक्षित नहीं हैं। उन्होंने कहा कि अधिकारी यह पता लगाने के लिए पूरी ताकत से काम कर रहे हैं कि असल में क्या हुआ था, और साथ ही प्रभावित लोगों को सूचित कर रहे हैं और उन्हें मदद दे रहे हैं।
यह हमला कैसे काम करता है
FT के अनुसार, यह हमला 'जीरो-क्लिक' खामी का फायदा उठाता है। इसका मतलब है कि फोन को संक्रमित करने के लिए किसी लिंक को खोलने या किसी फाइल को डाउनलोड करने की जरूरत नहीं पड़ती। बताया जा रहा है कि हमलावरों को बस पीड़ित का फोन नंबर पता होना काफी था।
इसके पीछे कौन हो सकता है
FT के मुताबिक, अभी तक यह तय नहीं हो पाया है कि हैकिंग किसने की है, लेकिन सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि इसके पीछे लगभग निश्चित रूप से किसी देश (स्टेट-स्पॉन्सर्ड) का हाथ है। इस स्पाइवेयर का नाम अभी सामने नहीं आया है। अधिकारियों का कहना है कि इसे व्यावसायिक तौर पर विकसित किया गया है और पहले भी कई सरकारें इसका इस्तेमाल कर चुकी हैं। इस तरह के सॉफ्टवेयर का सबसे चर्चित उदाहरण 'पेगासस' है, जिसे इज़राइल के NSO ग्रुप ने बनाया है। यह संदेशों को पढ़ सकता है (यहां तक कि एन्क्रिप्टेड ऐप्स पर भेजे गए संदेशों को भी), और कॉन्टैक्ट्स, कैलेंडर, लोकेशन डेटा, फोटो और दस्तावेजों तक पहुंच सकता है। यह फोन के माइक्रोफोन को भी चालू कर सकता है, जिससे डिवाइस एक जासूसी उपकरण में बदल जाता है।
जर्मन राजनेताओं को निशाना बनाने का लंबा इतिहास
FT ने बताया कि जर्मन सांसदों और सरकारी अधिकारियों को अक्सर विरोधी खुफिया एजेंसियां अपना खास निशाना बनाती हैं। इस वसंत में, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप 'सिग्नल' के उपयोगकर्ताओं को निशाना बनाने वाले एक फ़िशिंग अभियान में दर्जनों जर्मन सांसदों का डेटा खतरे में पड़ गया था। इनमें बुंडेस्टैग की अध्यक्ष जूलिया क्लॉकनर सबसे प्रमुख थीं। जर्मन राजनेताओं की गोपनीय जानकारी तक पहुँचने की कोशिशों में, रूस की खुफिया सेवाओं से जुड़े रूसी समूह सबसे ज़्यादा सक्रिय रहे हैं। इनमें से एक समूह, जिसे 'APT28' या 'फैंसी बियर' के नाम से जाना जाता है और जो GRU द्वारा संचालित है, 2022 में 'सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी' में हुई सेंधमारी के पीछे था। यही समूह 2015 में बुंडेस्टैग को हैक करने के लिए भी ज़िम्मेदार था, जिसमें सभी जर्मन पार्टियों के वरिष्ठ सदस्यों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले कंप्यूटरों से लगभग 16 गीगाबाइट डेटा चुरा लिया गया था।
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