
वॉशिंगटन : अमेरिका ने भारत समेत 17 देशों से आयात होने वाले सामान पर 10 प्रतिशत टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने का फैसला किया है। अमेरिकी प्रशासन ने यह कदम इन देशों से आने वाले उत्पादों में कथित तौर पर जबरन मजदूरी के इस्तेमाल को रोकने के प्रयासों के तहत उठाया है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि इस शुल्क का उद्देश्य संबंधित देशों को श्रम मानकों और आयात नियंत्रणों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए प्रोत्साहित करना है।
अमेरिका के इस फैसले से भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि, भारत को पहले प्रस्तावित टैरिफ दर की तुलना में कुछ राहत मिली है। पिछले महीने अमेरिका ने ट्रेड एक्ट की धारा 301 के तहत संभावित टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा था, जिसमें भारत को उन देशों की सूची में शामिल किया गया था जिन पर 12.5 प्रतिशत शुल्क लगाने की बात कही गई थी।
लेकिन बाद में अमेरिकी प्रशासन ने भारत की ओर से अपनी विदेश व्यापार नीति में किए गए बदलावों को ध्यान में रखा। भारत ने जबरन मजदूरी से बने सामान के आयात पर रोक लगाने के लिए अपनी नीति में संशोधन किया था। इसी के बाद अमेरिका ने भारत पर प्रस्तावित शुल्क को घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को जारी एक मेमोरेंडम में कहा कि इन कदमों के बाद अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि ने सलाह दी कि संबंधित अर्थव्यवस्थाओं से आने वाले सामान पर 10 प्रतिशत की दर से टैरिफ लगाया जाए। उन्होंने कहा कि यह कदम देशों को जबरन मजदूरी से जुड़े उत्पादों के आयात को रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था लागू करने के लिए प्रेरित करेगा।
अमेरिकी प्रशासन लंबे समय से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में श्रमिक अधिकारों और जबरन मजदूरी के मुद्दे को लेकर सख्त रुख अपनाता रहा है। अमेरिका का कहना है कि ऐसे उत्पादों का आयात घरेलू उद्योगों और उन कंपनियों के लिए नुकसानदायक है, जो श्रम नियमों का पालन करती हैं।
भारत की ओर से इस मामले में पहले ही कदम उठाए गए हैं। विदेश व्यापार नीति में संशोधन के जरिए जबरन मजदूरी से तैयार सामान के आयात पर रोक लगाने का प्रावधान किया गया है। इसी नीति बदलाव को अमेरिका ने अपने फैसले में महत्वपूर्ण माना है।
व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका का यह फैसला वैश्विक व्यापार व्यवस्था में श्रम मानकों के महत्व को दर्शाता है। हालांकि, आयात शुल्क बढ़ने से कुछ उत्पादों की लागत पर असर पड़ सकता है और निर्यातकों को नई परिस्थितियों के अनुसार रणनीति बनानी पड़ सकती है।
भारत और अमेरिका के बीच पिछले कुछ वर्षों में व्यापारिक संबंधों में लगातार विस्तार हुआ है। दोनों देश कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं। ऐसे में नए टैरिफ को लेकर दोनों देशों के बीच आगे की बातचीत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत के लिए राहत की बात यह है कि प्रस्तावित 12.5 प्रतिशत शुल्क के बजाय 10 प्रतिशत टैरिफ लागू किया गया है। इसका कारण भारत द्वारा उठाए गए नीतिगत कदमों को माना जा रहा है। हालांकि, निर्यातकों को अब अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि टैरिफ लगाने का उद्देश्य केवल राजस्व जुटाना नहीं है, बल्कि व्यापारिक साझेदार देशों को श्रम मानकों के पालन के लिए प्रेरित करना भी है। अमेरिका का कहना है कि वह वैश्विक स्तर पर निष्पक्ष व्यापार व्यवस्था को बढ़ावा देना चाहता है।
इस फैसले के बाद भारतीय उद्योग जगत की नजर इस बात पर रहेगी कि कौन-कौन से क्षेत्रों पर इसका सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है। विशेष रूप से ऐसे उद्योग जो अमेरिका को बड़े पैमाने पर निर्यात करते हैं, वे नई शुल्क व्यवस्था का आकलन करेंगे।
भारत सरकार की ओर से भी इस मामले पर आगे की रणनीति तय की जा सकती है। दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता के जरिए टैरिफ से जुड़े मुद्दों को सुलझाने के प्रयास किए जाने की संभावना है।
फिलहाल अमेरिका का यह कदम वैश्विक व्यापार में श्रम अधिकारों और आपूर्ति श्रृंखला की पारदर्शिता को लेकर बढ़ती सख्ती का संकेत माना जा रहा है। भारत समेत प्रभावित देशों के लिए अब चुनौती होगी कि वे व्यापारिक हितों को सुरक्षित रखते हुए नए नियमों के अनुरूप अपनी नीतियों को आगे बढ़ाएं।





