सम्पादकीय

संजय उवाच: टीम इंडिया सिर्फ 2 मुकाबलों में रुखसत

Gulabi
1 Nov 2021 3:21 PM GMT
संजय उवाच: टीम इंडिया सिर्फ 2 मुकाबलों में रुखसत
x
टीम इंडिया सिर्फ 2 मुकाबलों में रुखसत

टी 20 विश्वकप मे पूर्व चैंपियन भारत अब लगभग बाहर हो चुका है, जिसे खिताब का दावेदार माना जा रहा था, वह अब संभवतः लीग दौर से आगे नहीं बढ़ सकेगा. सेमीफाइनल मे पहुंचने के लिए भारत को अब बाकी बचे तीनों मैच बड़े फासले से जीतने होंगे, और यह कामना भी करनी होगी कि ग्रुप मे शामिल बाकी टीमों के साथ अब कुछ भी अच्छा न हो. भारत फिलहाल दो मैचों के बाद पॉइंट्स टेबल मे नामीबिया से भी नीचे है और उसका यही स्टेटस दुनिया मे सबसे छोटे क्रिकेट फॉर्मेट के सबसे बड़े टूर्नामेंट मे उसकी स्थिति को दर्शाता है.


भारतीय टीम ने पिछले दो मैच जिस तरह से गंवाए हैं, उसने टीम के कट्टर समर्थकों को भी निराश कर दिया है. क्रिकेट एक खेल है और हार जीत उसका अविभाज्य अंग, यह मानने वाले भी अब इस तर्क की वकालत नहीं कर पा रहे हैं. भारतीय क्रिकेटर्स के चेहरे मैदान पर ऐसे नजर आते हैं, जैसे उन्हें सांप सूंघ गया हो, हालांकि कैमरों की नजर मे कभी-कभी पेवेलियन मे बैठे चुहल बाजी करते भी दिखाई देते हैं, लेकिन यह एहसास होते ही कि वह कैमरे पर हैं, चेहरे पर अनायास ही गंभीरता चली आती है, क्योंकि उन्‍हें यह पता है कि उनके प्रदर्शन को क्रिकेट दीवानों का यह देश किस तरह देख रहा होगा.


दिले नादां तुझे हुआ क्या है?

समूची दुनिया मे अपनी बादशाहत का डंका पीटने वाली टीम इंडिया को आखिर हुआ क्या है? मैच हारना एक बात है, और आत्मसमर्पण करना अलग बात है. पाकिस्तान के हाथों 10 विकेट और न्यूज़ीलैंड से 8 विकेट से हारने वाली भारतीय टीम दो मैचों मे सिर्फ 2 विकेट ले सकी है. इतना ही नहीं, आईपीएल जैसी लीग मे बल्ले की चमक से चकाचौंध कर देने वाले सितारे वर्ल्ड कप के मंच पर टिमटिमा भी नहीं पा रहे हैं.


खासकर बल्लेबाजों की भावभंगिमाये देखकर ऐसा लगता है कि वह खेल कुछ रहे हैं और सोच कुछ रहे हैं. खासकर केएल राहुल और रोहित शर्मा ने बेहद निराश किया है. जब शुरुआत ही कमजोर होगी तो दबाव खुद ब खुद नीचे ट्रांसफर होगा.


रोहित को न्यूजीलैंड के खिलाफ पहली ही गेंद पर एक आसान जीवनदान मिला, लेकिन जैसे वह तो कल कैच देने पर उतारू थे. न सूर्य कुमार यादव पहले मैच मे चले, न ईशान किशन दूसरे मे, ऋषभ पंत और विराट कोहली ने नाममात्र की मौजूदगी दर्ज कराई. आम तौर पर फाइटर माने जाने वाले शार्दूल ठाकुर ने भी हाथ खड़े कर दिए.


अतीत वर्तमान पर भारी

हार्दिक पाण्ड्या से टीम प्रबंधन का प्रेम भी समझ से परे है, जिस देश मे नए युवा सितारे हर रोज अपने बेहतरीन प्रदर्शन से दस्तक दे रहे हों, वहां हार्दिक ने इस साल कुल 8 मैच मे सवा सौ की स्ट्राइक रेट से 130 रन बनाए हैं, आईपीएल मे इस साल उन्होंने मुंबई इंडियंस के लिए 12 मैच खेले 127 रन बनाए, 14 का औसत और 113 का स्ट्राइक रेट.


यही नहीं चोट के बाद से गेंदबाजी उन्होंने न के बराबर की है, नेट्स पर अभ्यास मे अक्सर गेंद डालते हैं, लेकिन मैच मे गेंद करते दिखाई नहीं देते. फिर भी उनके बिना टीम पूरी नहीं होती. उधर, दूसरी ओर आर आश्विन इंग्लैंड से लगातार बेंच गरम कर रहे हैं, लेकिन उन्‍हें मौके नहीं मिलते. यानि नाम, प्रबंधन का स्नेह और अतीत मे किया हुआ काम वर्तमान और फॉर्म पर भारी है और संभवतः यह कारण भारतीय टीम की इस हालात का जिम्मेदार भी है.


लगातार होती क्रिकेट

लगातार हो रही क्रिकेट की वजह से ऐसा लगता है कि खिलाड़ियों मे शारीरिक और मानसिक थकान भी अब हावी होने लगी है. इंग्लैंड सीरीज के बाद से टीम रुकी नहीं है, और बायो बबल मे लगातार खेल रही है. बायो बबल वैसे भी आसान नहीं होता. वर्ल्ड कप खत्म होते ही टीम इंडिया को न्यूज़ीलैंड सीरीज भी खेलनी होगी. कोरोना काल के दौरान हुए नुकसान की भरपाई की नियत से ज्यादातर टीमें लगातार क्रिकेट खेल रही हैं, लेकिन इसके दूसरे पहलू पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए.


आत्मविश्वास, मानसिक मजबूती की कुंजी


पूर्व क्रिकेटर गौतम गंभीर सहित कई लोगों के मानना है कि भारत के दम खम मे कमी नहीं है, लेकिन उन्‍हें मानसिक मजबूती की दरकार है. मानसिक मजबूती आत्मविश्वास से मिलती है और अगर वही हिला हुआ हो तो फिर मनोविज्ञानी भी कुछ नही कर सकता. जिस टीम मे इंडिविजुअल प्लेयर्स का कद इतना बड़ा हो कि वह अनिल कुंबले जैसे कोच की भी छुट्टी कर दें, वहां समझाने और भाषण देने से मानसिक मजबूती नहीं आ सकती.

राहुल द्रविड ने कोच के लिए आवेदन किया है और उनका चुना जाना भी तय है, लेकिन उनका रास्ता आसान नहीं होगा. भारतीय टीम मे कोच की जगह मैन मैनेजमेंट की दरकार है और रवि शास्त्री इस कला मे पारंगत हैं. द्रविड पूरी शिद्दत से काम करेंगे और यह कुछ लोगों का हाजमा खराब करेगा.


आखिर इस मर्ज की दवा क्या है!

यह तय है कि बीसीसीआई या दुनिया का कोई भी बोर्ड अपने कुशल प्रबंधन और वित्त व्यवस्था को प्राथमिकता देता है. ऐसे मे क्रिकेट मैचों का कलेंडर कभी हल्का हो सकेगा, ऐसा लगता नहीं है! भारत मे खिलाड़ियों के विशाल बैंक है, डोमेस्टिक क्रिकेट मे बड़ी संख्या मे बेहतरीन क्रिकेटर उपलब्ध हैं और आईपीएल जैसी लीग से भी कई सितारे उभरते हैं.

हाल ही में, भारत ने एक साथ अपनी दो टीमें बाहर भेजी थी. इसे सिर्फ एक प्रयोग के तौर पर आजमा कर छोड़ नहीं देना चाहिए, बल्कि इस पर गंभीर प्रयासों की जरूरत है. ऐसा करने से न सिर्फ ज्यादा संख्या मे प्लेयर्स को इंटरनेशनल एक्सपोसर मिलेगा, बल्कि खिलाड़ी थकावट के फ़ैकटर से दूर हो जाएंगे.

अभी टीम इंडिया का एक कोर ग्रुप है, जो तीनों फॉर्मैट मे दिखाई देता है, सिर्फ कुछ चंद प्लेयर्स इधर उधर होते हैं. हालांकि यही दस्तूर दुनिया की बाकी टीमों के साथ भी है, लेकिन भारत के हालात अलग है, और बीसीसीआई इस ओर पहल करने मे सक्षम है. तीनों फॉर्मैट की तीन टीमें हों और अलग अलग कप्तान भी. कोहली, रोहित के बिना भी टीम इंडिया बेहतर कर सकती है, कोशिश करके तो देखिए! सवाल यही है की बिल्ली के गले मे कोई घंटी क्यों बांधे?

इस दिशा मे कुछ गलती हम मीडिया वालों की भी है, किसी कॉमेंट्री मे अखबारों मे टीवी पर न जाने कितनी असंख्य उपमाये हमारे सितारों को दी जाती हैं, अपने प्रोडक्ट को बेहतर तरीके से पेश करने का यह एक तरीका हो सकता है, लेकिन ईश्वर के लिए उन्‍हें प्लेयर रहने दें, ईश्वर न बनाएं. यह उपमाएं इन खिलाड़ियों के दिमाग मे बैठ भी सकती हैं.

कौन हैं आउट साइडर्स?

एक और खास बात, हाल-फिलहाल कप्तान विराट कोहली अक्सर कहते सुनाई देते हैं कि हम आउट साइडर्स की बातों को तबज़्जो नहीं देते. समझ नही आता कि यह आउट साईडर्स कौन हैं? मीडिया, उन्हीं की जमात के पूर्व खिलाड़ी या फिर वह भारतीय क्रिकेट प्रेमी, जिन्होंने क्रिकेट को लोकप्रियता के इस मुकाम तक पहुंचा दिया. आम लोगों मे क्रिकेट की दीवानगी न होती तो आज विराट कोहली इतने बड़े न हुए होते. यही तथाकथित आउट साइडर्स हैं, जो क्रिकेटर्स को पलकों मे बिठाए रहते हैं.

उनका सम्मान होना चाहिए! उनकी प्रशंसा और आलोचना सर माथे पर लेना चाहिए. अगर कोई बात पसंद न आए तो उस बारे मे बोलने से पहले शब्दों का चयन सम्हाल कर करना चाइए, आखिर आप भारतीय टीम के कप्तान हैं. पूर्व खिलाड़ी, न ही मीडिया और न ही क्रिकेट दीवाने भारतीय क्रिकेट के लिए कभी आउटसाइडर्स हो सकते हैं.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए जनता से रिश्ता किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
संजय बैनर्जी, ब्रॉडकास्ट जर्नलिस्ट व कॉमेंटेटर
ब्रॉडकास्ट जर्नलिस्ट व कॉमेंटेटर. 40 साल से इंटरनेशनल मैचों की कॉमेंट्री कर रहे हैं.


Next Story