
Business बिजनेस: गुरुवार को शुरुआती कारोबार में भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ गया और रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 20 पैसे कमजोर होकर 95.86 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। बाजार में यह गिरावट मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव को लेकर बढ़ती अनिश्चितताओं के कारण देखी गई।
विदेशी मुद्रा बाजार में लगातार दबाव के चलते रुपया हाल के दिनों में कमजोर रुख बनाए हुए है। विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिम एशिया संघर्ष शुरू होने के बाद से रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 6 प्रतिशत से अधिक कमजोर हो चुका है। इसी कारण यह वर्ष 2026 में अब तक एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बन गई है।
बाजार विश्लेषकों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारतीय मुद्रा पर पड़ता है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है। तेल की कीमतों में तेजी से आयात बिल बढ़ता है, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव आता है।
इस बीच, विदेशी मुद्रा भंडार को स्थिर रखने और बाजार में संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सोने और चांदी पर आयात शुल्क 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया गया है। माना जा रहा है कि इस कदम से कीमती धातुओं के आयात पर नियंत्रण किया जा सकेगा और विदेशी मुद्रा के बहिर्गमन को कुछ हद तक रोका जा सकेगा।
हालांकि, बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि रुपये की दिशा मुख्य रूप से सोने-चांदी के आयात शुल्क से नहीं, बल्कि कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक भू-राजनीतिक स्थिति से तय होगी। विशेष रूप से पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में बाधाओं का असर मुद्रा बाजार पर अधिक दिखाई दे रहा है।
ट्रेडर्स के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता के चलते निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे डॉलर की मांग और मजबूत हो रही है। इसका सीधा प्रभाव उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर पड़ रहा है, जिनमें भारतीय रुपया भी शामिल है।
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो रुपये पर दबाव आगे भी जारी रह सकता है। साथ ही, वैश्विक राजनीतिक तनाव में किसी भी बढ़ोतरी का असर भारतीय मुद्रा पर और अधिक देखा जा सकता है।
फिलहाल, बाजार की नजर अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों, अमेरिकी डॉलर की मजबूती और पश्चिम एशिया की स्थिति पर टिकी हुई है। आने वाले दिनों में इन्हीं कारकों के आधार पर रुपये की दिशा तय होने की संभावना जताई जा रही है।





