
नई दिल्ली। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर आने वाले महीनों में देश की अर्थव्यवस्था पर दिख सकता है। इससे मुद्रास्फीति (इंफ्लेशन) बढ़ने की आशंका जताई जा रही है, जो सीधे तौर पर आम लोगों की जेब पर असर डाल सकती है।
रेटिंग एजेंसी CRISIL ने मंगलवार को जारी अपनी रिपोर्ट में यह अनुमान जताया है कि ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी से परिवहन और विनिर्माण लागत में इजाफा हो सकता है। इसके चलते रोजमर्रा की जरूरी वस्तुओं की कीमतों में भी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार, पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने पर ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर सीधा असर पड़ता है, क्योंकि माल ढुलाई की लागत बढ़ जाती है। इसका असर आगे चलकर खाद्य पदार्थों, उपभोक्ता वस्तुओं और औद्योगिक उत्पादों की कीमतों पर पड़ता है। यही कारण है कि ईंधन की कीमतों में बदलाव को मुद्रास्फीति का एक प्रमुख कारक माना जाता है।
क्रिसिल का कहना है कि यदि कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें ऊंची बनी रहती हैं या घरेलू स्तर पर टैक्स और डीलर मार्जिन में बदलाव होता है, तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। ऐसी स्थिति में कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है, जिसका बोझ अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में परिवहन लागत कुल वस्तु मूल्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। ऐसे में ईंधन महंगा होने पर सप्लाई चेन प्रभावित होती है और कई वस्तुओं की कीमतें स्वतः बढ़ जाती हैं। खासकर खाद्य, कृषि उत्पाद और दैनिक उपयोग की वस्तुओं पर इसका असर जल्दी दिखाई देता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी होने पर केंद्रीय बैंक की नीतियों पर भी असर पड़ सकता है। रिजर्व बैंक को महंगाई नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरों पर विचार करना पड़ सकता है, जिससे कर्ज लेना महंगा हो सकता है।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा बाजार में अस्थिरता के चलते ईंधन की कीमतों में अनिश्चितता बनी रह सकती है। ऐसे में सरकार और उद्योग दोनों को मिलकर लागत नियंत्रण और सप्लाई चेन को स्थिर रखने पर ध्यान देना होगा।





