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खराब स्कूटी बदलें या 1.02 लाख लौटाएं, ओला के खिलाफ उपभोक्ता आयोग का फैसला

nidhi
24 Oct 2026 2:17 PM IST
खराब स्कूटी बदलें या 1.02 लाख लौटाएं, ओला के खिलाफ उपभोक्ता आयोग का फैसला
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ग्राहक को मिलेगा ब्याज और मुआवजा
अलीगढ़: नई इलेक्ट्रिक स्कूटी में खरीद के पहले दिन से खराबी आने और शिकायतों के बावजूद समाधान नहीं मिलने के मामले में जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने ग्राहक के पक्ष में फैसला सुनाया है। आयोग ने ओला इलेक्ट्रिक को स्कूटी बदलने अथवा उसकी कीमत 1,02,505 रुपये वापस करने का आदेश दिया है। इसके अतिरिक्त वाद दायर करने की तारीख से भुगतान तक 10 प्रतिशत वार्षिक ब्याज, मानसिक उत्पीड़न के लिए 10 हजार रुपये और मुकदमे के खर्च के तौर पर पांच हजार रुपये देने के निर्देश हैं।
परिवादी वैभव शर्मा ने 31 दिसंबर 2023 को स्कूटी बुक की और 31 जनवरी 2024 को खरीदी थी। शिकायत के अनुसार, वाहन मिलने के दिन पार्किंग लॉक में परेशानी आई। डिग्गी खोलने के बाद दोबारा लॉक करने में भी दिक्कत हुई। उन्होंने सेवा केंद्र, ईमेल और हेल्पलाइन पर संपर्क किया, लेकिन समाधान नहीं मिला। उनका आरोप था कि शिकायतें बिना समस्या दूर किए बंद कर दी गईं। अधिवक्ता शिवम सिंह नायक के माध्यम से मामला आयोग पहुंचा। कंपनी को 45 दिनों में आदेश का पालन करने का निर्देश दिया गया है।
इस प्रकरण ने इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने के बाद मिलने वाली सेवा और शिकायतों के निस्तारण को चर्चा में ला दिया है। ग्राहक के लिए वाहन खरीदना केवल भुगतान करके उसकी डिलीवरी लेना भर नहीं होता। वाहन का रोजमर्रा के इस्तेमाल के योग्य होना और खराबी आने पर सहायता मिलना भी उतना ही जरूरी है। जब नई खरीद के तुरंत बाद परेशानी शुरू हो जाए और समाधान के लिए लगातार संपर्क करना पड़े, तो उपभोक्ता की मुश्किल बढ़ जाती है।
इलेक्ट्रिक स्कूटर में किसी समस्या की शिकायत मिलने पर उसकी सही पहचान करना जरूरी होता है। हर खराबी को बैटरी या मोटर से जोड़ देना उचित नहीं है। लॉक, इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रण और दूसरे हिस्सों की समस्याएं भी वाहन के इस्तेमाल में बाधा बन सकती हैं। इस मामले की उपलब्ध जानकारी में पार्किंग लॉक और डिग्गी से जुड़ी शिकायतों का उल्लेख है। किसी खास पुर्जे में निर्माण दोष की विस्तृत तकनीकी रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी में सामने नहीं आई है।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 39 के तहत जिला आयोग, शिकायत साबित होने पर, वस्तु का दोष दूर करने, उसी प्रकार की दोषमुक्त नई वस्तु देने अथवा कीमत लौटाने का निर्देश दे सकता है। आयोग परिस्थितियों के अनुसार ब्याज, नुकसान की भरपाई और मुकदमे का खर्च भी दिला सकता है। इसलिए उपभोक्ता विवाद में राहत केवल मरम्मत तक सीमित नहीं रहती। हालांकि, किस मामले में कौन-सी राहत मिलेगी, यह उसके तथ्यों और आयोग के निष्कर्ष पर निर्भर करता है। खरीद की रकम, मुआवजा और मुकदमे का खर्च अलग-अलग मद हैं। इसी तरह ब्याज की गणना में उसकी दर के साथ शुरुआती तारीख भी मायने रखती है। किसी आदेश में बताई गई मूल कीमत को ही अंतिम कुल भुगतान समझ लेना सही नहीं होगा। ग्राहक और संबंधित कंपनी के लिए आदेश की प्रमाणित प्रति में दर्ज शर्तों को देखना आवश्यक है। उससे स्पष्ट होता है कि किस विकल्प के तहत राहत दी जानी है और अनुपालन के लिए कितना समय उपलब्ध है।
ऐसे विवादों में उपभोक्ताओं के लिए खरीद और शिकायत से जुड़े दस्तावेज व्यवस्थित रखना उपयोगी है। बिल, भुगतान की रसीद, वारंटी संबंधी कागजात, सर्विस जॉब कार्ड और ईमेल संवाद से घटनाक्रम स्पष्ट करने में मदद मिलती है। शिकायत कब की गई, वाहन कब सेवा केंद्र पर जमा हुआ और कंपनी की ओर से क्या जवाब मिला—इन बातों का क्रमवार विवरण भी रखना चाहिए। मौखिक बातचीत के बाद लिखित पुष्टि मांगने से आगे भ्रम की गुंजाइश कम हो सकती है।
शिकायत दर्ज करते समय समस्या का स्पष्ट विवरण देना भी जरूरी है। केवल यह लिखने के बजाय कि वाहन ठीक काम नहीं कर रहा, यह बताना ज्यादा उपयोगी होता है कि परेशानी किस परिस्थिति में आती है। शिकायत संख्या सुरक्षित रखने और उसके निस्तारण की स्थिति देखने से ग्राहक अपने रिकॉर्ड को बेहतर ढंग से संभाल सकता है। वाहन वापस लेते समय मरम्मत का विवरण और किए गए परीक्षण की जानकारी मांगना भी व्यावहारिक कदम है।
उपभोक्ता सहायता के लिए राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन पर 1915 के माध्यम से शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। ऑनलाइन व्यवस्था में संबंधित दस्तावेज संलग्न करने की सुविधा भी उपलब्ध है। हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज होना और उपभोक्ता आयोग द्वारा न्यायिक आदेश दिया जाना अलग प्रक्रियाएं हैं। उपभोक्ता को अपनी शिकायत की स्थिति और उपलब्ध राहत के अनुसार अगला कदम तय करना होता है। अलीगढ़ का यह मामला बिक्री के बाद सेवा की जवाबदेही का महत्व सामने लाता है। नई तकनीक और सुविधाओं के साथ ग्राहक को भरोसेमंद सहायता भी चाहिए। शिकायत मिलने के बाद स्पष्ट संवाद, समस्या की जांच और समय पर समाधान से विवाद बढ़ने से रोका जा सकता है। वहीं, उपभोक्ता के लिए अपने दस्तावेज सुरक्षित रखना और शिकायत का लिखित रिकॉर्ड बनाना अधिकारों की रक्षा की दिशा में उपयोगी कदम है।
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