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RBI की नई सूची में 17 बड़ी NBFC, टाटा संस समेत कई दिग्गज कंपनियां शामिल

Ratna Netam
6 Aug 2026 9:59 PM IST
RBI की नई सूची में 17 बड़ी NBFC, टाटा संस समेत कई दिग्गज कंपनियां शामिल
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नई दिल्ली : भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए अपर लेयर गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) की नई सूची जारी कर दी है। इस बार सूची में कुल **17 बड़ी एनबीएफसी** को शामिल किया गया है, जबकि पिछले दो वित्त वर्षों में यह संख्या 15 थी। नई सूची के साथ ही केंद्रीय बैंक ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि **टाटा संस** का नाम अपर लेयर श्रेणी में बरकरार रहेगा, हालांकि कंपनी की ओर से दायर **डी-रजिस्ट्रेशन (पंजीकरण निरस्तीकरण)** का आवेदन अभी भी आरबीआई के विचाराधीन है। केंद्रीय बैंक ने कहा कि सूची में शामिल किया जाना और डी-रजिस्ट्रेशन आवेदन पर अंतिम निर्णय दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।
आरबीआई द्वारा जारी यह सूची देश की उन बड़ी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की पहचान करती है, जिनका वित्तीय तंत्र पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए इन कंपनियों पर सामान्य एनबीएफसी की तुलना में अधिक सख्त नियामकीय नियम लागू किए जाते हैं। इनमें पूंजी पर्याप्तता, जोखिम प्रबंधन, कॉर्पोरेट गवर्नेंस, अनुपालन और निगरानी से जुड़े कई अतिरिक्त प्रावधान शामिल होते हैं। आरबीआई का मानना है कि बड़ी वित्तीय संस्थाओं की मजबूत निगरानी पूरे वित्तीय तंत्र की स्थिरता बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
केंद्रीय बैंक ने बताया कि वर्ष 2025-26 के दौरान अपर लेयर एनबीएफसी की पहचान के मानकों की व्यापक समीक्षा की गई थी। इसी कारण उस वित्त वर्ष के लिए अलग से सूची जारी नहीं की गई। संशोधित मानदंड लागू होने के बाद अब वित्त वर्ष 2026-27 की नई सूची तैयार की गई है। नए नियमों के अनुसार जिन गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के पास **कम से कम एक लाख करोड़ रुपये (एक ट्रिलियन रुपये)** की प्रबंधनाधीन परिसंपत्तियां (Assets Under Management) हैं, उन्हें अपर लेयर में शामिल किया जाता है।
इस बार सूची में तीन प्रमुख सरकारी वित्तीय संस्थानों **आरईसी लिमिटेड (REC)**, **पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन (PFC)** और **इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉरपोरेशन (IRFC)** को पहली बार जगह मिली है। इन कंपनियों के शामिल होने से अपर लेयर एनबीएफसी की कुल संख्या बढ़कर 17 हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन कंपनियों की बढ़ती परिसंपत्तियां और वित्तीय गतिविधियां उन्हें इस श्रेणी में शामिल किए जाने का प्रमुख कारण हैं।
वहीं, **पीएनबी हाउसिंग फाइनेंस** और **सम्मान कैपिटल** इस बार निर्धारित मानदंडों को पूरा नहीं कर सकीं, इसलिए इनके नाम नई सूची में शामिल नहीं किए गए। हालांकि आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि नियमों के अनुसार यदि कोई एनबीएफसी एक बार अपर लेयर में वर्गीकृत हो जाती है, तो वह कम से कम **पांच वर्षों तक** इस श्रेणी से जुड़े सभी नियामकीय प्रावधानों के दायरे में बनी रहती है, भले ही बाद के वर्षों में वह निर्धारित परिसंपत्ति सीमा या अन्य मानकों को पूरा न करे। इसलिए सूची से बाहर होने के बावजूद इन कंपनियों पर कड़े नियम लागू रहेंगे।
आरबीआई द्वारा जारी सूची में **बजाज फाइनेंस**, **श्रीराम फाइनेंस**, **एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस**, **टाटा कैपिटल**, **टाटा संस** सहित कई प्रमुख एनबीएफसी भी शामिल हैं। इन कंपनियों का देश की वित्तीय व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान है और लाखों ग्राहकों को ऋण, हाउसिंग फाइनेंस, वाहन ऋण तथा अन्य वित्तीय सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। ऐसे में इन संस्थानों की वित्तीय स्थिति और जोखिम प्रबंधन पर विशेष निगरानी रखना केंद्रीय बैंक की प्राथमिकता मानी जाती है।
टाटा संस का मामला इस सूची में सबसे अधिक चर्चा का विषय बना हुआ है। कंपनी लंबे समय से अपने एनबीएफसी पंजीकरण को समाप्त कराने के लिए आरबीआई के समक्ष आवेदन कर चुकी है। इसके बावजूद केंद्रीय बैंक ने दोबारा स्पष्ट किया कि जब तक इस आवेदन पर अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, तब तक कंपनी मौजूदा नियामकीय ढांचे के तहत ही कार्य करेगी और अपर लेयर सूची में शामिल रहेगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि आरबीआई की यह नई सूची केवल कंपनियों के आकार को नहीं दर्शाती, बल्कि यह उन संस्थानों की पहचान भी करती है जिनकी वित्तीय स्थिति का व्यापक प्रभाव बैंकिंग और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। ऐसे संस्थानों के लिए सख्त निगरानी से निवेशकों का विश्वास बढ़ता है, वित्तीय जोखिम कम होता है और पूरे वित्तीय तंत्र की पारदर्शिता एवं स्थिरता मजबूत होती है।
आरबीआई का यह कदम ऐसे समय आया है जब देश में गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। बैंकिंग सेवाओं से दूर क्षेत्रों तक ऋण पहुंचाने, आवास वित्त, वाहन वित्त और उपभोक्ता ऋण जैसे क्षेत्रों में एनबीएफसी का योगदान तेजी से बढ़ा है। ऐसे में केंद्रीय बैंक का मानना है कि बड़ी एनबीएफसी पर मजबूत नियामकीय नियंत्रण बनाए रखना वित्तीय प्रणाली की सुरक्षा और दीर्घकालिक स्थिरता के लिए बेहद जरूरी है।
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