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ITR अनिवार्यता पर उठे सवाल, TDS रिफंड मामले में केंद्र को हाईकोर्ट का नोटिस
Ratna Netam
7 Aug 2026 2:06 PM IST

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नई दिल्ली : यदि आपकी आय पर टीडीएस (Tax Deducted at Source) कट चुका है, लेकिन आपकी कुल आय इतनी नहीं है कि आपको आयकर देना पड़े, तो भविष्य में बिना आयकर रिटर्न (ITR) दाखिल किए भी टीडीएस रिफंड मिलने का रास्ता खुल सकता है। इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। अदालत में दायर एक जनहित याचिका (PIL) में मांग की गई है कि ऐसे लोगों के लिए ऑटोमेटिक टीडीएस रिफंड सिस्टम लागू किया जाए, जिन्हें टैक्स देनदारी नहीं होने के बावजूद केवल रिफंड प्राप्त करने के लिए आईटीआर दाखिल करना पड़ता है।
याचिका में आयकर अधिनियम, 2025 की धारा 433 को चुनौती दी गई है। इस प्रावधान के तहत टीडीएस रिफंड प्राप्त करने के लिए आयकर रिटर्न दाखिल करना अनिवार्य है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि जिन व्यक्तियों की कोई कर देनदारी नहीं बनती और जिन्हें कानून के तहत आईटीआर दाखिल करने की बाध्यता भी नहीं है, उन्हें केवल रिफंड पाने के लिए रिटर्न भरने के लिए मजबूर करना उचित नहीं है। उनका कहना है कि यह व्यवस्था छोटे करदाताओं के लिए अनावश्यक बोझ पैदा करती है।
इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने की। अदालत ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए इस मुद्दे पर विस्तृत जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 6 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई है। हाईकोर्ट का यह कदम उन लाखों लोगों के लिए उम्मीद लेकर आया है, जिन्हें हर साल टीडीएस कटने के बाद रिफंड पाने के लिए आईटीआर दाखिल करना पड़ता है।
याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया है कि केंद्र सरकार और केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) को निर्देश दिए जाएं कि वे पात्र करदाताओं के लिए ऑटोमेटिक टीडीएस रिफंड सिस्टम लागू करें। इसके तहत जिन लोगों की टैक्स देनदारी शून्य है और जिनके सभी आवश्यक वित्तीय रिकॉर्ड पहले से सरकार के पास उपलब्ध हैं, उन्हें बिना आईटीआर दाखिल किए सीधे रिफंड जारी किया जा सके।
याचिकाकर्ता का कहना है कि सरकार के पास पहले से ही पैन, आधार, फॉर्म 26AS, टीडीएस रिकॉर्ड और अन्य वित्तीय जानकारियां उपलब्ध रहती हैं। ऐसे में यह आसानी से सत्यापित किया जा सकता है कि किसी व्यक्ति की टैक्स देनदारी बनती है या नहीं। यदि किसी करदाता का टीडीएस आवश्यकता से अधिक कट गया है और उस पर कोई टैक्स बकाया नहीं है, तो उसका रिफंड स्वतः जारी किया जाना चाहिए।
इस प्रस्ताव का सबसे अधिक लाभ वरिष्ठ नागरिकों, कम आय वाले कर्मचारियों, ब्लू-कॉलर वर्कर्स, अस्थायी कर्मचारियों और छोटे वेतनभोगी लोगों को मिल सकता है। वर्तमान व्यवस्था में ऐसे कई लोग केवल कुछ हजार रुपये के रिफंड के लिए आईटीआर दाखिल नहीं करते, क्योंकि उन्हें प्रक्रिया जटिल लगती है या फिर पेशेवर सहायता लेने में अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है। परिणामस्वरूप उनका वैध रिफंड सरकार के पास ही रह जाता है।
याचिका में आयकर विभाग के आंकड़ों का भी उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार लगभग 2.35 करोड़ ऐसे लोगों के नाम टीडीएस क्रेडिट रिकॉर्ड में दर्ज थे जिन्होंने आयकर रिटर्न दाखिल नहीं किया। याचिकाकर्ता का दावा है कि इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की हो सकती है जिनकी कोई कर देनदारी नहीं थी, लेकिन वे केवल आईटीआर दाखिल न करने के कारण अपना रिफंड प्राप्त नहीं कर सके।
इसके अलावा याचिका में यह भी बताया गया है कि आयकर विधेयक, 2025 की समीक्षा करने वाली संसदीय चयन समिति ने छोटे करदाताओं को राहत देने के लिए टीडीएस रिफंड हेतु आईटीआर दाखिल करने की अनिवार्यता समाप्त करने की सिफारिश की थी। हालांकि, अंतिम कानून में इस सुझाव को शामिल नहीं किया गया।
फिलहाल करदाताओं के लिए यह जानना जरूरी है कि अभी नियमों में कोई बदलाव नहीं हुआ है। दिल्ली हाईकोर्ट में मामला विचाराधीन है और केंद्र सरकार का जवाब आने के बाद ही आगे की प्रक्रिया तय होगी। जब तक सरकार कोई नया प्रावधान लागू नहीं करती या अदालत कोई निर्देश जारी नहीं करती, तब तक जहां आईटीआर दाखिल करना अनिवार्य है, वहां टीडीएस रिफंड प्राप्त करने के लिए मौजूदा नियमों के अनुसार आयकर रिटर्न भरना ही होगा।
दिल्ली हाईकोर्ट में चल रही यह सुनवाई भविष्य में भारत की टैक्स व्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकती है। यदि याचिका के पक्ष में निर्णय आता है या सरकार ऑटोमेटिक टीडीएस रिफंड सिस्टम लागू करती है, तो करोड़ों छोटे करदाताओं को राहत मिलेगी और उन्हें केवल रिफंड पाने के लिए अनावश्यक रूप से आईटीआर दाखिल करने की बाध्यता से मुक्ति मिल सकती है।
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