व्यापार
भारत के नए उद्योगों में निवेश की तैयारी, बैंकों से कर्ज मिलना अब भी चुनौती
Ratna Netam
25 Oct 2026 5:10 PM IST

x
नई दिल्ली। भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे उभरते क्षेत्रों में निवेश की संभावनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। इसके बावजूद इन क्षेत्रों की कंपनियों और परियोजनाओं को बैंकों तथा गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) से पर्याप्त कर्ज हासिल करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की एक शोध रिपोर्ट के मुताबिक, इन क्षेत्रों में निवेश बढ़ने के साथ वित्तपोषण की जरूरतें भी बदल रही हैं, लेकिन जोखिम और लंबी अवधि में पैसा वापस मिलने की अनिश्चितता के कारण पारंपरिक कर्ज उपलब्ध कराना आसान नहीं है।रिपोर्ट के अनुसार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर और रक्षा क्षेत्र में घोषित सार्वजनिक तथा निजी निवेश का कुल अनुमान लगभग 16.24 लाख करोड़ रुपये है। इसमें AI क्षेत्र के लिए करीब 5.90 लाख करोड़ रुपये, सेमीकंडक्टर क्षेत्र के लिए 5.27 लाख करोड़ रुपये और रक्षा क्षेत्र के लिए 5.07 लाख करोड़ रुपये के निवेश का अनुमान शामिल है। इन क्षेत्रों में सरकारी योजनाओं, निजी कंपनियों और तकनीकी विकास से आने वाले वर्षों में पूंजीगत खर्च बढ़ने की संभावना है।
AI और अंतरिक्ष क्षेत्र में इक्विटी पर ज्यादा निर्भरता
रिपोर्ट में बताया गया है कि सभी उभरते क्षेत्रों में फंडिंग का स्वरूप एक जैसा नहीं है। विनिर्माण और बिजली परियोजनाओं में बैंक कर्ज की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है, जबकि AI और अंतरिक्ष तकनीक जैसे क्षेत्रों में निवेश के लिए इक्विटी यानी कंपनी में हिस्सेदारी के बदले मिलने वाली पूंजी पर अधिक निर्भरता है।इसकी प्रमुख वजह इन क्षेत्रों में तकनीकी बदलाव की तेज रफ्तार और निवेश से कमाई शुरू होने में लगने वाला लंबा समय है। रिपोर्ट के मुताबिक, सेमीकंडक्टर परियोजनाओं में निवेश की भरपाई होने में लगभग पांच से आठ साल लग सकते हैं। वहीं, अंतरिक्ष क्षेत्र की परियोजनाओं में यह अवधि सात से दस साल तक हो सकती है। इतनी लंबी अवधि पारंपरिक बैंक ऋण की शर्तों के साथ तालमेल बैठाने में मुश्किल पैदा करती है।AI क्षेत्र में भी तकनीकी उपकरणों के तेजी से पुराने पड़ने का जोखिम है। रिपोर्ट के अनुसार, ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (GPU) आधारित बुनियादी ढांचे को हर 18 से 24 महीने में अपग्रेड करने की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में बैंकों के लिए यह आकलन करना जरूरी हो जाता है कि मौजूदा उपकरणों से होने वाली कमाई भविष्य में कर्ज चुकाने के लिए पर्याप्त होगी या नहीं।
ग्रीन हाइड्रोजन और नवीकरणीय ऊर्जा में भुगतान की चुनौती
ग्रीन हाइड्रोजन, नवीकरणीय ऊर्जा और नई बैटरी तकनीक जैसे क्षेत्रों में भी निवेश की संभावनाएं बढ़ रही हैं। हालांकि, इन परियोजनाओं के सामने खरीदारों की उपलब्धता, भुगतान में देरी और लंबे समय तक पूंजी फंसे रहने जैसी चुनौतियां हैं।रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रीन हाइड्रोजन परियोजनाओं में पर्याप्त और भरोसेमंद खरीदारों की उपलब्धता महत्वपूर्ण है। इसी तरह, नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में बिजली वितरण कंपनियों की ओर से भुगतान में देरी परियोजनाओं के नकदी प्रवाह को प्रभावित कर सकती है। रक्षा क्षेत्र में भी रक्षा मंत्रालय से भुगतान मिलने में लगने वाला समय कर्ज देने वाली संस्थाओं के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।
बैंकों के लिए विशेष वित्तपोषण व्यवस्था का सुझाव
यूनियन बैंक की रिपोर्ट में बैंकों को सेमीकंडक्टर, हाइड्रोजन, डेटा सेंटर और बैटरी स्टोरेज जैसे क्षेत्रों के लिए विशेष वित्तपोषण व्यवस्था विकसित करने का सुझाव दिया गया है। इसके तहत परियोजना की प्रगति के अनुसार चरणबद्ध तरीके से कर्ज जारी किया जा सकता है। इससे बैंक यह सुनिश्चित कर सकेंगे कि राशि का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्य के लिए हो रहा है और परियोजना तय समयसीमा के अनुरूप आगे बढ़ रही है।रिपोर्ट में प्राप्य राशि के आधार पर वित्तपोषण, उपकरणों को पट्टे पर देने की व्यवस्था, ऑर्डर बुक के आधार पर कर्ज और हरित ऋण जैसे विकल्पों पर भी जोर दिया गया है। इन उपायों से उन कंपनियों को मदद मिल सकती है, जिन्हें कारोबार बढ़ाने के लिए पूंजी चाहिए, लेकिन पारंपरिक बैंक ऋण की शर्तें पूरी करना कठिन है।
अगले तीन से पांच साल में बदल सकती है कर्ज की मांग
रिपोर्ट के मुताबिक, अगले तीन से पांच वर्षों में बैटरी स्टोरेज, सेमीकंडक्टर पैकेजिंग, ग्रीन हाइड्रोजन, छोटे और एज डेटा सेंटर तथा रक्षा उपकरणों के विनिर्माण से जुड़े छोटे और मध्यम उद्यमों में वित्तपोषण की मांग बढ़ सकती है।इलेक्ट्रिक वाहन और ड्रोन जैसे क्षेत्रों में उपकरणों तथा संपत्तियों के आधार पर कर्ज देने और NBFC की भूमिका बढ़ाने की संभावना भी जताई गई है। वहीं, नवीकरणीय ऊर्जा, सेमीकंडक्टर, ग्रीन हाइड्रोजन और महत्वपूर्ण खनिजों से जुड़ी परियोजनाओं को परियोजना वित्तपोषण के माध्यम से सहायता मिल सकती है।कुल मिलाकर, भारत के उभरते उद्योग निवेश के नए अवसर पैदा कर रहे हैं, लेकिन इन अवसरों को वास्तविक परियोजनाओं में बदलने के लिए उपयुक्त वित्तीय व्यवस्था जरूरी होगी। रिपोर्ट का संकेत है कि बैंकों और NBFC को अपने ऋण उत्पादों तथा जोखिम आकलन की प्रक्रिया में बदलाव करना होगा, ताकि नई तकनीक और उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप पूंजी उपलब्ध कराई जा सके।
Next Story





