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GST में गिरफ्तारी के नियम बदलने की तैयारी

Ashish verma
4 Oct 2026 9:09 PM IST
GST में गिरफ्तारी के नियम बदलने की तैयारी
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GST Reform। माल एवं सेवा कर यानी जीएसटी व्यवस्था में कारोबारियों और टैक्सपेयर्स के लिए आने वाले दिनों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। जीएसटी परिषद की 7 अक्टूबर को होने वाली बैठक में गिरफ्तारी और आपराधिक कार्रवाई से जुड़े नियमों में बदलाव के प्रस्ताव पर विचार किया जा सकता है। रिपोर्टों के मुताबिक, सरकार जीएसटी अधिकारियों की गिरफ्तारी संबंधी शक्तियों को सीमित करने और कुछ मामलों में अदालत की मंजूरी को जरूरी बनाने के विकल्प पर विचार कर रही है। हालांकि, ये अभी प्रस्तावित बदलाव हैं और अंतिम फैसला जीएसटी परिषद की बैठक तथा उसके बाद की विधायी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
बताया जा रहा है कि प्रस्तावित सुधारों का मकसद जीएसटी कानून में प्रवर्तन कार्रवाई को अधिक स्पष्ट और संतुलित बनाना है। इसके तहत गिरफ्तारी की मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा के साथ-साथ उन अपराधों की सीमा बढ़ाने पर भी विचार हो सकता है, जिनमें आपराधिक कार्रवाई शुरू की जाती है।
7 अक्टूबर की बैठक पर नजर
जीएसटी परिषद केंद्र और राज्यों के बीच अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले लेने वाली शीर्ष संस्था
है। अक्टूबर की बैठक में जीएसटी व्यवस्था में प्रक्रियागत सुधारों से जुड़े कई मुद्दों पर चर्चा होने की जानकारी पहले ही सामने आ चुकी है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी सितंबर में कहा था कि 7 अक्टूबर की बैठक में ई-इनवॉइसिंग, इनपुट टैक्स क्रेडिट और दूसरे प्रक्रिया सुधारों पर चर्चा होगी।
इसी बैठक में गिरफ्तारी और आपराधिक मामलों से जुड़े प्रावधानों की समीक्षा को भी एजेंडे का हिस्सा बनाए जाने की रिपोर्ट है। यदि प्रस्ताव आगे बढ़ता है तो जीएसटी अधिकारियों और कारोबारियों के बीच जांच तथा प्रवर्तन प्रक्रिया में महत्वपूर्ण बदलाव हो सकते हैं।
गिरफ्तारी की शक्ति को लेकर क्या प्रस्ताव है?
मौजूदा जीएसटी व्यवस्था में गंभीर कर अपराधों के मामलों में निर्धारित कानूनी प्रावधानों के तहत गिरफ्तारी की कार्रवाई की जा सकती है। डीजीजीआई की ओर से जारी हालिया मामलों में भी सीजीएसटी एक्ट की धारा 69 के तहत गिरफ्तारियों का उल्लेख मिलता है।
अब प्रस्तावित बदलावों में अधिकारियों की गिरफ्तारी की शक्ति को वापस लेने या उसे काफी सीमित करने की संभावना पर विचार किया जा रहा है। इसके साथ ही किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी से पहले अदालत की मंजूरी अनिवार्य करने का विकल्प भी चर्चा में है।
अगर यह प्रस्ताव लागू होता है तो जीएसटी जांच के दौरान गिरफ्तारी की प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक न्यायिक निगरानी के दायरे में आ सकती है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि अंतिम व्यवस्था किस रूप में लागू होगी।
एक करोड़ से पांच करोड़ तक बढ़ सकती है सीमा
प्रस्तावित सुधारों का एक अहम हिस्सा आपराधिक कार्रवाई शुरू करने की सीमा से जुड़ा बताया जा रहा है। जानकारी के अनुसार, जीएसटी कानून के तहत अभियोजन यानी prosecution शुरू करने की मौजूदा एक करोड़ रुपये की सीमा को बढ़ाकर पांच करोड़ रुपये किया जा सकता है।
जीएसटी परिषद के पुराने आधिकारिक दस्तावेजों में भी इस विषय पर चर्चा दर्ज है। 49वीं जीएसटी परिषद की एजेंडा सामग्री में कहा गया था कि सीजीएसटी एक्ट की धारा 132 के तहत अभियोजन शुरू करने के लिए कर चोरी, गलत तरीके से लिए या इस्तेमाल किए गए इनपुट टैक्स क्रेडिट या गलत तरीके से लिए गए रिफंड की न्यूनतम सीमा एक करोड़ रुपये थी। उसी दस्तावेज में गिरफ्तारी की सीमा दो करोड़ रुपये और अभियोजन व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत का उल्लेख था।
अब यदि नई सीमा पांच करोड़ रुपये की जाती है तो अपेक्षाकृत कम राशि से जुड़े मामलों में आपराधिक कार्रवाई का दायरा कम हो सकता है।
कारोबारियों को मिल सकती है राहत
प्रस्तावित बदलावों से कारोबारी समुदाय को राहत मिलने की उम्मीद की जा रही है। कारोबारियों का एक वर्ग लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि टैक्स विवाद और वास्तविक आपराधिक धोखाधड़ी के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए।
जीएसटी व्यवस्था में कई मामलों में टैक्स की गणना, इनपुट टैक्स क्रेडिट, वर्गीकरण या नियमों की व्याख्या को लेकर विवाद पैदा हो सकता है। ऐसे मामलों में यदि सीधे आपराधिक कार्रवाई या गिरफ्तारी का डर हो तो कारोबारी माहौल पर असर पड़ सकता है।
इसलिए प्रस्तावित सुधारों का उद्देश्य गंभीर और जानबूझकर किए गए कर अपराधों पर कार्रवाई जारी रखते हुए सामान्य कारोबारी विवादों में कठोर आपराधिक प्रावधानों के इस्तेमाल को सीमित करना हो सकता है।
फर्जी बिल और टैक्स चोरी के मामलों पर नजर
हालांकि गिरफ्तारी के नियमों में संभावित नरमी का मतलब यह नहीं होगा कि गंभीर जीएसटी धोखाधड़ी के मामलों में कार्रवाई खत्म हो जाएगी। फर्जी कंपनियां बनाकर इनपुट टैक्स क्रेडिट का गलत इस्तेमाल, फर्जी इनवॉयस और जानबूझकर टैक्स चोरी जैसे मामलों में सरकार की प्रवर्तन एजेंसियां कार्रवाई करती रही हैं।
डीजीजीआई के अनुसार, हाल के मामलों में फर्जी जीएसटी इनवॉयस और गलत तरीके से आईटीसी हासिल करने से जुड़े मामलों में गिरफ्तारियां की गई हैं। ऐसे मामलों में जांच के दौरान आर्थिक अपराध की प्रकृति और उपलब्ध सबूतों के आधार पर कार्रवाई की जाती है।
इसलिए प्रस्तावित सुधारों को टैक्स चोरी के खिलाफ कार्रवाई खत्म करने के बजाय गिरफ्तारी और अभियोजन की प्रक्रिया को अधिक लक्षित बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।
अदालत की मंजूरी से क्या बदलेगा?
अगर गिरफ्तारी से पहले अदालत की मंजूरी को अनिवार्य बनाया जाता है, तो जांच एजेंसियों को किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने से पहले न्यायिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है। इससे गिरफ्तारी की कार्रवाई पर अतिरिक्त निगरानी बढ़ेगी।
कारोबारियों के नजरिए से यह बदलाव महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि गिरफ्तारी जैसे कठोर कदम से पहले स्वतंत्र न्यायिक जांच का प्रावधान सुरक्षा कवच की तरह काम कर सकता है। दूसरी ओर, सरकार के सामने चुनौती यह होगी कि गंभीर आर्थिक अपराधों की जांच में अनावश्यक देरी न हो।
यानी नए सिस्टम में एक तरफ करदाताओं के अधिकारों की रक्षा और दूसरी तरफ राजस्व चोरी पर प्रभावी कार्रवाई के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण होगा।
अभी फैसला अंतिम नहीं
यहां यह समझना जरूरी है कि 7 अक्टूबर की बैठक में किसी प्रस्ताव पर चर्चा होने का अर्थ यह नहीं है कि उसी दिन से कानून बदल जाएगा। जीएसटी परिषद की सिफारिश के बाद संबंधित कानूनी संशोधनों के लिए आवश्यक विधायी प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
इसलिए जब तक कानून में औपचारिक संशोधन नहीं होता, मौजूदा प्रावधान ही लागू रहेंगे। जीएसटी परिषद की बैठक के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि गिरफ्तारी की शक्ति, अदालत की मंजूरी और अभियोजन की सीमा को लेकर अंतिम फैसला क्या लिया गया है।
कुल मिलाकर, 7 अक्टूबर की जीएसटी परिषद की बैठक कारोबारियों और टैक्स प्रशासन दोनों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। गिरफ्तारी की शक्तियों को सीमित करने, न्यायिक मंजूरी की व्यवस्था लाने और अभियोजन की सीमा को एक करोड़ से बढ़ाकर पांच करोड़ रुपये करने जैसे प्रस्ताव यदि आगे बढ़ते हैं, तो जीएसटी कानून में प्रवर्तन व्यवस्था का स्वरूप बदल सकता है। फिलहाल इन प्रस्तावों पर अंतिम निर्णय का इंतजार है।
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