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रुपए में कमजोरी से घबराने की आवश्यकता नहीं, वैश्विक अस्थिरता घटने पर आएगी रिकवरी: अरविंद पनगढ़िया
jantaserishta.com
25 May 2026 2:16 PM IST

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नई दिल्ली: अर्थशास्त्री और पूर्व नीति आयोग के वाइस-चेयरमैन अरविंद पनगढ़िया ने कहा कि अगर डॉलर के मुकाबले रुपया 100 के स्तर को छूता है तो घबराने की आवश्यक नहीं है, क्योंकि जैसे ही वैश्विक अस्थिरता का दौर समाप्त होने लगेगा, रुपए में तेजी लौटेगी।
बातचीत करते हुए पनगढ़िया ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को मनोवैज्ञानिक स्तर की रक्षा के लिए मुद्रा बाजार में अत्यधिक हस्तक्षेप करने के बजाय विनिमय दर को स्वाभाविक रूप से समायोजित होने देना चाहिए।
अर्थशास्त्री के मुताबिक, डॉलर के मुकाबले रुपए के 100 के स्तर पर पहुंचने पर घबराने की आवश्यकता नहीं है। वैश्विक अनिश्चितता और भू-राजनीतिक तनाव के दौर में बाहरी झटकों को अवशोषित करने में विनिमय दर को अपना काम करने की अनुमति दी जानी चाहिए।
पनगढ़िया ने कहा कि अगर केंद्रीय बैंक डॉलर के मुकाबले रुपए में गिरावट को रोकने के लिए आक्रामक रूप से कदम उठाता है तो इससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ सकता है। अर्थशास्त्री के मुताबिक, चाहे मौजूदा वैश्विक संकट अस्थायी हो या दीर्घकालिक, मुद्रा के क्रमिक अवमूल्यन से अर्थव्यवस्था को अधिक कुशलता से समायोजित करने में मदद मिलेगी।
इसके अलावा, अर्थशास्त्री ने तर्क दिया कि कच्चे तेल की बढ़ती वैश्विक कीमतों का घरेलू ईंधन की कीमतों पर धीरे-धीरे प्रभाव पड़ना चाहिए, न कि उन्हें कृत्रिम रूप से कम किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, "सरकार किसी भी उत्पाद की निश्चित कीमत की गारंटी देने के लिए नहीं है।"
पनगढ़िया ने उच्च ब्याज दर वाली एनआरआई जमा योजनाओं के माध्यम से विदेशी मुद्रा प्रवाह को आकर्षित करने के प्रस्तावों पर भी आपत्ति जताई और चेतावनी दी कि ऐसे उपाय अर्थव्यवस्था पर दीर्घकालिक बोझ बढ़ा सकते हैं।
इसके अलावा, उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नागरिकों से विवेकाधीन विदेशी मुद्रा खर्च को कम करने की अपील का समर्थन किया, लेकिन अनिवार्य प्रतिबंध लगाने के खिलाफ आगाह किया, यह कहते हुए कि ऐसे प्रतिबंध प्रतिकूल साबित हो सकते हैं।
इससे पहले, पनगढ़िया ने सोशल मीडिया पर कहा था कि नीति निर्माताओं को 100 रुपए प्रति डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर को मौद्रिक रणनीति का आधार नहीं बनने देना चाहिए, साथ ही तर्क दिया कि अस्थिर वैश्विक परिस्थितियों में बाजार-संचालित मुद्रा समायोजन अधिक टिकाऊ होते हैं।
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