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मुकेश अंबानी की जियो का अमेरिका में बड़ा दांव, Comcast और Charter से साझेदारी की बातचीत

Kavita2
4 Nov 2026 3:08 PM IST
मुकेश अंबानी की जियो का अमेरिका में बड़ा दांव, Comcast और Charter से साझेदारी की बातचीत
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नई दिल्ली। रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी की कंपनी जियो प्लेटफॉर्म्स अब अंतरराष्ट्रीय ब्रॉडबैंड बाजार में अपनी मौजूदगी मजबूत करने की तैयारी कर रही है। भारतीय दूरसंचार क्षेत्र में बड़ा मुकाम हासिल करने के बाद कंपनी की नजर अमेरिका जैसे विकसित और प्रतिस्पर्धी बाजार पर है। एक रिपोर्ट के अनुसार, जियो प्लेटफॉर्म्स ने अपनी वायरलेस ब्रॉडबैंड तकनीक का लाइसेंस देने और बदले में संभावित इक्विटी हिस्सेदारी हासिल करने के लिए अमेरिका की प्रमुख केबल कंपनियों कॉमकास्ट और चार्टर कम्युनिकेशंस के साथ बातचीत की है।

मामले की जानकारी रखने वाले दो सूत्रों ने बताया कि जियो प्लेटफॉर्म्स कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के साथ संभावित साझेदारी की संभावनाएं तलाश रही है। इन बातचीत का उद्देश्य जियो की विकसित की गई ब्रॉडबैंड तकनीक को दूसरे देशों तक पहुंचाना और बदले में संबंधित कारोबार में हिस्सेदारी हासिल करना है।

हालांकि, अभी तक कॉमकास्ट या चार्टर कम्युनिकेशंस के साथ किसी अंतिम समझौते की घोषणा नहीं हुई है। सूत्रों के अनुसार, बातचीत को अंतिम रूप देने के लिए कोई निश्चित समयसीमा भी निर्धारित नहीं की गई है। ऐसे में फिलहाल इसे संभावित व्यावसायिक साझेदारी के रूप में ही देखा जा रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार, जियो प्लेटफॉर्म्स ने दक्षिण अफ्रीका की प्रमुख दूरसंचार कंपनी एमटीएन ग्रुप के साथ भी इसी तरह की साझेदारी को लेकर चर्चा की थी। हालांकि, दोनों कंपनियों के बीच मूल्यांकन और तकनीक के लाइसेंस से संबंधित कुछ शर्तों पर सहमति नहीं बन सकी। इसके चलते बातचीत किसी समझौते तक नहीं पहुंच पाई।

सूत्रों के मुताबिक, एमटीएन ग्रुप जियो को ऐसे मूल्यांकन पर निवेश के लिए सहमत नहीं कर सका, जो दोनों पक्षों को स्वीकार्य हो। संभावित साझेदारी के वित्तीय विवरण भी सार्वजनिक नहीं हुए हैं। एमटीएन ग्रुप ने इस संबंध में बाजार की अटकलों पर टिप्पणी करने से इनकार किया है।

जियो प्लेटफॉर्म्स की अंतरराष्ट्रीय विस्तार की यह कोशिश ऐसे समय सामने आई है, जब कंपनी ने हाल ही में भारतीय शेयर बाजार में अपनी लिस्टिंग पूरी की है। रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी ने पिछले सप्ताह मुंबई में लगभग 3.2 अरब डॉलर के रिकॉर्ड प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम यानी आईपीओ के बाद शेयर बाजार में कदम रखा।

आईपीओ के बाद जियो के अंतरराष्ट्रीय विस्तार की संभावनाओं पर निवेशकों की नजर बनी हुई है। कंपनी यदि अपनी तकनीक के जरिए विदेशी बाजारों में सफलतापूर्वक प्रवेश करती है, तो उसके लिए घरेलू दूरसंचार सेवाओं से आगे कारोबार बढ़ाने के नए अवसर खुल सकते हैं।

रिपोर्ट में बताया गया है कि जियो प्लेटफॉर्म्स अपनी विशेष वायरलेस ब्रॉडबैंड तकनीक को अंतरराष्ट्रीय कंपनियों तक पहुंचाने की योजना पर काम कर रही है। इस तकनीक को अनलाइसेंस्ड बैंड रेडियो यानी यूबीआर के नाम से जाना जाता है।

इस प्रणाली की खासियत यह है कि घरों तक इंटरनेट पहुंचाने के लिए हर स्थान पर पारंपरिक केबल नेटवर्क बिछाने की आवश्यकता नहीं होती। तकनीक में आसपास के टावरों या इमारतों की छतों पर लगे ट्रांसमीटरों से वायरलेस सिग्नल भेजे जाते हैं। ये सिग्नल संबंधित इमारतों पर लगाए गए रिसीवर तक पहुंचते हैं, जिनके माध्यम से हाई-स्पीड इंटरनेट उपलब्ध कराया जा सकता है।

जियो का दावा है कि यह तकनीक पारंपरिक केबल नेटवर्क या कुछ अन्य इंटरनेट वितरण प्रणालियों की तुलना में लागत कम करने में मदद कर सकती है। हालांकि, वास्तविक लागत और प्रदर्शन स्थानीय परिस्थितियों, नेटवर्क की क्षमता तथा तकनीकी व्यवस्था पर निर्भर करेंगे।

अमेरिका में इस समय घरेलू ब्रॉडबैंड बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। पारंपरिक केबल इंटरनेट सेवाएं देने वाली कंपनियों को फाइबर ब्रॉडबैंड और फिक्स्ड वायरलेस इंटरनेट सेवाओं से चुनौती मिल रही है। ऐसे में नई तकनीकों के माध्यम से इंटरनेट पहुंचाने की लागत कम करना और ग्राहकों को बेहतर सेवा देना कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण हो गया है।

कॉमकास्ट और चार्टर कम्युनिकेशंस अमेरिका के बड़े केबल नेटवर्क ऑपरेटरों में शामिल हैं। यदि इनमें से किसी कंपनी के साथ जियो का समझौता होता है, तो भारतीय कंपनी को अमेरिकी इंटरनेट बाजार में अपनी तकनीक स्थापित करने का अवसर मिल सकता है।

संभावित समझौते का एक महत्वपूर्ण पहलू इक्विटी हिस्सेदारी है। सामान्य तकनीकी लाइसेंसिंग समझौते में कंपनी अपनी तकनीक इस्तेमाल करने के बदले शुल्क या रॉयल्टी प्राप्त करती है। लेकिन इक्विटी आधारित समझौते में तकनीक उपलब्ध कराने वाली कंपनी को संबंधित कारोबार में हिस्सेदारी मिल सकती है।

इस तरह की व्यवस्था से जियो को केवल तकनीक उपलब्ध कराने तक सीमित रहने के बजाय साझेदार कंपनी के कारोबार की संभावित वृद्धि में भी भागीदारी मिल सकती है। हालांकि, इस मॉडल में निवेश से जुड़े व्यावसायिक जोखिम भी होते हैं। हिस्सेदारी का मूल्य संबंधित कंपनी के प्रदर्शन और बाजार की परिस्थितियों से प्रभावित हो सकता है।

जियो प्लेटफॉर्म्स ने पिछले सप्ताह संकेत दिया था कि वह अपनी तकनीक के लिए दुनिया भर में 10 से 15 साझेदार बनाने का लक्ष्य रख रही है। इससे स्पष्ट होता है कि कंपनी अंतरराष्ट्रीय बाजार में तकनीक आधारित विस्तार की व्यापक संभावनाएं तलाश रही है।

रिलायंस इंडस्ट्रीज के लिए यह रणनीति महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि जियो को अब केवल भारत में मोबाइल और ब्रॉडबैंड सेवाएं उपलब्ध कराने वाली कंपनी के रूप में नहीं, बल्कि अपनी तकनीक दूसरे देशों को उपलब्ध कराने वाले कारोबारी मंच के रूप में भी विकसित करने की कोशिश की जा रही है।

हालांकि, इस पूरे मामले में कंपनियों की आधिकारिक प्रतिक्रिया सीमित रही है। रॉयटर्स के सवालों का जियो प्लेटफॉर्म्स ने जवाब नहीं दिया, जबकि कॉमकास्ट और चार्टर कम्युनिकेशंस के प्रवक्ताओं ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

फिलहाल बाजार की नजर इस बात पर रहेगी कि जियो प्लेटफॉर्म्स अमेरिकी कंपनियों के साथ बातचीत को किसी ठोस समझौते में बदल पाती है या नहीं। यदि प्रस्तावित साझेदारी सफल होती है, तो इससे भारतीय दूरसंचार तकनीक को वैश्विक स्तर पर विस्तार का नया अवसर मिल सकता है।

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