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Delhi दिल्ली: भारतीय भाषाओं से जुड़े आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म्स विकसित करने का सार्थक प्रयास किया जा रहा है। इसके तहत 22 भाषाओं के लिए एआई पर काम किया जा रहा है। ये 22 भारतीय भाषाएं देश की लगभग 99 प्रतिशत जनसंख्या को कवर करती हैं। यानी सिर्फ अंग्रेजी प्रधान वैश्विक एआई पारिस्थितिकी तंत्र ही नहीं होगा, बल्कि भारत की भाषाएं भी इस वैश्विक दौड़ में शामिल होंगी।
भारतीय भाषा से जुड़े ऐसे गंभीर विषयों पर मंगलवार को इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, इंडिया एआई, असम सरकार और आईआईटी गुवाहाटी द्वारा आयोजित ह्यूमन कैपिटल वर्किंग ग्रुप की बैठक आयोजित की गई। यहां दिनभर चली चर्चाओं का मुख्य केंद्र क्षेत्रीय भाषाओं की एआई अवसंरचना, राष्ट्रीय भाषा अनुवाद मिशन (एनएलटीएम), एआई-सक्षम शिक्षा और भाषिनी प्लेटफॉर्म के व्यावहारिक क्रियान्वयन पर रहा। इस सबका उद्देश्य था, मानव पूंजी से जुड़े विजन को ऐसे ढांचों में ढालना जो बड़े स्तर पर लागू किए जा सकें।
आईआईटी मद्रास के प्रोफेसर मितेश खापरे ने मिशन की चार वर्षों की यात्रा और उसके उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय भाषा अनुवाद मिशन का लक्ष्य भारत की भाषाई विविधता के लिए मूलभूत एआई और भाषा तकनीकों का विकास करना है। यह मिशन 22 भारतीय भाषाओं पर केंद्रित है, जो देश की लगभग 99 प्रतिशत जनसंख्या को कवर करती हैं।
उन्होंने अंग्रेजी-प्रधान वैश्विक एआई पारिस्थितिकी का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की भाषाओं को इस वैश्विक दौड़ में पीछे नहीं छोड़ा जा सकता। वहीं आईआईटी गुवाहाटी के प्रोफेसर रोहित सिन्हा ने पूर्वोत्तर भारत की भाषाई विविधता और उससे जुड़े तकनीकी विकास पर जानकारी रखी। उन्होंने बताया कि देश की केवल 3 से 4 प्रतिशत आबादी वाला यह क्षेत्र लगभग 200 भाषाओं का प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने कहा कि केंद्र द्वारा स्थानीय डेटा संग्रह, मूल वक्ताओं द्वारा एनोटेशन, मशीन अनुवाद, वाणी पहचान और टेक्स्ट-टू-स्पीच तकनीकों पर कार्य किया जा रहा है। यह इस क्षेत्र की कई भाषाओं जैसे असमिया और मिजो के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इससे शिक्षा, प्रशासन और डिजिटल सेवाओं तक सभी की एक समान पहुंच सुनिश्चित होती है।
डिजिटल इंडिया भाषिनी डिवीजन की ज्योतिस्मिता देवी ने भाषिनी पहल का विस्तार से परिचय देते हुए कहा कि इसका उद्देश्य आवाज आधारित, सर्वसमावेशी भाषा तकनीक विकसित करना है। इससे नागरिक अपनी मातृभाषा में डिजिटल प्रणालियों से संवाद कर सकेंगे, फिर चाहे उनकी साक्षरता या इंटरनेट उपयोग क्षमता सीमित ही क्यों न हो। उन्होंने बताया कि यह प्लेटफॉर्म वॉइस-आधारित फॉर्म भरने से लेकर वेबसाइटों व मोबाइल ऐप्स पर रियल-टाइम अनुवाद तक अनेक उपयोगी सुविधाएं प्रदान कर रहा है। साथ ही शोधकर्ताओं तथा छात्रों के लिए ओपन एपीआई, डेटासेट और मानक उपलब्ध करवा रहा है।
अंतिम सत्र में आईआईटी गुवाहाटी के प्रोफेसर अमित अवेकर ने एआई शिक्षा में रिवर्स इंजीनियरिंग दृष्टिकोण पर चर्चा की। उन्होंने छात्रों को समझाया कि केवल टूल्स का उपयोग करना सीखना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि एआई प्रणालियों की संरचना, समस्या समाधान क्षमता, मॉड्यूलर डिजाइन, दस्तावेज़ीकरण, डिबगिंग और नैतिक उपयोग की गहरी समझ विकसित करना अनिवार्य है।
उन्होंने रिवर्स इंजीनियरिंग को ऐसी शिक्षण पद्धति बताया जो छात्रों में जिज्ञासा, रचनात्मकता और आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा देती है। यहां मौजूद सभी शिक्षाविदों व विशेषज्ञों का यह साझा दृष्टिकोण सामने आया कि भारत को ऐसी मानव पूंजी तैयार करनी होगी जो एआई का उपयोग करने के साथ-साथ उसे विकसित करने, समझने और जिम्मेदारीपूर्वक संचालित करने में भी सक्षम हो।
दरअसल, फरवरी में नई दिल्ली में इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 होने वाली है। इससे पहले मंगलवार को हुई यह बैठक एक महत्वपूर्ण पूर्व-चरण साबित हुई है। केंद्र सरकार का मानना है कि इस बैठक से प्राप्त निष्कर्ष राष्ट्रीय और वैश्विक चर्चाओं को दिशा देने में सहायक होंगे। साथ ही भारत के समावेशी, सक्षम तथा भविष्य-तैयार एआई इकोसिस्टम के निर्माण की दिशा को और मजबूती भी प्रदान करेंगे।
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