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मुंबई। भारतीय शेयर बाजार में लगातार दो सप्ताह से जारी तेजी का सिलसिला इस सप्ताह टूट गया। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के कारण निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया। इससे प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी साप्ताहिक आधार पर गिरावट के साथ बंद हुए।
सप्ताह के दौरान नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी-50 करीब 0.83 प्रतिशत गिरकर 24,366 अंक पर बंद हुआ। वहीं बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का सेंसेक्स करीब 0.62 प्रतिशत कमजोर होकर 78,009.25 अंक पर आ गया। बाजार की यह गिरावट पिछले दो सप्ताह में दर्ज बढ़त के बाद आई है।
सप्ताह के अंतिम कारोबारी सत्र में भी बाजार पर दबाव बना रहा। निफ्टी 29.85 अंक यानी 0.12 प्रतिशत टूटकर 24,366 पर बंद हुआ। सेंसेक्स 70.85 अंक यानी 0.09 प्रतिशत गिरकर 78,009.25 पर समाप्त हुआ। के मुताबिक, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और पश्चिम एशिया की परिस्थितियों ने निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता को प्रभावित किया।
कच्चे तेल की तेजी से बढ़ी चिंता
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयातित कच्चे तेल पर निर्भर है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने से देश के आयात खर्च, रुपये, महंगाई और राजकोषीय स्थिति पर दबाव पड़ने की आशंका रहती है।
सप्ताह के दौरान ब्रेंट कच्चा तेल लगभग 4.6 प्रतिशत बढ़कर 87 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव तथा तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका ने कीमतों को समर्थन दिया। कच्चे तेल में इस तेजी के कारण निवेशकों ने भारतीय बाजार में बड़े दांव लगाने से परहेज किया।
अमेरिकी आंकड़ों से मिली थी शुरुआती राहत
अमेरिकी श्रम बाजार और महंगाई से जुड़े संकेतों ने सप्ताह की शुरुआत में निवेशकों को कुछ राहत दी थी। इन आंकड़ों से उम्मीद बनी कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को लेकर नरम रुख अपना सकता है। ब्याज दरों में स्थिरता या संभावित नरमी आम तौर पर उभरते बाजारों के लिए सकारात्मक मानी जाती है।
हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने इस सकारात्मक धारणा को कमजोर कर दिया। निवेशकों का ध्यान अमेरिकी मौद्रिक नीति के बजाय ऊर्जा आपूर्ति तथा वैश्विक जोखिमों पर केंद्रित हो गया।
कॉरपोरेट नतीजों ने बाजार को दिया सहारा
वैश्विक चुनौतियों के बावजूद घरेलू स्तर पर कुछ सकारात्मक कारकों ने बाजार को बड़ी गिरावट से बचाया। कई प्रमुख कंपनियों के तिमाही नतीजे बाजार की उम्मीद से बेहतर रहे। इससे चुनिंदा शेयरों में खरीदारी बनी रही।
रुपये में तुलनात्मक स्थिरता, 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड की यील्ड में नरमी और विदेशी संस्थागत निवेशकों की भागीदारी में सुधार ने भी बाजार को सहारा दिया। मजबूत कॉरपोरेट आय से यह संकेत मिला कि वैश्विक अस्थिरता के बावजूद भारतीय कंपनियों की कमाई की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर बनी हुई है।
सेक्टरों का मिलाजुला प्रदर्शन
सप्ताह के दौरान मेटल और वित्तीय शेयरों में कमजोरी प्रमुख सूचकांकों पर भारी पड़ी। साप्ताहिक आधार पर मेटल सूचकांक करीब 1.9 प्रतिशत और वित्तीय क्षेत्र लगभग एक प्रतिशत कमजोर रहा। रिलायंस इंडस्ट्रीज और टाटा मोटर्स जैसे प्रमुख शेयरों की गिरावट ने भी बाजार पर दबाव बढ़ाया।
अंतिम कारोबारी सत्र में कंज्यूमर ड्यूरेबल्स क्षेत्र ने बेहतर प्रदर्शन किया और इसका सूचकांक करीब एक प्रतिशत बढ़ा। वहीं टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल्स, जियो फाइनेंशियल सर्विसेज और ओएनजीसी निफ्टी के प्रमुख कमजोर शेयरों में शामिल रहे। के अनुसार अंतिम सत्र में मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांक भी गिरावट के साथ बंद हुए।
इन वैश्विक संकेतों पर रहेगी नजर
आने वाले सप्ताह में निवेशकों का ध्यान कच्चे तेल की कीमतों, पश्चिम एशिया के घटनाक्रम, अमेरिकी खुदरा बिक्री के आंकड़ों और फेडरल ओपन मार्केट कमेटी की बैठक के विवरण पर रहेगा। चीन से आने वाले आर्थिक आंकड़े भी वैश्विक वृद्धि की दिशा के संकेत देंगे। इन सभी कारकों का असर विदेशी निवेश, रुपये और भारतीय शेयर बाजार की चाल पर दिखाई दे सकता है।
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