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SC का बड़ा आदेश वैध इंश्योरेंस नहीं तो नहीं मिलेगा पेट्रोल-डीजल
Ratna Netam
5 Aug 2026 7:54 PM IST

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नई दिल्ली : देश में बड़ी संख्या में वाहन बिना वैध थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस के सड़कों पर दौड़ रहे हैं, जिसे सड़क सुरक्षा और दुर्घटना पीड़ितों के मुआवजे के लिए गंभीर चुनौती माना जा रहा है। इस समस्या से निपटने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) और भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (IRDAI) को एक अहम पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने का निर्देश दिया है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत भविष्य में पेट्रोल पंपों पर ईंधन भरवाने से पहले वाहन के वैध थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस की जांच की जाएगी। यदि वाहन का बीमा वैध नहीं पाया गया, तो उसे ईंधन देने से इनकार किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग **30.48 करोड़ पंजीकृत वाहन** हैं, जिनमें से करीब **16.54 करोड़ वाहन** बिना वैध थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस के चल रहे हैं। यानी देश के लगभग **56 प्रतिशत वाहन** अनिवार्य बीमा नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं। अदालत ने इस स्थिति को बेहद गंभीर बताते हुए कहा कि सड़क दुर्घटनाओं में पीड़ितों और उनके परिजनों को समय पर मुआवजा दिलाने के लिए सभी वाहनों का बीमित होना आवश्यक है।
प्रस्तावित पायलट प्रोजेक्ट के तहत पेट्रोल पंपों पर वाहन का पंजीकरण और बीमा रिकॉर्ड डिजिटल माध्यम से जांचा जाएगा। यदि किसी वाहन का थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस समाप्त हो चुका होगा या उपलब्ध नहीं होगा, तो संबंधित वाहन मालिक को पहले बीमा का नवीनीकरण कराना होगा। इसके बाद ही उसे ईंधन उपलब्ध कराया जा सकेगा। इस पहल का उद्देश्य लोगों को बीमा नियमों का पालन करने के लिए प्रेरित करना और सड़क सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाना है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने इस प्रस्ताव पर सिद्धांततः कोई आपत्ति नहीं जताई है। अब संबंधित मंत्रालयों और एजेंसियों को मिलकर इस योजना की व्यवहारिक रूपरेखा तैयार करनी होगी। यदि पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है, तो इसे चरणबद्ध तरीके से पूरे देश में लागू किया जा सकता है।
अदालत ने IRDAI को मोटर बीमा नियमों में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव करने के निर्देश भी दिए हैं। नए आदेश के अनुसार अब नई कारों के लिए अनिवार्य थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस की न्यूनतम अवधि **तीन वर्ष से बढ़ाकर चार वर्ष** करने का सुझाव दिया गया है। वहीं नए दोपहिया वाहनों के लिए यह अवधि **पांच वर्ष से बढ़ाकर छह वर्ष** करने की बात कही गई है। अदालत का मानना है कि इससे लंबे समय तक वाहन बीमित रहेंगे और बीमा समाप्त होने की संभावना कम होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस पहल का उद्देश्य केवल नियमों का पालन करवाना नहीं, बल्कि सड़क दुर्घटनाओं के पीड़ितों को समय पर उचित मुआवजा उपलब्ध कराना भी है। कई मामलों में दुर्घटना के बाद यह सामने आता है कि दोषी वाहन का बीमा नहीं है, जिसके कारण पीड़ितों को वर्षों तक कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। नई व्यवस्था ऐसे मामलों को कम करने में मददगार साबित हो सकती है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार सड़क दुर्घटनाओं के लगभग **22 प्रतिशत मामले** ऐसे वाहनों से जुड़े हैं, जिनके पास वैध थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस नहीं होता। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सभी वाहन बीमित होंगे तो दुर्घटना पीड़ितों को आर्थिक सहायता जल्दी मिल सकेगी और बीमा कंपनियों के माध्यम से मुआवजा प्रक्रिया भी अधिक प्रभावी होगी।
यदि यह पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है, तो भारत में मोटर इंश्योरेंस नियमों के पालन की दिशा में यह एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम साबित हो सकता है। साथ ही इससे सड़क सुरक्षा, कानूनी जवाबदेही और दुर्घटना पीड़ितों के अधिकारों को भी मजबूत आधार मिलेगा।
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