
Business बिजनेस : अगर आपने भी बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) कराई है, तो यह खबर आपके लिए महत्वपूर्ण है। आमतौर पर FD को सुरक्षित निवेश माना जाता है, लेकिन कई बार बैंक और ग्राहक के बीच विवाद की स्थिति में मामला लंबा खिंच सकता है। ऐसा ही एक मामला केरल के त्रिशूर से सामने आया है, जहां एक ग्राहक को अपनी जमा रकम पाने के लिए लगभग 11 साल तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी।
यह मामला त्रिशूर निवासी सेतुमाधवन का है, जिन्होंने एक बैंक में 5 लाख रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट कराई थी। उनकी FD की मैच्योरिटी 2 जून 2015 को पूरी हो गई थी। मैच्योरिटी के बाद जब वह अपनी राशि निकालने बैंक पहुंचे, तो बैंक ने तकनीकी कारणों का हवाला देते हुए भुगतान करने से इनकार कर दिया।
ग्राहक ने कई बार बैंक से संपर्क कर अपनी राशि वापस लेने की कोशिश की, लेकिन उन्हें कोई समाधान नहीं मिला। लगातार प्रयासों के बावजूद पैसा न मिलने पर उन्होंने जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का रुख किया और न्याय की मांग की।मामले की सुनवाई के दौरान आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुना और सबूतों की जांच की। लंबे समय तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद आयोग ने बैंक की कार्यप्रणाली को अनुचित माना और ग्राहक के पक्ष में फैसला सुनाया।
आयोग ने अपने आदेश में बैंक को निर्देश दिया कि वह न केवल 5 लाख रुपये की मूल FD राशि लौटाए, बल्कि 12 प्रतिशत ब्याज भी अदा करे। इसके अलावा बैंक को ग्राहक को 10,000 रुपये का मुआवजा देने का भी आदेश दिया गया।कोर्ट के इस फैसले ने बैंकिंग सेवाओं में जवाबदेही और उपभोक्ता अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला इस बात को दर्शाता है कि बैंकिंग प्रणाली में पारदर्शिता और समय पर भुगतान कितना जरूरी है।
हालांकि FD को सबसे सुरक्षित निवेश विकल्प माना जाता है, लेकिन यह घटना दिखाती है कि दस्तावेजी प्रक्रिया और कानूनी अधिकारों की जानकारी होना भी उतना ही जरूरी है। अगर किसी ग्राहक के साथ इस तरह की समस्या आती है, तो उसे तुरंत उपभोक्ता फोरम या संबंधित प्राधिकरण में शिकायत दर्ज करानी चाहिए।इस फैसले के बाद उम्मीद की जा रही है कि बैंकिंग संस्थान भविष्य में ग्राहकों के साथ अधिक जिम्मेदारी और पारदर्शिता के साथ व्यवहार करेंगे।





