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Delhi दिल्ली। एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत संरचनात्मक सुधारों और नियमों को आसान बनाकर वर्ष 2035 तक अपने निर्यात को लगभग तीन गुना बढ़ाकर 1.3 ट्रिलियन डॉलर तक ले जाने की योजना बना रहा है। इसके लिए सरकार भारी सरकारी खर्च पर निर्भर रहने के बजाय मैन्युफैक्चरिंग आधारित विकास पर जोर दे रही है।
यह रणनीति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भारत को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने का तीसरा बड़ा प्रयास मानी जा रही है, ताकि देश दुनिया के व्यापार में अहम भूमिका निभा सके। रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने 15 प्राथमिक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर चुने हैं। इनमें हाई-एंड सेमीकंडक्टर, धातु, इलेक्ट्रॉनिक्स और लेदर जैसे श्रम आधारित उद्योग शामिल हैं।
सरकारी अधिकारियों का मानना है कि नियमों को सरल बनाने, कागजी काम कम करने और व्यापार का माहौल बेहतर करने से कंपनियां ज्यादा उत्पादन कर पाएंगी, निवेश आएगा और भारतीय उत्पाद वैश्विक बाजार में बेहतर तरीके से मुकाबला कर सकेंगे। यह नया प्रयास ऐसे समय में किया जा रहा है जब दुनिया में अनिश्चितता बढ़ी हुई है, लेकिन इसके बावजूद भारत को एक स्थिर ग्रोथ इंजन के रूप में देखा जा रहा है।
दुनियाभर में सप्लाई चेन पर दबाव और भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत खुद को एक भरोसेमंद वैकल्पिक मैन्युफैक्चरिंग देश के तौर पर पेश कर रहा है। हालिया आंकड़े बताते हैं कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर सरकार की नीतियों और सुधारों का सकारात्मक असर दिखने लगा है।
फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (एफआईसीसी) यानी फिक्की के ताजा सर्वे के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही में भारत के मैन्युफैक्चरिंग प्रदर्शन ने अब तक का सबसे ऊंचा स्तर छू लिया है और उद्योगों का भरोसा और मजबूत हुआ है।
फिक्की की तिमाही मैन्युफैक्चरिंग सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, 91 प्रतिशत कंपनियों ने बताया कि उनकी उत्पादन स्थिति बेहतर या स्थिर रही, जो पिछली तिमाही में 87 प्रतिशत थी। उद्योगों का भरोसा भी बढ़ा है। 86 प्रतिशत कंपनियों को उम्मीद है कि उनके ऑर्डर पहले जैसे या उससे बेहतर रहेंगे। इसमें हाल ही में जीएसटी दरों में कटौती का भी योगदान रहा है।
इस सर्वे में शामिल मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों का सालाना कारोबार 3 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा है। रिपोर्ट में बताया गया कि कंपनियों की वित्तीय स्थिति सहायक बनी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए औसत ब्याज दर 8.9 प्रतिशत रही। वहीं, करीब 87 प्रतिशत कंपनियों ने कहा कि उन्हें कामकाज और लंबे समय की जरूरतों के लिए बैंकों से पर्याप्त फंडिंग मिल रही है।
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