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ट्रंप की टैरिफ नीति से निवेशकों में चिंता, शेयर बाजार में गिरावट
बुधवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अमेरिका में आयात की जाने वाली जेनेरिक दवाओं पर चरणबद्ध टैरिफ योजना की घोषणा के बाद भारतीय फार्मास्युटिकल शेयरों में भारी बिकवाली का दबाव देखा गया।
इस घोषणा से भारतीय दवा निर्माताओं पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंताएं बढ़ गईं, क्योंकि वे अमेरिकी बाजार में सस्ती जेनेरिक दवाओं के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ताओं में से हैं।
सुबह 10:40 बजे (IST) तक निफ्टी फार्मा इंडेक्स 1.51% गिरकर 25,699.45 पर आ गया। सन फार्मा, सिप्ला और डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज जैसी प्रमुख फार्मास्युटिकल कंपनियों के शेयरों में गिरावट देखी गई, क्योंकि निवेशकों को ऊंचे आयात शुल्क के दीर्घकालिक असर की चिंता थी।
निफ्टी 50 इंडेक्स में सिप्ला और डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज सबसे ज्यादा नुकसान उठाने वाली कंपनियों में शामिल रहीं, जिनमें क्रमशः 1.8% और 1.6% की गिरावट आई। सन फार्मा पर भी दबाव बना रहा और इसमें 0.9% की गिरावट दर्ज की गई।
फार्मास्युटिकल सेक्टर में व्यापक स्तर पर बिकवाली हुई। ल्यूपिन के शेयरों में लगभग 4% की गिरावट आई, जबकि पिरामल फार्मा, अरबिंदो फार्मा और ग्लैंड फार्मा में प्रत्येक में 3% से अधिक की गिरावट देखी गई।
अजंता फार्मा, ग्लेनमार्क फार्मा, आईपीसीए लैबोरेटरीज, जाइडस लाइफसाइंसेज, एल्केम लैबोरेटरीज और मैनकाइंड फार्मा जैसी अन्य कंपनियों के शेयरों में भी गिरावट दर्ज की गई।
ट्रंप ने घोषणा की कि अमेरिका में आयात की जाने वाली जेनेरिक दवाओं पर 1 अगस्त, 2026 से दो साल तक शून्य टैरिफ लागू रहेगा।
इस अवधि के बाद, 1 अगस्त, 2028 से टैरिफ बढ़कर 100% हो जाएगा और एक साल बाद यह बढ़कर 200% हो जाएगा।
ट्रंप के अनुसार, इस टैरिफ नीति का उद्देश्य फार्मास्युटिकल कंपनियों को अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स (निर्माण इकाइयां) स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करना है।
उन्होंने कहा कि जो कंपनियां तय समय सीमा के भीतर अपना उत्पादन वहां स्थानांतरित करने में विफल रहेंगी, उन्हें अधिक लागत का सामना करना पड़ेगा, जबकि पेटेंटेड, ब्रांडेड और इनोवेटिव दवाओं के लिए नियम अपरिवर्तित रहेंगे।
इस कदम ने भारतीय फार्मास्युटिकल कंपनियों को जांच के दायरे में ला दिया है क्योंकि अमेरिकी जेनेरिक बाजार में उनकी मजबूत उपस्थिति है। सन फार्मा, सिप्ला, डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज, ल्यूपिन, अरबिंदो फार्मा और जाइडस लाइफसाइंसेज जैसी कंपनियां अमेरिकी बाजार में निर्यात पर काफी हद तक निर्भर हैं।
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