
सिंगापुर : वैश्विक बाजार में एक बार फिर भू-राजनीतिक तनाव का असर दिखाई देने लगा है। सोमवार को कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बाद निवेशकों की चिंता बढ़ी और तेल की कीमतों में 2 प्रतिशत से ज्यादा का उछाल आया।
ब्रेंट क्रूड की कीमत एक बार फिर 90 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया में किसी भी तरह का सैन्य तनाव तेल आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है, जिससे कीमतों में तेजी आती है।
अमेरिका के हमले के बाद बढ़ी चिंता
तेल बाजार में तेजी की बड़ी वजह रविवार को अमेरिकी सेना की ओर से की गई कार्रवाई को माना जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी सेना ने होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान के लराक द्वीप पर मौजूद दो ईरानी लॉन्चरों को निशाना बनाया।
यह जुलाई के आखिर के बाद से खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका का पहला ज्ञात हमला बताया जा रहा है। इस घटना के बाद बाजार में आशंका बढ़ गई कि अगर तनाव और बढ़ा तो वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर पड़ सकता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है। यहां किसी भी तरह की अस्थिरता का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों पर पड़ता है।
ब्रेंट क्रूड 90 डॉलर के पार
तेल बाजार के आंकड़ों के अनुसार, 2202 GMT तक ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स में 2.22 डॉलर यानी 2.52 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई। इसके साथ ही ब्रेंट क्रूड की कीमत 90.32 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई।
वहीं, अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड में भी तेजी देखी गई। WTI क्रूड 2.01 डॉलर यानी 2.41 प्रतिशत बढ़कर 85.41 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया।
यह तेजी दर्शाती है कि निवेशक पश्चिम एशिया की स्थिति को लेकर सतर्क हो गए हैं और संभावित आपूर्ति जोखिम को ध्यान में रखते हुए बाजार में प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
तेल आपूर्ति को लेकर बढ़ी चिंता
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का सबसे बड़ा कारण आपूर्ति को लेकर चिंता होती है। पश्चिम एशिया दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है।
अगर इस क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ता है या तेल परिवहन मार्ग प्रभावित होते हैं तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की उपलब्धता पर असर पड़ सकता है।
यही वजह है कि किसी भी सैन्य गतिविधि या राजनीतिक तनाव की खबर के बाद तेल बाजार तुरंत प्रतिक्रिया देता है।
भारत पर भी पड़ सकता है असर
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
तेल महंगा होने से पेट्रोल-डीजल की कीमतों, परिवहन लागत और कई उद्योगों के खर्च पर दबाव बढ़ सकता है। इसका असर महंगाई पर भी पड़ने की आशंका रहती है।
हालांकि, घरेलू ईंधन कीमतों पर अंतिम प्रभाव कई अन्य कारकों जैसे मुद्रा विनिमय दर और सरकार की नीतियों पर भी निर्भर करता है।
बाजार में बढ़ी सतर्कता
तेल कीमतों में अचानक आई तेजी के बाद वैश्विक वित्तीय बाजारों में भी सतर्कता का माहौल देखा जा रहा है। निवेशक अब अमेरिका-ईरान संबंधों और पश्चिम एशिया की स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर तनाव सीमित रहता है तो तेल कीमतों में स्थिरता आ सकती है, लेकिन स्थिति बिगड़ने पर कीमतों में और उछाल संभव है।
आगे की दिशा पर नजर
कच्चे तेल की कीमतों की दिशा अब पश्चिम एशिया में होने वाले घटनाक्रमों पर निर्भर करेगी। बाजार की नजर इस बात पर है कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव आगे किस स्तर तक पहुंचता है।
फिलहाल, ब्रेंट क्रूड का 90 डॉलर प्रति बैरल के पार जाना वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। आने वाले दिनों में तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना है, क्योंकि निवेशक भू-राजनीतिक जोखिमों को ध्यान में रखकर फैसले ले रहे हैं।





