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2026 में अब तक FPI की भारी निकासी, घरेलू निवेशकों ने बाजार को संभाला

Kavita2
25 May 2026 12:04 PM IST
2026 में अब तक FPI की भारी निकासी, घरेलू निवेशकों ने बाजार को संभाला
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Business बिजनेस: विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने जनवरी से मई 2026 की शुरुआत तक भारतीय इक्विटी बाजारों से लगभग 2.1 लाख करोड़ रुपये की बड़ी निकासी की है। एनएसडीएल (NSDL) के आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट्स के अनुसार, यह विदेशी निवेश प्रवाह में अब तक की सबसे तेज साल-दर-तारीख (YTD) निकासी मानी जा रही है, खासकर 1993 के बाद जब भारत में एफपीआई निवेश की अनुमति दी गई थी।

इस भारी बिकवाली के बावजूद घरेलू बाजार में स्थिति पूरी तरह दबाव में नहीं आई है। घरेलू म्यूचुअल फंड्स के जरिए निवेश लगातार मजबूत बना हुआ है। एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया (AMFI) के डेटा के अनुसार, हाल के महीनों में सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) योगदान 31,000 करोड़ रुपये प्रति माह से भी ऊपर पहुंच गया है, जो रिटेल निवेशकों की मजबूत भागीदारी को दर्शाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति बाजार में एक महत्वपूर्ण बदलाव की ओर इशारा करती है, जहां घरेलू निवेशक अब बाजार की अस्थिरता को काफी हद तक संतुलित कर रहे हैं। दूसरी ओर, विदेशी निवेश प्रवाह अभी भी बाजार की वैल्यूएशन, लिक्विडिटी और समग्र सेंटिमेंट पर बड़ा प्रभाव डाल रहा है।

मार्केट एक्सपर्ट्स के अनुसार, एफपीआई की लगातार निकासी के बावजूद भारतीय बाजार में गिरावट उतनी तेज नहीं हुई जितनी अपेक्षित थी, क्योंकि घरेलू म्यूचुअल फंड और रिटेल निवेशक लगातार खरीदारी कर रहे हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत का निवेश ढांचा धीरे-धीरे अधिक “डोमेस्टिक ड्रिवन” होता जा रहा है।

हालांकि, एक महत्वपूर्ण सवाल अभी भी बना हुआ है कि क्या घरेलू निवेशक लंबे समय तक विदेशी निवेश की अनुपस्थिति में बाजार को संभाल पाएंगे। विदेशी पूंजी आमतौर पर बड़ी लिक्विडिटी और वैश्विक भरोसे का संकेत मानी जाती है, और उसकी कमी से बाजार की गति और मूल्यांकन पर असर पड़ सकता है।

विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में बाजार का रुझान इस बात पर निर्भर करेगा कि एफपीआई का रुख कब स्थिर होता है और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां किस दिशा में जाती हैं। साथ ही, घरेलू निवेशकों की निरंतर भागीदारी बाजार को स्थिर बनाए रखने में अहम भूमिका निभाएगी।

कुल मिलाकर, भारतीय बाजार इस समय एक ऐसे चरण में है जहां घरेलू निवेशक मजबूत सहारा बनकर उभरे हैं, लेकिन विदेशी निवेश की भूमिका अभी भी निर्णायक बनी हुई है।

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