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हरित विकास से भारत को बढ़त, क्या बनेगा एशिया का क्लाइमेट लीडर?

nidhi
26 Jun 2026 11:45 AM IST
हरित विकास से भारत को बढ़त, क्या बनेगा एशिया का क्लाइमेट लीडर?
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भारत का ग्रीन सेक्टर मजबूत, जलवायु बदलाव की लड़ाई में बढ़ी उम्मीदें
LSEG की 'इन्वेस्टिंग इन द ग्रीन इकॉनमी 2026' रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में भारत ने $100 बिलियन का ग्रीन रेवेन्यू दर्ज किया, जिससे यह दक्षिण एशियाई देश एशिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक बन गया है।
ग्रीन रेवेन्यू क्या है?
रिपोर्ट में ग्रीन रेवेन्यू को उन उत्पादों और सेवाओं से होने वाली कमाई के तौर पर परिभाषित किया गया है जो ग्रीन इकॉनमी में योगदान देती हैं और जिन्हें लिस्टेड कंपनियाँ बनाती हैं। LSEG ने कहा कि उसका ग्रीन रेवेन्यू डेटा अप्रैल 2026 तक का है, जबकि रेवेन्यू डेटा दिसंबर 2025 तक का है।
भारत में दर्ज राष्ट्रीय ग्रीन रेवेन्यू में 20% की पाँच-वर्षीय कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़ोतरी हुई, जो एशिया की कुल 12% ग्रीन रेवेन्यू ग्रोथ और इसी अवधि में ग्लोबल मार्केट से जुड़ी 10% CAGR से ज़्यादा है।
हालाँकि, रिपोर्ट के अनुसार, चीन और जापान की तुलना में भारत अभी भी एक छोटी ग्रीन इकॉनमी बना हुआ है।
फिलहाल, एशिया के ग्रीन रेवेन्यू में भारत की हिस्सेदारी 87% (बायोगैस एनर्जी में) है, और ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर, खेती, वेस्ट-टू-एनर्जी और डिसेंट्रलाइज़्ड एनर्जी सिस्टम से जुड़े ग्रीन इकॉनमी सेक्टर में 75% है।
इस बीच, एशिया दुनिया का सबसे बड़ा ग्रीन-रेवेन्यू वाला क्षेत्र बन गया है। 2025 में ग्लोबल ग्रीन रेवेन्यू में एशियाई कंपनियों की हिस्सेदारी 47% रही, जिसमें चीन और जापान लीडर के तौर पर उभरे।
एशियाई क्षेत्र का योगदान एनर्जी इक्विपमेंट, ट्रांसपोर्ट इक्विपमेंट, वेस्ट और पॉल्यूशन कंट्रोल, इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) बैटरी और रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे सेक्टर के लिए बहुत अहम है।
खास बात यह है कि भारत ने क्लीन-एनर्जी इन्वेस्टमेंट में $100 बिलियन लगाए, जो उसके पावर-सेक्टर के कैपिटल एलोकेशन का 83% है। वहीं, चीन ने रिन्यूएबल्स, एनर्जी स्टोरेज, न्यूक्लियर और एनर्जी एफिशिएंसी में $625 बिलियन का निवेश किया।
दूसरी ओर, रिपोर्ट में क्लीन-एनर्जी ग्रोथ और एनर्जी सिक्योरिटी के बीच संतुलन बनाने की मुख्य चुनौती का भी ज़िक्र किया गया है। साथ ही, एशिया अभी भी इम्पोर्टेड फॉसिल फ्यूल (खासकर मिडिल ईस्ट से) पर बहुत ज़्यादा निर्भर है, क्योंकि यह ग्लोबल कोयले की मांग को बढ़ा रहा है, जिसमें चीन सबसे आगे है, और उसके बाद भारत और साउथ-ईस्ट एशिया का नंबर आता है।
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