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नई दिल्ली। आने वाले महीनों में बिजली की मांग बढ़ने की संभावना को देखते हुए केंद्र सरकार ने बिजली उत्पादन बढ़ाने के लिए बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने 50 मेगावाट और उससे अधिक क्षमता वाले कैप्टिव कोयला आधारित बिजली उत्पादन केंद्रों को अपनी अधिकतम उपलब्ध क्षमता पर काम करने का निर्देश दिया है। यह व्यवस्था 1 अक्टूबर से 31 दिसंबर 2026 तक लागू रहेगी। सरकार का उद्देश्य इस अवधि में बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखना और उपभोक्ताओं को पर्याप्त बिजली उपलब्ध कराना है।बिजली मंत्रालय की ओर से जारी आदेश के साथ उन कैप्टिव बिजली उत्पादन इकाइयों की सूची भी जारी की गई है, जिन्हें इन निर्देशों का पालन करना होगा। इस सूची में कुल 112 कैप्टिव बिजली उत्पादन इकाइयां शामिल हैं। इन सभी इकाइयों को निर्धारित अवधि के दौरान अपनी अधिकतम उपलब्ध क्षमता के अनुसार बिजली उत्पादन करने के लिए कहा गया है।
सरकार ने ये निर्देश बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 11 के तहत जारी किए हैं। इस प्रावधान के तहत विशेष परिस्थितियों में सरकार बिजली उत्पादन करने वाली कंपनियों को उत्पादन और संचालन से संबंधित निर्देश जारी कर सकती है। मौजूदा समय में सरकार आने वाले महीनों में बिजली की मांग बढ़ने की संभावना को देखते हुए उत्पादन क्षमता की अधिकतम उपलब्धता सुनिश्चित करना चाहती है।बिजली मंत्रालय ने अपने आदेश में कहा है कि मांग और आपूर्ति की मौजूदा स्थिति तथा आने वाले महीनों में बिजली की मांग में संभावित बढ़ोतरी को ध्यान में रखते हुए उपभोक्ताओं को पर्याप्त बिजली उपलब्ध कराने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं। इसी क्रम में 50 मेगावाट और उससे अधिक क्षमता वाले कैप्टिव कोयला आधारित बिजली उत्पादन केंद्रों को अधिकतम उपलब्ध क्षमता पर संचालन का निर्देश दिया गया है।
कैप्टिव पावर प्लांट आमतौर पर किसी उद्योग या कंपनी की अपनी बिजली जरूरतों को पूरा करने के लिए स्थापित किए जाते हैं। बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठानों में उत्पादन गतिविधियों को लगातार जारी रखने के लिए बिजली की नियमित उपलब्धता जरूरी होती है। ऐसे में इन इकाइयों की उत्पादन क्षमता का अधिकतम उपयोग होने से बिजली की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है।सरकार का यह आदेश ऐसे समय में आया है जब अक्टूबर से दिसंबर के बीच बिजली की मांग में संभावित बढ़ोतरी का अनुमान लगाया गया है। मंत्रालय की कोशिश है कि मांग बढ़ने की स्थिति में बिजली की उपलब्धता प्रभावित न हो। इसके लिए उपलब्ध उत्पादन संसाधनों का अधिकतम उपयोग करने पर जोर दिया जा रहा है।आदेश के मुताबिक 50 मेगावाट से कम क्षमता वाली इकाइयां इन निर्देशों के दायरे में नहीं हैं। सरकार ने फिलहाल 50 मेगावाट और उससे अधिक क्षमता वाले कोयला आधारित कैप्टिव बिजली उत्पादन केंद्रों को ही इसमें शामिल किया है। मंत्रालय की ओर से जारी सूची में शामिल 112 इकाइयों को 1 अक्टूबर से 31 दिसंबर तक निर्देशों के अनुसार संचालन करना होगा।
बिजली की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए उत्पादन क्षमता का उपलब्ध रहना बेहद महत्वपूर्ण है। यदि बिजली की मांग तेजी से बढ़ती है और उसी अनुपात में उत्पादन उपलब्ध नहीं होता है तो मांग और आपूर्ति के बीच अंतर बढ़ सकता है। इसी स्थिति से बचने के लिए सरकार पहले से तैयारी कर रही है। कैप्टिव कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को पूरी उपलब्ध क्षमता से चलाने का निर्देश इसी तैयारी का हिस्सा है।मंत्रालय का मुख्य जोर इस बात पर है कि बिजली उत्पादन की जितनी क्षमता उपलब्ध है, उसका अधिकतम इस्तेमाल किया जाए। इससे मांग बढ़ने के दौरान बिजली की उपलब्धता बनाए रखने में सहायता मिल सकती है। साथ ही बिजली आपूर्ति व्यवस्था पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव को संभालने में भी मदद मिलने की उम्मीद है।
सरकार ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि यह व्यवस्था सीमित अवधि के लिए लागू की गई है। निर्देश 1 अक्टूबर 2026 से प्रभावी होंगे और 31 दिसंबर 2026 तक जारी रहेंगे। इस तरह तीन महीने की अवधि में संबंधित कैप्टिव कोयला आधारित बिजली उत्पादन इकाइयों को अपनी अधिकतम उपलब्ध क्षमता पर काम करना होगा।बिजली मंत्रालय बिजली की मांग और आपूर्ति की स्थिति को ध्यान में रखते हुए पर्याप्त बिजली उपलब्ध कराने के लिए लगातार कदम उठा रहा है। 112 कैप्टिव बिजली उत्पादन इकाइयों को अधिकतम क्षमता से संचालन का निर्देश इसी दिशा में उठाया गया कदम है। सरकार की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि आने वाले महीनों में मांग बढ़ने के बावजूद उपभोक्ताओं के लिए बिजली की पर्याप्त उपलब्धता बनी रहे और उपलब्ध उत्पादन क्षमता का पूरा उपयोग किया जा सके।
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