
x
नई दिल्ली। देश में प्राकृतिक गैस की कीमतों और उसकी आपूर्ति व्यवस्था को लेकर सरकार के फैसले का असर कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर पड़ सकता है। प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल केवल घरों में पाइप्ड नेचुरल गैस यानी PNG और वाहनों में कंप्रेस्ड नेचुरल गैस यानी CNG के रूप में ही नहीं होता, बल्कि फर्टिलाइजर यानी उर्वरक उद्योग भी इसका बड़ा उपभोक्ता है। ऐसे में गैस की कीमत या आवंटन व्यवस्था में होने वाला कोई भी बदलाव आम उपभोक्ताओं से लेकर उद्योगों तक के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।
प्राकृतिक गैस की कीमत को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि देश में अलग-अलग स्रोतों से गैस की आपूर्ति होती है। घरेलू स्तर पर उत्पादित गैस के अलावा जरूरत पूरी करने के लिए आयातित LNG का भी इस्तेमाल किया जाता है। इनकी लागत अलग-अलग हो सकती है। यही वजह है कि किस क्षेत्र को कितनी और किस कीमत वाली गैस उपलब्ध होती है, इसका सीधा संबंध अंतिम उपभोक्ता की लागत से जुड़ जाता है।
सरकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में फर्टिलाइजर सेक्टर शामिल है। देश में यूरिया जैसे उर्वरकों के उत्पादन में प्राकृतिक गैस एक प्रमुख कच्चा माल है। गैस की लागत में बदलाव से उर्वरक कंपनियों की उत्पादन लागत प्रभावित हो सकती है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि गैस महंगी होते ही किसानों के लिए यूरिया की खुदरा कीमत भी तुरंत उसी अनुपात में बढ़ जाएगी। उर्वरक क्षेत्र में सरकार की सब्सिडी व्यवस्था महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
यदि फर्टिलाइजर कंपनियों को अपेक्षाकृत सस्ती गैस की उपलब्धता बढ़ती है तो उनकी उत्पादन लागत को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। इससे सरकारी सब्सिडी के बोझ पर भी असर पड़ सकता है। दूसरी तरफ महंगी गैस पर निर्भरता बढ़ने से उर्वरक उत्पादन की लागत बढ़ सकती है। इसलिए प्राकृतिक गैस से जुड़े फैसले कृषि क्षेत्र के लिए भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
अब बात CNG की करें तो इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से वाहनों में किया जाता है। दिल्ली-NCR सहित देश के कई बड़े शहरों में ऑटो, टैक्सी, निजी कारों और सार्वजनिक परिवहन के वाहनों में CNG का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर होता है। CNG की खुदरा कीमत पर गैस की खरीद लागत का महत्वपूर्ण प्रभाव होता है।
अगर सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों को घरेलू स्तर पर उत्पादित अपेक्षाकृत कम लागत वाली गैस पर्याप्त मात्रा में मिलती है तो CNG की कीमतों पर दबाव कम रखने में मदद मिल सकती है। लेकिन यदि कंपनियों को मांग पूरी करने के लिए अधिक महंगी गैस खरीदनी पड़ती है तो लागत बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में कंपनियां अपनी लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों तक पहुंचाने का फैसला कर सकती हैं।
हालांकि CNG की कीमत में बदलाव केवल एक कारण से तय नहीं होता। गैस की खरीद लागत के अलावा टैक्स, परिवहन, वितरण खर्च और कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति जैसे कई कारक अंतिम कीमत को प्रभावित करते हैं। इसलिए सरकार के किसी फैसले के बाद CNG तत्काल सस्ती या महंगी होगी, ऐसा निश्चित रूप से कहना सही नहीं होगा।
PNG यानी पाइप्ड नेचुरल गैस पर भी इसी तरह का असर देखने को मिल सकता है। देश के कई शहरों में घरों की रसोई तक पाइपलाइन के जरिए प्राकृतिक गैस पहुंचाई जाती है। घरेलू PNG को LPG सिलेंडर के विकल्प के रूप में भी देखा जाता है। गैस की इनपुट लागत कम रहने पर सिटी गैस कंपनियों को PNG की कीमत नियंत्रित रखने में मदद मिलती है।
इसके विपरीत, महंगी गैस की हिस्सेदारी बढ़ने से PNG की लागत पर दबाव आ सकता है। इसका असर घरेलू उपभोक्ताओं के मासिक गैस बिल पर पड़ सकता है। हालांकि वास्तविक कीमत में बदलाव संबंधित सिटी गैस कंपनी के फैसले और उसके गैस पोर्टफोलियो पर निर्भर करेगा।
सरकार के सामने यहां एक संतुलन बनाने की चुनौती रहती है। एक तरफ घरेलू उपभोक्ताओं और परिवहन क्षेत्र को उचित कीमत पर गैस उपलब्ध कराना जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ फर्टिलाइजर जैसे रणनीतिक क्षेत्र की जरूरतों को भी पूरा करना होता है। इसके अलावा बिजली उत्पादन, पेट्रोकेमिकल, रिफाइनरी और दूसरे उद्योगों में भी प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल होता है।
प्राकृतिक गैस को अपेक्षाकृत स्वच्छ जीवाश्म ईंधन के रूप में देखा जाता है। पेट्रोल और डीजल की तुलना में CNG के इस्तेमाल से कई प्रदूषकों का उत्सर्जन कम हो सकता है। इसी वजह से बड़े शहरों में सार्वजनिक परिवहन को CNG की ओर ले जाने पर लंबे समय से जोर दिया जाता रहा है। यदि गैस की कीमत बहुत अधिक बढ़ती है तो पेट्रोल-डीजल के मुकाबले CNG से मिलने वाला आर्थिक फायदा कम हो सकता है।
इसके विपरीत यदि CNG की कीमतों को स्थिर या प्रतिस्पर्धी रखने में मदद मिलती है तो वाहन चालकों के लिए इसका आकर्षण बना रह सकता है। खासकर टैक्सी और ऑटो जैसे व्यावसायिक वाहन चालकों के लिए ईंधन की कीमत रोजाना की कमाई और परिचालन खर्च से सीधे जुड़ी होती है।
PNG के मामले में भी कीमत अहम है। पाइपलाइन नेटवर्क का विस्तार होने के साथ अधिक परिवार इस ईंधन से जुड़ रहे हैं। यदि इसकी कीमत प्रतिस्पर्धी रहती है तो नए उपभोक्ताओं को PNG से जोड़ने में मदद मिल सकती है।
फर्टिलाइजर सेक्टर के लिए गैस की उपलब्धता कृषि अर्थव्यवस्था से जुड़ा विषय है। देश में खाद की मांग को देखते हुए घरेलू उत्पादन को बनाए रखना महत्वपूर्ण है। गैस की लागत नियंत्रित होने से उर्वरक उत्पादन की आर्थिक स्थिति बेहतर हो सकती है और आयात पर निर्भरता कम करने के प्रयासों को भी समर्थन मिल सकता है।
कुल मिलाकर प्राकृतिक गैस को लेकर सरकार का कोई भी बड़ा फैसला कई स्तरों पर असर डालता है। फर्टिलाइजर कंपनियों के लिए यह उत्पादन लागत और सब्सिडी से जुड़ा मामला है, जबकि CNG और PNG उपभोक्ताओं के लिए इसका संबंध सीधे ईंधन और घरेलू खर्च से है। अंतिम कीमतों पर वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि गैस की उपलब्धता, खरीद लागत और वितरण कंपनियों की लागत में कितना बदलाव आता है।
उपभोक्ताओं के लिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी नीतिगत फैसले को सीधे CNG या PNG की कीमत घटने-बढ़ने से जोड़ने के बजाय संबंधित गैस कंपनियों की आधिकारिक मूल्य घोषणा का इंतजार किया जाए। वहीं फर्टिलाइजर क्षेत्र में असर का आकलन गैस की वास्तविक लागत और सरकारी सब्सिडी व्यवस्था के आधार पर होगा।
Next Story





