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नई दिल्ली: भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने के बीच, चीन ने एक सुरक्षित निवेश के रूप में सोने की खरीदारी बढ़ा दी है। खबरों के अनुसार, पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना (PBOC) ने सितंबर 2026 में 23 टन सोना खरीदा। यह पिछले लगभग तीन वर्षों में उसकी सबसे बड़ी मासिक खरीदारी है, और इसके साथ ही लगातार 23 महीनों से उसकी सोने की खरीदारी का सिलसिला जारी है। 'नाइल पोस्ट' के एक लेख के अनुसार, अब चीन के पास लगभग 2,410 टन सोना जमा हो गया है।
लेख में बताया गया है कि 2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद, पश्चिमी देशों की सरकारों द्वारा रूस के विदेशी मुद्रा भंडार को फ्रीज (जब्त) किए जाने से चीन ने सबक लिया है। इस घटना से पता चला कि विदेशों में रखी डॉलर और यूरो-मूल्य वाली संपत्तियां प्रतिबंधों की चपेट में आ सकती हैं। इसके विपरीत, देश के भीतर रखा गया सोना किसी विदेशी जारीकर्ता (issuer) की देनदारी के दायरे में नहीं आता और इस पर ऐसे प्रतिबंधों का सीधा असर पड़ने की संभावना कम होती है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि चीन डॉलर का पूरी तरह से त्याग करने की तैयारी कर रहा है। लेख के अनुसार, बीजिंग का इरादा उस वित्तीय प्रणाली पर अपनी निर्भरता कम करने का है, जिसमें वाशिंगटन और उसके सहयोगियों का काफी प्रभाव है।
लेख में यह भी बताया गया है कि यह रुझान केवल चीन तक सीमित नहीं है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) के आंकड़ों के अनुसार, जुलाई में केंद्रीय बैंकों ने 23 टन सोना खरीदा था, और अगस्त में यह खरीदारी लगभग 39 टन रही। भविष्य में एक अधिक बहुध्रुवीय (multipolar) मौद्रिक प्रणाली की उम्मीदों के बीच, रिजर्व मैनेजर सोने को अपने निवेश में विविधता लाने (diversification) के एक साधन के रूप में देख रहे हैं।
लेख में आगे कहा गया है कि चीन में सोने की घरेलू मांग एक और महत्वपूर्ण पहलू है। प्रॉपर्टी मार्केट को लेकर चिंताएं और वित्तीय संपत्तियों में उतार-चढ़ाव के कारण, आम लोग और निवेशक अब संपत्ति को सुरक्षित रखने के लिए अन्य विकल्पों की तलाश कर रहे हैं। हांगकांग के जरिए अपने स्वर्ण-व्यापार ढांचे को मजबूत करने के बीजिंग के प्रयास, अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण बाजारों में देश की भूमिका बढ़ाने की उसकी महत्वाकांक्षा को भी दर्शाते हैं।
हालांकि, लेख में यह भी स्पष्ट किया गया है कि एक रिजर्व संपत्ति के रूप में सोने की अपनी सीमाएं हैं। इससे कोई ब्याज नहीं मिलता, इसकी कीमतों में भारी गिरावट आ सकती है, और यह डॉलर की तरलता (liquidity) या अमेरिकी ट्रेजरी बाजारों की गहराई की बराबरी नहीं कर सकता। डॉलर के मजबूत होने या वास्तविक ब्याज दरों में वृद्धि होने पर सोने की कीमतें गिर सकती हैं, इसलिए सोने पर अत्यधिक निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है।
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