
Business बिजनेस: पिछले 52 हफ्तों में भारतीय सरकारी बॉन्ड (G-Sec) के 10-वर्षीय बेंचमार्क की यील्ड में तेज़ बढ़ोतरी देखने को मिली है। यह यील्ड लगभग 6.13% से बढ़कर 7.12% तक पहुंच गई, जबकि 30 अप्रैल 2026 तक यह करीब 7.02% पर ट्रेड कर रही थी। यह वृद्धि तब देखने को मिली जब भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने नीतिगत ब्याज दरों में कोई बढ़ोतरी नहीं की थी।
आर्थिक जानकारों के अनुसार, बॉन्ड यील्ड का बढ़ना केवल ब्याज दरों पर निर्भर नहीं करता, बल्कि बाजार भविष्य की आर्थिक स्थितियों को ध्यान में रखकर कीमत तय करता है। यही कारण है कि मौजूदा नीतिगत स्थिरता के बावजूद यील्ड में तेजी बनी हुई है।
इस बढ़ोतरी के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण बताए जा रहे हैं। पहला कारण है सरकार का भारी उधार (फिस्कल स्ट्रेस)। सरकार द्वारा अधिक उधारी लेने से बॉन्ड की सप्लाई बढ़ जाती है, जिससे बाजार में दबाव बनता है और यील्ड ऊपर जाती है।
दूसरा कारण वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव है, जिसके चलते कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है। तेल की कीमत बढ़ने से भारत में महंगाई बढ़ने और चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बिगड़ने की आशंका बढ़ जाती है। इससे निवेशक बॉन्ड में अधिक रिटर्न की मांग करते हैं, जिससे यील्ड में वृद्धि होती है।
तीसरा प्रमुख कारण भारतीय रुपये का अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर होना है। रुपये की कमजोरी से आयात महंगा हो जाता है, जिससे घरेलू महंगाई पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इस “इंपोर्टेड इन्फ्लेशन” के डर के कारण भी बॉन्ड बाजार में अस्थिरता बढ़ती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बॉन्ड मार्केट हमेशा भविष्य की आर्थिक स्थिति को पहले से डिस्काउंट कर देता है। इसलिए, भले ही RBI ने ब्याज दरें नहीं बढ़ाई हों, लेकिन बाजार भविष्य में महंगाई और वित्तीय दबाव की संभावना को देखते हुए यील्ड बढ़ा रहा है।
इस स्थिति का असर बैंकिंग सिस्टम, निवेश प्रवाह और सरकारी उधारी लागत पर भी पड़ सकता है। यदि यील्ड लंबे समय तक ऊंची रहती है, तो सरकार के लिए उधारी महंगी हो सकती है और निजी निवेश पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
फिलहाल बाजार में अस्थिरता बनी हुई है और निवेशक वैश्विक आर्थिक संकेतों तथा घरेलू वित्तीय स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए हैं।





