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OMCs को सितंबर तिमाही में राहतफ्यूल मार्केटिंग घाटा घटा

Ratna Netam
7 Oct 2026 3:58 PM IST
OMCs को सितंबर तिमाही में राहतफ्यूल मार्केटिंग घाटा घटा
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नई दिल्ली। देश की सरकारी तेल विपणन कंपनियों यानी OMCs के लिए सितंबर तिमाही में राहत के संकेत मिले हैं। एमके रिसर्च के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में पेट्रोल और डीजल की मार्केटिंग अर्थव्यवस्था में पिछली तिमाही के मुकाबले उल्लेखनीय सुधार हुआ। इस सुधार के पीछे कच्चे तेल की अपेक्षाकृत कम औसत कीमतें और खुदरा ईंधन कीमतों में की गई बढ़ोतरी का पूरा असर प्रमुख कारण रहा। हालांकि डीजल की बिक्री अब भी घाटे में बनी हुई है।
एमके के ऑयल एंड गैस सेक्टर प्रीव्यू के मुताबिक, Q2FY27 में सरकारी तेल कंपनियों का पेट्रोल मार्केटिंग मार्जिन विंडफॉल लेवी के असर को छोड़कर करीब **2.9 रुपये प्रति लीटर** रहा। पिछली तिमाही यानी Q1FY27 में यही मार्जिन लगभग **माइनस 12 रुपये प्रति लीटर** था। यानी पेट्रोल बिक्री की स्थिति में तेज सुधार हुआ और घाटे से निकलकर मार्जिन सकारात्मक क्षेत्र में पहुंच गया।
डीजल के मामले में भी स्थिति पहले से बेहतर हुई है, लेकिन नुकसान पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। एमके के मुताबिक, Q2FY27 में डीजल मार्केटिंग घाटा घटकर **16.7 रुपये प्रति लीटर** रह गया, जबकि पहली तिमाही में यह करीब **32 रुपये प्रति लीटर** था। इस तरह डीजल पर नुकसान लगभग आधा हुआ, लेकिन OMCs के लिए यह अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।
जून तिमाही में स्थिति काफी दबाव वाली थी। उस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, बढ़ी हुई प्रीमियम लागत और माल ढुलाई खर्च ने तेल कंपनियों के मार्केटिंग मार्जिन को बुरी तरह प्रभावित किया था। इसके चलते पेट्रोल और डीजल दोनों पर भारी नुकसान देखने को मिला। हालांकि जुलाई की शुरुआत में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आने और घरेलू खुदरा कीमतों में पहले की गई बढ़ोतरी का पूरा लाभ मिलने से दूसरी तिमाही में तस्वीर सुधरी।
एमके के अनुसार, दूसरी तिमाही में ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत करीब **97 डॉलर प्रति बैरल** रही, जो तिमाही आधार पर लगभग 6 प्रतिशत कम थी। हालांकि सितंबर के अंत तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत फिर तेजी से बढ़ी और ब्रेंट करीब 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। इस बदलाव का असर आगे की तिमाहियों में मार्केटिंग मार्जिन पर पड़ सकता है।
सितंबर में ही ऊंची क्रूड कीमतों का दबाव फिर दिखाई देने लगा था। महीने के दौरान पेट्रोल मार्केटिंग मार्जिन कई मौकों पर नकारात्मक हुआ, जबकि डीजल का घाटा भी ऊंचे स्तर पर बना रहा। एक अलग बाजार अनुमान में सितंबर के दौरान पेट्रोल पर करीब 7.4 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 10.3 रुपये प्रति लीटर तक नुकसान का अनुमान लगाया गया था। इसके बावजूद जुलाई और अगस्त में हुई रिकवरी ने पूरी तिमाही के आंकड़ों को सहारा दिया।
सरकारी OMCs में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम प्रमुख कंपनियां हैं। इन कंपनियों के लिए ऑटो फ्यूल मार्केटिंग बिजनेस आय का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पेट्रोल और डीजल के मार्केटिंग मार्जिन में सुधार होने से इनकी तिमाही आय और परिचालन प्रदर्शन में भी सुधार की उम्मीद जताई जा रही है।
एमके ने अनुमान लगाया है कि दूसरी तिमाही में OMCs के इंटीग्रेटेड मार्जिन, जिसमें रिफाइनिंग और फ्यूल मार्केटिंग दोनों शामिल हैं, बढ़कर करीब **9 से 14 रुपये प्रति लीटर** तक पहुंच सकते हैं। पहली तिमाही में यही आंकड़ा लगभग 1 से 3 रुपये प्रति लीटर था। इससे स्पष्ट है कि रिफाइनिंग बिजनेस ने भी कमजोर मार्केटिंग मार्जिन के असर को कुछ हद तक संतुलित किया।
LPG कारोबार में भी कुछ राहत देखने को मिली है। एमके के अनुसार, घरेलू LPG सिलेंडर पर अंडर-रिकवरी दूसरी तिमाही में घटकर करीब **290 रुपये प्रति सिलेंडर** रह सकती है, जबकि पहली तिमाही में यह लगभग 510 रुपये प्रति सिलेंडर थी। इसका कारण कम अंतरराष्ट्रीय कीमतें, स्पॉट प्रीमियम में कमी और कीमतों में बढ़ोतरी का पूरा असर बताया गया है।
रिफाइनिंग कारोबार के लिहाज से भी स्थिति अपेक्षाकृत सहायक रही। वैश्विक स्तर पर रिफाइनरी बाधाओं और सप्लाई में कमी की वजह से कुछ उत्पादों, खासकर डीजल के रिफाइनिंग मार्जिन मजबूत बने रहे। इससे सरकारी तेल कंपनियों को मार्केटिंग कारोबार में हुए घाटे की भरपाई करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि आगे की राह पूरी तरह आसान नहीं है। पश्चिम एशिया में तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव OMCs के लिए बड़ा जोखिम बना हुआ है। यदि अंतरराष्ट्रीय क्रूड कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं और घरेलू पेट्रोल-डीजल की कीमतों में उसी अनुपात में बढ़ोतरी नहीं होती, तो मार्केटिंग मार्जिन फिर दबाव में आ सकते हैं। सितंबर में कच्चे तेल की तेज बढ़ोतरी ने इसी खतरे की ओर संकेत किया था।
एमके का मानना है कि Q2FY27 में OMCs का प्रदर्शन पहली तिमाही के मुकाबले बेहतर रह सकता है। खासतौर पर पेट्रोल पर मार्जिन सकारात्मक होने और डीजल घाटे में तेज कमी से कंपनियों की कमाई सुधर सकती है। हालांकि पूरे वित्त वर्ष का प्रदर्शन अब भी कच्चे तेल की चाल, घरेलू ईंधन कीमतों और वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
कुल मिलाकर सितंबर तिमाही में सरकारी तेल कंपनियों के फ्यूल मार्केटिंग कारोबार ने जून तिमाही की भारी कमजोरी से मजबूत रिकवरी दिखाई है। पेट्रोल मार्जिन के सकारात्मक होने और डीजल घाटे में लगभग आधी कमी आने से कंपनियों को राहत मिली है। लेकिन डीजल पर जारी नुकसान और क्रूड की कीमतों में दोबारा तेजी यह संकेत देती है कि OMCs के लिए मार्जिन की चुनौती अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
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