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नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने भारत की सरकारी तेल विपणन कंपनियों की चिंता बढ़ा दी है। क्रूड ऑयल एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया है। इसका सीधा असर इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी सरकारी तेल कंपनियों के मार्केटिंग मार्जिन पर पड़ रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक तेल कंपनियों को पेट्रोल की बिक्री पर करीब 5 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 20 से 23 रुपये प्रति लीटर तक का नुकसान उठाना पड़ रहा है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि पेट्रोल की खुदरा कीमत अभी 5 रुपये प्रति लीटर बढ़ा दी गई है। भारत में पंप कीमतों में फिलहाल इतनी बढ़ोतरी की पुष्टि नहीं हुई है।
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के पीछे पश्चिम एशिया में जारी तनाव और प्रमुख समुद्री मार्गों से तेल आपूर्ति को लेकर बढ़ी चिंता बड़ी वजह मानी जा रही है। शुक्रवार 11 सितंबर को ब्रेंट क्रूड 104.61 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ, जबकि अमेरिकी WTI क्रूड 100.05 डॉलर प्रति बैरल पर रहा। पूरे सप्ताह के दौरान तेल के दाम में 8 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़त दर्ज होने की स्थिति बनी।
पेट्रोल पर करीब ₹5 का नुकसान
कच्चे तेल के महंगा होने का सबसे बड़ा असर तेल कंपनियों की लागत पर पड़ रहा है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल विदेश से आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने पर भारतीय कंपनियों को ज्यादा डॉलर खर्च करके तेल खरीदना पड़ता है।
मौजूदा कीमतों पर तेल कंपनियों के लिए पेट्रोल बेचना घाटे का सौदा बनता जा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार पेट्रोल पर लगभग 5 रुपये प्रति लीटर तक का अंडर-रिकवरी या मार्केटिंग घाटा बन चुका है।
डीजल में स्थिति और गंभीर है। कंपनियों का घाटा 20 रुपये से ऊपर और कुछ आकलनों में करीब 23 रुपये प्रति लीटर तक बताया जा रहा है।
यानी खबर का सही अर्थ यह है कि पेट्रोल की कीमत में 5 रुपये की वृद्धि नहीं हुई, बल्कि मौजूदा खुदरा दर पर इसे बेचने में कंपनियों को करीब इतनी रकम का नुकसान हो रहा है।
डीजल पर ज्यादा दबाव क्यों?
पेट्रोल की तुलना में डीजल की स्थिति ज्यादा चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। डीजल केवल निजी वाहनों में इस्तेमाल होने वाला ईंधन नहीं है। ट्रक, बस, कृषि उपकरण, निर्माण मशीनें और माल ढुलाई व्यवस्था बड़े स्तर पर डीजल पर निर्भर करती हैं।
वैश्विक बाजार में रिफाइंड डीजल की सप्लाई भी दबाव में है। पश्चिम एशिया में आपूर्ति बाधित होने के साथ रूस की रिफाइनरियों पर हमलों का असर भी अंतरराष्ट्रीय डीजल बाजार पर पड़ा है।
अमेरिका में भी डीजल की कीमत रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी है। इससे पता चलता है कि मौजूदा समस्या केवल भारतीय बाजार तक सीमित नहीं है बल्कि वैश्विक स्तर पर रिफाइंड फ्यूल सप्लाई पर दबाव बना हुआ है।
भारतीय क्रूड बास्केट भी महंगा
भारत के लिए चिंता सिर्फ ब्रेंट और WTI के 100 डॉलर पार जाने की नहीं है। भारतीय क्रूड बास्केट की लागत भी तेजी से बढ़ी है।
9 सितंबर तक भारतीय क्रूड बास्केट 115.98 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की रिपोर्ट सामने आई। इससे सरकारी तेल कंपनियों पर आयात लागत का दबाव और बढ़ गया है।
भारत में तेल की लागत पर अंतरराष्ट्रीय कीमत के अलावा डॉलर और रुपये का विनिमय दर भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कच्चा तेल डॉलर में खरीदा जाता है। इसलिए अगर रुपये में कमजोरी आती है तो भारत के लिए तेल आयात और महंगा हो जाता है।
11 सितंबर को रुपया 95.55 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। बढ़ते क्रूड और रुपये की कमजोरी का एक साथ होना भारतीय तेल कंपनियों के लिए दोहरा दबाव पैदा करता है।
क्या अब पेट्रोल-डीजल महंगा होगा?
यही सबसे बड़ा सवाल है। कच्चा तेल लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर रहा तो तेल कंपनियों पर खुदरा कीमत बढ़ाने का आर्थिक दबाव बढ़ सकता है।
फिर भी यह कहना जल्दबाजी होगी कि पेट्रोल और डीजल की कीमत निश्चित रूप से इतनी ही बढ़ जाएगी जितना कंपनियों का मौजूदा घाटा है।
भारत में खुदरा ईंधन कीमतों पर कई चीजों का असर होता है। इनमें कच्चे तेल की लागत, रिफाइनिंग, परिवहन, डॉलर-रुपया विनिमय दर, केंद्र और राज्यों के टैक्स तथा तेल कंपनियों का मार्केटिंग मार्जिन शामिल है।
सरकार टैक्स में बदलाव कर सकती है या कंपनियां कुछ समय तक अपने मार्जिन के जरिए दबाव सह सकती हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड बढ़ने का असर पेट्रोल पंप पर उसी अनुपात और उसी समय दिखाई दे, यह जरूरी नहीं है।
अभी पंप पर ₹5 की सामान्य बढ़ोतरी नहीं
12 सितंबर की ताजा स्थिति को देखते हुए यह स्पष्ट करना जरूरी है कि भारत में पेट्रोल को देशभर में एक साथ 5 रुपये प्रति लीटर महंगा किए जाने की पुष्टि नहीं है।
महाराष्ट्र जैसे राज्यों में शहरवार कीमतों में सामान्य बदलाव की रिपोर्ट जरूर है, लेकिन यह देशव्यापी ₹5 की बढ़ोतरी नहीं है।
इसलिए सोशल मीडिया या कुछ भ्रामक हेडलाइन में अगर यह दावा किया जा रहा है कि "पेट्रोल ₹5 महंगा हो गया", तो उसे तेल कंपनियों को होने वाले लगभग ₹5 प्रति लीटर के घाटे से भ्रमित नहीं करना चाहिए।
तेल कंपनियों पर क्यों बढ़ा संकट?
देश की तीन प्रमुख सरकारी तेल कंपनियां—इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम—रिफाइनिंग के साथ पेट्रोल और डीजल की खुदरा बिक्री भी करती हैं।
जब कच्चा तेल सस्ता होता है और पंप कीमतें नहीं घटतीं, तब कंपनियों का मार्केटिंग मार्जिन बेहतर हो सकता है। इसके विपरीत जब क्रूड तेजी से महंगा हो और खुदरा कीमत स्थिर रखी जाए तो उनका मार्जिन घटने लगता है।
सितंबर की शुरुआत में पेट्रोल मार्केटिंग मार्जिन करीब माइनस 4.2 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर लगभग माइनस 24.9 रुपये तक पहुंचने का आकलन सामने आया था।
इसका मतलब यह है कि अगर अंतरराष्ट्रीय कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर असर और गहरा सकता है।
पश्चिम एशिया में तनाव बड़ी वजह
मौजूदा क्रूड रैली के पीछे पश्चिम एशिया की स्थिति अहम है। तेल टैंकरों और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर हमलों ने सप्लाई बाधित होने की आशंका बढ़ाई है।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया में तेल की आवाजाही के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इस क्षेत्र में किसी बड़ी बाधा की आशंका से ही बाजार में कीमतें तेजी से प्रतिक्रिया देने लगती हैं।
यमन के आसपास समुद्री मार्गों और दूसरे ऊर्जा ढांचों को लेकर भी चिंता बढ़ी है। इससे शिपिंग और बीमा लागत में इजाफा हो सकता है, जो अंततः कच्चे तेल की कुल आयात लागत को प्रभावित करता है।
महंगाई पर भी पड़ सकता है असर
अगर डीजल महंगा होता है तो उसका प्रभाव केवल वाहन मालिकों तक सीमित नहीं रहता।
देश में बड़े पैमाने पर माल ढुलाई ट्रकों से होती है। डीजल की लागत बढ़ने पर ट्रांसपोर्टेशन खर्च बढ़ सकता है। इसका असर सब्जियों, फल, अनाज, औद्योगिक उत्पाद और दूसरी वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है।
इसी तरह महंगा पेट्रोल आम उपभोक्ता के मासिक बजट पर सीधा असर डालता है।
कच्चे तेल की ऊंची कीमत भारत के आयात बिल और व्यापार घाटे को भी प्रभावित कर सकती है। इससे रुपये पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है।
यानी तेल के दाम का असर केवल पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं होता बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था तक पहुंचता है।
आगे किस पर रहेगी नजर?
अब बाजार की नजर सबसे ज्यादा पश्चिम एशिया में तनाव और तेल आपूर्ति पर है। अगर होर्मुज से तेल की आवाजाही सामान्य रहती है और तनाव कम होता है तो क्रूड की कीमतों में राहत मिल सकती है।
इसके विपरीत अगर सप्लाई में और बाधा आती है तो कीमतें दोबारा तेजी पकड़ सकती हैं।
वैश्विक तेल कंपनियों और विश्लेषकों की ओर से भी आने वाले महीनों में तेल की कीमतों में अस्थिरता बने रहने की आशंका जताई जा रही है।
भारतीय उपभोक्ताओं के लिए फिलहाल राहत की बात यह है कि तेल कंपनियों के बड़े नुकसान के बावजूद इसका पूरा बोझ तुरंत पंप कीमतों पर नहीं डाला गया है।
लेकिन अगर कच्चा तेल लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रहता है और रुपये पर भी दबाव रहता है तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर चिंता बढ़ना स्वाभाविक है।
ऐसे में आने वाले दिनों में सरकारी तेल कंपनियों के फैसले, अंतरराष्ट्रीय क्रूड कीमतें और सरकार की टैक्स नीति तीनों महत्वपूर्ण रहेंगी।
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