
BUSINESS: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और युद्ध की स्थिति के बीच जब पूरी दुनिया कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और सप्लाई संकट को लेकर चिंतित थी, तब चीन ने एक अलग रणनीति अपनाकर वैश्विक ऊर्जा बाजार को चौंका दिया। जहां कई देश महंगे दामों पर कच्चा तेल खरीदने को मजबूर थे, वहीं चीन ने अपने तेल आयात में कमी कर दी, रिफाइंड ईंधन के निर्यात को सीमित किया और अपने विशाल तेल भंडार का इस्तेमाल शुरू कर दिया।
चीन के इस कदम ने यह संकेत दिया कि वह अब सिर्फ दुनिया का सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता या खरीदार नहीं रह गया है, बल्कि वैश्विक तेल बाजार की दिशा और कीमतों को प्रभावित करने वाली बड़ी ताकत बन चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की यह रणनीति आने वाले समय में ऊर्जा बाजार में देशों के बीच शक्ति संतुलन को बदल सकती है।
मिडिल ईस्ट में युद्ध और तनाव के कारण वैश्विक तेल सप्लाई पर बड़ा खतरा पैदा हो गया था। खासतौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर चिंता बढ़ गई थी। यह समुद्री मार्ग दुनिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि बड़ी मात्रा में कच्चा तेल इसी रास्ते से होकर अलग-अलग देशों तक पहुंचता है। युद्ध के दौरान इस मार्ग पर खतरे की आशंका ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में हलचल पैदा कर दी थी।
सप्लाई बाधित होने की आशंका के चलते कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिली। ब्रेंट क्रूड के दाम एक समय करीब 72 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 118 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गए थे। इस दौरान कई देशों ने भविष्य की जरूरतों को देखते हुए अतिरिक्त तेल खरीदना शुरू कर दिया, लेकिन चीन ने इसके उलट अपनी खरीदारी को नियंत्रित रखा।
चीन की रणनीति का सबसे बड़ा हिस्सा उसका विशाल रणनीतिक तेल भंडार रहा। चीन ने वर्षों से अपने ऊर्जा सुरक्षा कार्यक्रम के तहत बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का भंडारण किया है। संकट के समय इसी भंडार का इस्तेमाल कर उसने महंगे बाजार में ज्यादा खरीदारी करने से बचने की कोशिश की।
इसके अलावा चीन ने रिफाइंड ईंधन के निर्यात पर भी नियंत्रण रखा। इससे घरेलू बाजार में ईंधन की उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिली और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अतिरिक्त दबाव भी नहीं बढ़ा। चीन का यह कदम दिखाता है कि वह ऊर्जा संकट से निपटने के लिए लंबे समय से तैयारी कर रहा था।
चीन की इस रणनीति का असर भारत समेत कई देशों पर पड़ सकता है। भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल है और अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से कच्चा तेल खरीदकर पूरा करता है। ऐसे में वैश्विक बाजार में चीन जैसे बड़े खरीदार का व्यवहार तेल की कीमतों को प्रभावित कर सकता है।
अगर चीन भविष्य में भी अपने तेल आयात और भंडारण नीति का इस्तेमाल रणनीतिक तरीके से करता है, तो इससे अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। भारत जैसे देशों के लिए यह जरूरी होगा कि वे ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करें और तेल आपूर्ति के लिए अलग-अलग स्रोतों पर निर्भरता बढ़ाएं।
चीन की रणनीति यह भी बताती है कि आज के दौर में ऊर्जा केवल व्यापार का विषय नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति और रणनीतिक ताकत का हिस्सा बन चुकी है। जिन देशों के पास पर्याप्त भंडार, मजबूत आपूर्ति व्यवस्था और बेहतर योजना है, वे संकट के समय खुद को सुरक्षित रख सकते हैं।
मिडिल ईस्ट संकट के दौरान चीन ने जिस तरह बाजार से दूरी बनाई, उससे यह साफ हो गया कि वह अब वैश्विक तेल बाजार में केवल मांग पैदा करने वाला देश नहीं है, बल्कि एक ऐसा खिलाड़ी बन चुका है जो कीमतों और आपूर्ति के समीकरण को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। आने वाले समय में उसकी ऊर्जा नीति का असर भारत सहित पूरी दुनिया पर दिखाई दे सकता है।





