
नई दिल्ली। वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में भारत की 7.8 प्रतिशत वास्तविक GDP वृद्धि दर को लेकर उठाई जा रही आलोचनाओं को मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा कि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के अलग-अलग सांख्यिकीय सीरीज से प्राप्त आंकड़ों की आपस में तुलना करके कम वृद्धि दर निकालने की कोशिश सही नहीं है।
नागेश्वरन ने स्पष्ट किया कि GDP के आंकड़ों को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि वे किस आधार वर्ष और किस सांख्यिकीय पद्धति से तैयार किए गए हैं। उनके मुताबिक अलग-अलग सीरीज से निकले आंकड़ों को एक-दूसरे के साथ रखकर विकास दर का आकलन करना सांख्यिकीय रूप से उचित नहीं है।
₹86 लाख करोड़ और ₹88 लाख करोड़ के आंकड़ों पर विवाद
GDP वृद्धि को लेकर हाल में उठी आलोचना पिछले साल की पहली तिमाही के लगभग ₹86 लाख करोड़ के GDP अनुमान की तुलना हालिया लगभग ₹88 लाख करोड़ के अनुमान से करने पर आधारित थी। इस तुलना के जरिए कुछ लोगों ने वास्तविक आर्थिक वृद्धि दर पर सवाल उठाए थे।
हालांकि, मुख्य आर्थिक सलाहकार का कहना है कि इन दोनों आंकड़ों को सीधे तौर पर तुलना के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। दोनों आंकड़े अलग-अलग आधार वर्षों और अलग-अलग अनुमान पद्धतियों के आधार पर तैयार किए गए हैं।
ऐसे में यदि एक सीरीज के आंकड़े को दूसरी सांख्यिकीय सीरीज के आंकड़े से जोड़कर वृद्धि दर निकालने की कोशिश की जाए तो परिणाम वास्तविक आर्थिक गतिविधियों को सही तरीके से नहीं दर्शाएगा।
आधार वर्ष का महत्व
GDP की गणना में आधार वर्ष की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। समय के साथ अर्थव्यवस्था की संरचना, उत्पादन के तरीके, कीमतों और विभिन्न क्षेत्रों के योगदान में बदलाव आता है। इसी वजह से समय-समय पर GDP की गणना के लिए आधार वर्ष को अपडेट किया जाता है।
नागेश्वरन का तर्क इसी सांख्यिकीय अंतर पर आधारित है। उनके अनुसार यदि दो अलग-अलग आधार वर्षों पर तैयार GDP आंकड़ों की तुलना की जाती है तो उससे प्राप्त निष्कर्ष को सीधे वास्तविक वृद्धि दर नहीं माना जा सकता।
GDP आंकड़ों में बदलाव केवल अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन के कारण नहीं होता, बल्कि आंकड़े तैयार करने की पद्धति में बदलाव का भी प्रभाव पड़ता है। इसलिए किसी एक आंकड़े को दूसरे से जोड़कर वृद्धि दर निकालने के बजाय आधिकारिक रूप से जारी समान सांख्यिकीय श्रृंखला का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
अलग पद्धति से बने आंकड़ों को जोड़ना उचित नहीं
मुख्य आर्थिक सलाहकार ने यह भी संकेत दिया कि GDP से संबंधित आंकड़ों की व्याख्या करते समय सांख्यिकीय निरंतरता बनाए रखना जरूरी है। यदि अलग-अलग श्रृंखलाओं के आंकड़ों को मिलाया जाता है तो तुलना का आधार ही बदल जाता है।
मसलन, यदि किसी अवधि का GDP आंकड़ा एक आधार वर्ष के अनुसार तैयार किया गया है और दूसरी अवधि का आंकड़ा किसी नए आधार वर्ष तथा संशोधित पद्धति के तहत तैयार हुआ है, तो दोनों को सीधे घटाकर या भाग देकर विकास दर निकालना उचित नहीं होगा।
उनके मुताबिक यही वजह है कि 7.8 प्रतिशत की वास्तविक GDP वृद्धि दर पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल की जा रही कुछ गणनाएं सही पद्धति पर आधारित नहीं हैं।
वास्तविक GDP वृद्धि क्या बताती है
GDP वृद्धि दर अर्थव्यवस्था में उत्पादन और आर्थिक गतिविधियों की गति का महत्वपूर्ण संकेतक है। वास्तविक GDP में कीमतों के प्रभाव को हटाकर अर्थव्यवस्था की वास्तविक वृद्धि को मापने की कोशिश की जाती है। इसीलिए वास्तविक GDP वृद्धि दर को आर्थिक प्रदर्शन का प्रमुख पैमाना माना जाता है।
हालांकि, GDP आंकड़ों की व्याख्या करते समय नाममात्र GDP, वास्तविक GDP, आधार वर्ष और सांख्यिकीय संशोधनों के बीच अंतर समझना जरूरी है। एक ही अवधि के आंकड़ों में अलग-अलग संशोधनों के कारण बदलाव आ सकता है।
वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत की वास्तविक GDP वृद्धि दर सामने आने के बाद इसी संदर्भ में बहस तेज हुई थी। कुछ आलोचनाओं में अलग-अलग GDP अनुमानों की तुलना करके वृद्धि दर पर सवाल उठाए गए। CEA ने इसी गणना के तरीके को गलत बताया है।
आंकड़ों की तुलना में सावधानी जरूरी
आर्थिक आंकड़ों की तुलना केवल उनके मूल्य के आधार पर करना पर्याप्त नहीं होता। यह देखना भी जरूरी होता है कि आंकड़े किस अवधि, आधार वर्ष और पद्धति के अनुसार तैयार किए गए हैं। विशेष रूप से GDP जैसे व्यापक आर्थिक संकेतकों में सांख्यिकीय पद्धति का बदलाव परिणाम पर असर डाल सकता है।
नागेश्वरन के बयान का मूल संदेश यही है कि GDP के आंकड़ों को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले उनकी सांख्यिकीय श्रृंखला और गणना पद्धति को समझना आवश्यक है।
GDP आंकड़ों पर बहस जारी
7.8 प्रतिशत की GDP वृद्धि दर को लेकर जारी बहस ऐसे समय में सामने आई है जब भारत की आर्थिक वृद्धि पर घरेलू और वैश्विक स्तर पर लगातार नजर रखी जा रही है। GDP के आंकड़े सरकार, रिजर्व बैंक, निवेशकों और आर्थिक विशेषज्ञों के लिए महत्वपूर्ण संकेतक होते हैं।
ऐसे में आंकड़ों की विश्वसनीयता और उनकी सही व्याख्या बेहद अहम हो जाती है। CEA ने स्पष्ट किया है कि अलग-अलग सांख्यिकीय सीरीज के आंकड़ों की तुलना करके कम वृद्धि दर का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।
फिलहाल नागेश्वरन के स्पष्टीकरण के बाद GDP गणना को लेकर बहस का केंद्र अब वृद्धि दर से अधिक आंकड़ों की तुलना की पद्धति पर आ गया है। उनका कहना है कि लगभग ₹86 लाख करोड़ और ₹88 लाख करोड़ के आंकड़े अलग-अलग आधार वर्ष और अनुमान पद्धतियों पर आधारित होने के कारण सीधे तुलना योग्य नहीं हैं। इसलिए इन दोनों आंकड़ों के आधार पर 7.8 प्रतिशत की वास्तविक GDP वृद्धि दर को चुनौती देना सांख्यिकीय रूप से सही निष्कर्ष नहीं देता।





