
Business बिजनेस: कॉम्पिटिशन कमीशन ऑफ़ इंडिया (CCI) ने मोबिलिटी प्लेटफॉर्म रैपिडो की पेरेंट कंपनी रोपेन ट्रांसपोर्टेशन सर्विसेज़ के खिलाफ दर्ज एक शिकायत को खारिज कर दिया है। आयोग ने अपने शुरुआती निष्कर्ष में कहा कि मामले में बाजार में दबदबे के दुरुपयोग का प्रथम दृष्टया कोई आधार नहीं बनता है।
यह शिकायत रैपिडो की संचालन गतिविधियों से जुड़ी थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि कंपनी उत्तराखंड में कमर्शियल रूप से प्राइवेट वाहनों का उपयोग कर रही थी। साथ ही यह भी आरोप था कि कंपनी राज्य द्वारा तय न्यूनतम मानकों से कम किराया वसूल रही है, और उसकी प्राइसिंग एवं टैक्स व्यवस्था पारदर्शी नहीं है।
शिकायत में यह भी दावा किया गया था कि प्लेटफॉर्म द्वारा अपनाई जा रही नीतियां प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर सकती हैं और इससे पारंपरिक टैक्सी और ट्रांसपोर्ट ऑपरेटरों को नुकसान हो रहा है।
हालांकि, 22 मई को पारित आदेश में Competition Commission of India ने स्पष्ट किया कि शिकायत में उठाए गए मुद्दे मुख्य रूप से मोटर व्हीकल एक्ट, 1988 के तहत आने वाले परिवहन नियमों और लाइसेंसिंग से जुड़े हैं। आयोग ने कहा कि ये विषय सीधे तौर पर प्रतिस्पर्धा कानून के दायरे में नहीं आते, इसलिए इस मामले में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं बनती।
CCI ने अपने निर्णय में यह भी माना कि केवल कम किराया या प्राइसिंग मॉडल अपने आप में प्रतिस्पर्धा कानून के उल्लंघन का आधार नहीं बनता, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि किसी कंपनी ने बाजार में अपनी प्रभावशाली स्थिति का दुरुपयोग किया है।
शिकायत में लगाए गए आरोपों में यह भी कहा गया था कि रैपिडो प्राइवेट वाहनों को कमर्शियल उपयोग में लाकर नियमों का उल्लंघन कर रही है, लेकिन आयोग ने कहा कि यह मामला नियामक और परिवहन कानून से संबंधित है, जिसे संबंधित राज्य या परिवहन प्राधिकरण देख सकते हैं।
इस फैसले के बाद रैपिडो और उसके संचालन मॉडल को लेकर चल रही कानूनी बहस को फिलहाल बड़ा झटका माना जा रहा है। वहीं, विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय डिजिटल मोबिलिटी प्लेटफॉर्म्स के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि हर नियामक विवाद प्रतिस्पर्धा कानून के तहत नहीं आता।
फिलहाल इस मामले में आगे किसी अपील या नई कानूनी कार्रवाई की कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। आयोग का यह आदेश डिजिटल ट्रांसपोर्ट सेक्टर में काम कर रही कंपनियों के लिए नियामक सीमाओं को भी स्पष्ट करता है और यह संकेत देता है कि ऐसे मामलों में अलग-अलग कानूनों के तहत समीक्षा की आवश्यकता होती है।





