
व्यापार | भारतीय वाणिज्य मंत्रालय (Commerce Ministry) ने देश में इस्पात (स्टील) उद्योग को सस्ते आयात से बचाने के लिए 200 दिनों के लिए 12% सुरक्षा शुल्क (Safeguard Duty) लगाने की सिफारिश की है। इस कदम का उद्देश्य घरेलू स्टील उत्पादकों को बढ़ती प्रतिस्पर्धा और आयातित इस्पात की कीमतों में गिरावट से बचाना है।
क्या है मामला?
हाल के महीनों में चीन, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों से सस्ते स्टील का आयात तेजी से बढ़ा है। इससे भारतीय इस्पात उद्योग को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। घरेलू कंपनियां इस प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रही हैं, जिससे उत्पादन प्रभावित हो रहा है और नौकरियों पर भी असर पड़ने की संभावना बढ़ गई है।
सुरक्षा शुल्क की जरूरत क्यों पड़ी?
- सस्ते स्टील आयात का असर: कई देशों में ओवरप्रोडक्शन के कारण स्टील की कीमतें गिरी हैं, जिससे भारत में भारी मात्रा में सस्ता इस्पात आ रहा है।
- घरेलू उद्योग पर संकट: भारतीय स्टील कंपनियों को नुकसान हो रहा है, जिससे उनकी उत्पादन क्षमता प्रभावित हो सकती है।
- नौकरियों पर असर: अगर यह ट्रेंड जारी रहा, तो स्टील सेक्टर से जुड़े लाखों लोगों की नौकरियां खतरे में आ सकती हैं।
- राष्ट्रीय सुरक्षा और आत्मनिर्भरता: सरकार घरेलू उद्योग को मजबूत कर ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ को बढ़ावा देना चाहती है।
किन उत्पादों पर लगेगा शुल्क?
- हॉट-रोल्ड कॉइल्स और शीट्स
- कोल्ड-रोल्ड स्टील
- गैल्वेनाइज्ड स्टील उत्पाद
- स्टेनलेस स्टील और अलॉय स्टील
किसे होगा फायदा?
भारतीय स्टील निर्माता: टाटा स्टील, जेएसडब्ल्यू स्टील और सेल जैसी कंपनियों को राहत मिलेगी।
रोजगार सुरक्षा: स्टील उद्योग से जुड़े लाखों लोगों की नौकरियां बच सकती हैं।
घरेलू उद्योग को मजबूती: आत्मनिर्भर भारत पहल को बल मिलेगा।
चुनौतियां और संभावित असर
उपभोक्ताओं पर असर: स्टील महंगा होने से ऑटोमोबाइल, कंस्ट्रक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर की लागत बढ़ सकती है।
आयातक कंपनियों पर असर: जो कंपनियां सस्ता स्टील खरीदकर निर्माण कार्य कर रही थीं, उनके लिए लागत बढ़ जाएगी।
संभावित व्यापारिक तनाव: चीन और अन्य निर्यातक देशों से व्यापारिक विवाद बढ़ सकता है।
आगे क्या होगा?
वाणिज्य मंत्रालय की यह सिफारिश वित्त मंत्रालय को भेजी गई है। अगर इसे मंजूरी मिलती है, तो अगले 200 दिनों तक भारत में आयातित स्टील पर 12% अतिरिक्त शुल्क लगाया जाएगा। इससे घरेलू इस्पात उद्योग को स्थिरता मिलेगी और भारतीय कंपनियों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा से बचाने में मदद मिलेगी।





