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नॉमिनी को लेकर न करें यह बड़ी गलती, जानिए वसीयत और उत्तराधिकार का नियम

Ratna Netam
7 Aug 2026 2:17 PM IST
नॉमिनी को लेकर न करें यह बड़ी गलती, जानिए वसीयत और उत्तराधिकार का नियम
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नई दिल्ली : बैंक खाता खुलवाते समय, म्यूचुअल फंड में निवेश करते वक्त, बीमा पॉलिसी खरीदते समय या अन्य वित्तीय योजनाओं में निवेश के दौरान नॉमिनी का नाम दर्ज कराना लगभग हर व्यक्ति के लिए सामान्य प्रक्रिया है। अधिकांश लोग यह मान लेते हैं कि यदि खाताधारक या निवेशक की मृत्यु हो जाती है तो नॉमिनी ही उस खाते, निवेश या संपत्ति का स्थायी मालिक बन जाता है। हालांकि, कानूनी दृष्टि से यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है। भारतीय कानून के अनुसार अधिकांश मामलों में नॉमिनी का अधिकार केवल संपत्ति या धनराशि प्राप्त करने और उसे सुरक्षित रखने तक सीमित होता है। वास्तविक मालिकाना हक उत्तराधिकार कानून और वसीयत के आधार पर तय किया जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, नॉमिनी का मुख्य कार्य संबंधित बैंक, बीमा कंपनी, म्यूचुअल फंड या अन्य वित्तीय संस्था से धनराशि या निवेश प्राप्त करना होता है। इसके बाद उस राशि को कानूनी उत्तराधिकारियों तक पहुंचाने की प्रक्रिया आसान हो जाती है। यानी नॉमिनी को केवल एक प्रकार का कस्टोडियन या संरक्षक माना जाता है, न कि हर स्थिति में संपत्ति का अंतिम मालिक।
यही कारण है कि कई बार परिवारों में यह भ्रम पैदा हो जाता है कि जिस व्यक्ति का नाम नॉमिनी के रूप में दर्ज है, वही पूरी संपत्ति का हकदार है। जबकि वास्तविकता यह है कि यदि मृतक ने वैध वसीयत बनाई है तो संपत्ति का बंटवारा उसी वसीयत के अनुसार होगा। यदि वसीयत नहीं बनाई गई है, तो संबंधित उत्तराधिकार कानून लागू होगा और उसी के आधार पर यह तय किया जाएगा कि संपत्ति पर किस कानूनी वारिस का अधिकार है।
भारत में उत्तराधिकार के नियम व्यक्ति के धर्म और लागू कानूनों के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। ऐसे में केवल नॉमिनी का नाम दर्ज होना किसी व्यक्ति को संपत्ति का स्थायी मालिक नहीं बनाता। यदि नॉमिनी और कानूनी वारिस अलग-अलग व्यक्ति हैं, तो अंतिम अधिकार कानूनी वारिसों का ही माना जाएगा, जब तक कि किसी वैध वसीयत में अलग व्यवस्था न की गई हो।
विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि कई लोग वर्षों तक मेहनत से संपत्ति और निवेश तो बना लेते हैं, लेकिन वसीयत तैयार करने की आवश्यकता को नजरअंदाज कर देते हैं। परिणामस्वरूप, उनकी मृत्यु के बाद परिवार के सदस्यों के बीच संपत्ति को लेकर विवाद की स्थिति बन सकती है। ऐसे विवाद कई बार वर्षों तक अदालतों में चलते हैं और परिवार को आर्थिक व मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
इसी वजह से वित्तीय सलाहकार समय रहते वसीयत तैयार करने की सलाह देते हैं। एक वैध वसीयत यह स्पष्ट कर देती है कि किस संपत्ति पर किस व्यक्ति का अधिकार होगा। इससे भविष्य में किसी तरह की कानूनी अनिश्चितता या पारिवारिक विवाद की संभावना काफी कम हो जाती है।
वसीयत के अलावा एस्टेट प्लानिंग भी आज के समय में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। एस्टेट प्लानिंग के तहत व्यक्ति अपनी संपत्ति, बैंक खातों, निवेश, बीमा, अचल संपत्ति और अन्य वित्तीय परिसंपत्तियों के प्रबंधन की स्पष्ट योजना तैयार करता है। इसमें जरूरत के अनुसार ट्रस्ट, पावर ऑफ अटॉर्नी, बेनेफिशियरी डेजिग्नेशन और अन्य कानूनी दस्तावेज भी शामिल किए जा सकते हैं। ये दस्तावेज यह सुनिश्चित करते हैं कि किसी व्यक्ति की मृत्यु या गंभीर बीमारी की स्थिति में उसकी संपत्ति का प्रबंधन उसकी इच्छा के अनुरूप हो।
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल नॉमिनी जोड़ देना पर्याप्त नहीं माना जाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति चाहता है कि उसकी संपत्ति उसकी इच्छा के अनुसार सही व्यक्ति तक पहुंचे, तो उसे वसीयत और उचित एस्टेट प्लानिंग भी करनी चाहिए। इससे परिवार के सदस्यों को अनावश्यक कानूनी प्रक्रिया और विवादों से बचाया जा सकता है।
वर्तमान समय में जब बड़ी संख्या में लोग बैंक जमा, म्यूचुअल फंड, शेयर, बीमा और अन्य निवेश साधनों का उपयोग कर रहे हैं, तब नॉमिनी और कानूनी उत्तराधिकार के बीच का अंतर समझना पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है। वित्तीय मामलों में थोड़ी-सी जागरूकता भविष्य में परिवार के लिए बड़ी सुरक्षा साबित हो सकती है।
इसलिए यदि आपने अब तक केवल अपने बैंक खाते या निवेश में नॉमिनी का नाम दर्ज कराया है और यह मान लिया है कि इससे आपकी पूरी जिम्मेदारी समाप्त हो गई, तो एक बार अपनी वसीयत और एस्टेट प्लानिंग की भी समीक्षा अवश्य करें। सही कानूनी दस्तावेज ही यह सुनिश्चित करते हैं कि आपकी मेहनत से अर्जित संपत्ति भविष्य में आपकी इच्छा के अनुसार सही हाथों तक पहुंचे।
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