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नई दिल्ली: एनालिस्ट्स के अनुसार, भारतीय IT सेक्टर के नतीजे (जुलाई-सितंबर की अवधि में) एक बार फिर कमजोर रहने की संभावना है। आमतौर पर यह तिमाही कारोबार के लिहाज से मजबूत होती है, लेकिन इस बार डील कम मिल रही हैं, क्लाइंट फैसले लेने में सावधानी बरत रहे हैं और मैक्रो-इकोनॉमिक अनिश्चितता के कारण गैर-जरूरी खर्चों में कटौती की जा रही है।
HDFC सिक्योरिटीज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कीमतों पर दबाव बना हुआ है क्योंकि AI से होने वाली प्रोडक्टिविटी का फायदा अब रिन्यूअल और नई डील में भी शामिल किया जा रहा है।
रिपोर्ट में कहा गया है, "Q2 FY27 (अनुमानित) में टियर-1 कंपनियों की ग्रोथ QoQ CC (तिमाही-दर-तिमाही स्थिर मुद्रा) आधार पर -0.4% से 2.0% रहने का अनुमान है, जबकि मिड-टियर कंपनियों की ग्रोथ 0.6% से 6.3% के बीच रहने की उम्मीद है, जिसमें कुछ हद तक अधिग्रहण (एक्विजिशन) का भी योगदान है।"
चूंकि पहली छमाही (H1) का प्रदर्शन उम्मीद से कम रहा है, इसलिए FY27 में रिकवरी दूसरी छमाही (H2) पर निर्भर करती है। हालांकि, H2 में तीसरी तिमाही (Q3) भी शामिल है, जो आमतौर पर छुट्टियों (फर्लो) के कारण कमजोर रहती है, जिससे पूरे साल की उम्मीदें सीमित हो जाती हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, रुपये की गिरावट, ऑपरेशनल एफिशिएंसी और बेहतर यूटिलाइजेशन से वेतन वृद्धि के असर की भरपाई हो जाएगी, लेकिन AI के कारण कीमतों में कमी (डिफ्लेशन) की चिंताएं सेक्टर के वैल्यूएशन मल्टीपल्स पर दबाव बनाए रखेंगी।
भारतीय IT कंपनियों का मानना है कि जटिल और कड़े नियमों वाले 'ब्राउनफील्ड' माहौल में कंपनियों के लिए सीधे तौर पर जेन-AI (Gen-AI) को लागू करना मुश्किल है, इसलिए सिस्टम इंटीग्रेशन (SI) वेंडर्स की भूमिका अहम बनी हुई है।
AI-केंद्रित नई डील मिलने से कीमतों में कमी (डिफ्लेशन) के अनुमानित 6-7% असर की भरपाई हो रही है, हालांकि इन डील के अंतिम रूप लेने की गति धीमी बनी हुई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रोथ में रिकवरी काम को अंजाम देने (एग्जीक्यूशन) पर निर्भर करती है, क्योंकि नई डील अब नतीजों पर आधारित (आउटकम-ड्रिवन) होती जा रही हैं, कीमतों में AI-आधारित टूल्स का इस्तेमाल हो रहा है और रिन्यूअल डिस्काउंट पर हो रहे हैं। इसमें यह भी कहा गया है कि वैल्यूएशन ऐतिहासिक निचले स्तर के करीब हैं और FCF यील्ड आकर्षक बनी हुई है।
Q2 की कमाई Q1 की तुलना में कमजोर रहने की उम्मीद है, इसलिए बाजार का सेंटिमेंट कमजोर बना रह सकता है।
एनालिस्ट्स का कहना है कि निकट भविष्य में भारतीय इक्विटी पर दबाव बना रह सकता है, क्योंकि ग्लोबल बॉन्ड मार्केट में भारी गिरावट, कच्चे तेल की कीमतों में फिर से तेजी और छह महीनों में सबसे ज्यादा विदेशी बिकवाली बाजार के सेंटिमेंट पर असर डाल रही है।
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